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Go Back Xossip > Mirchi> Stories> Hindi > TRICK + CHAKRAVYUH + KATHPUTLEY ( COMPLETE ) VED PARKASH SHARMA SERIES

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  #50881  
Old 26th February 2017
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update no 1

जुआरी 7


जगमोहन ने हाथों मेँ सामान से भरे चार पांच वप्लास्टिक के लिफाफे थाम रखे थे । भारी ही था सामान । कुछ पीछे देवराज चौहान भी दो लिफाफे उठाये आ रहा था । दिन के बारह बज रहे थे । सूर्य सिर पर चढा तप रहा था । दोनों सुबह ही किसी काम कै लिये बंगले से निकले थे । जब फुर्सत मिली तो किचन का और खाने -पीने का सामान खरीदने मेँ लग गये I बंगले मे सामान का रटॉक खत्म हो रहा था ।


जगमोहन मार्किट की कार पार्किंग मे आ पहुँचा था । जहां उनकी कार खंडी थी I



इससे पहले कि वो हाथों में थाम रखे भारी लिफाफे उठाये अपनी कार तक पहुच पाता, बगल में खडी काले रंग की "एसेन्ट" काऱ का दरवाजा खुला कि जगमोहन दरवाजे से टकराते-टकरातै बचा I ठिठका I चेहरे पर उखडेपन कै भाव आ ठहरे थे I



तभी उसके देखते-ही-देख़ते खुले दरवाजे से , पचास बरस का मिलनसार-सा दिखने वाला व्यक्ति बाहर निकला । जिसके सिंर के आगे कै हिस्से कै बाल गांयब थे । बाहर आते ही धूप में उसकी टांट चमकने लगी थी । जगमोहन से उनकी नजरें मिलीं I


"भाई मेरे!" जगमोहन बोला--"आगे -पीछे देखकर दरवाजा खोलाकर । ट्रक आ रहा होता तो?"


उसने जगमोहन को जरा-सा पीछे किया और खुले दरवाजे के किनारे पर आ खडा हुआ ।


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  #50884  
Old 26th February 2017
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जुआरी-8



"देखकर ही दरवाजा खोला है जनाब I" उसने शांत स्वर में कहा ।।



तब तक देवराज चौहान भी पास आ पहुंचा था ।


"देखकर खोला होता तो. मेरे रास्ते में दरवाजा न आता भाईजी ।" जगमोहन कै होठ सिकुड़े ।


तभी बगल में खड़ा देवराज चौहान जगमोहन से बोला।



"चलो I


तेज धूप परेशान करने लगी थी ।


जगमोहन ने वहां से हटकर, अपनी कार की तरफ कंदम उठाना चाहा तो वो कह उठा ।


"कहां चले? कमाल है, आपके लिये ही तो दरवाजा खोला है I"


जगमोहन की निगाह फौरन उसकी तरफ घूमी।


देवराज चौहान क्री आखें जरा सी सिकुडी I


"भीतर बैठिये l सैर पर चलते हैं l वो शांत-सामान्य स्वर में बोला ।



"हम बैठे?" जगमोहन ने उसे घूरा I


" हां I



"कौन हो तुम ?" देवराज चौहान कै स्वर में किसी तरह कै भाव नहीं थे !!



"रामप्रकाश नाम है मेरा ! बाकी बातें बाद में दोनों भीतर ~ बैठो । चलते हैं l



देवराज चौहान और जगमोहन की नजरें मिलीं ।


"जानते हो हमें?" जगमोहन ने पूछा l



"हां l तुम जगमोहन हो और ये देवराज चौहान ।" वो बोला-"बहुत अच्छी तरह जानता हू तुम दोनों को । जो कर रहा हुं, उसमें जरा भी बुरा ख्याल शामिल नहीं हे । धमकी नहीं दे रहा l बदमाशी नहीं कर रहा । कोई तुमसेदेवराज चौहान से बात काना चाहता है । जो बात करना चाहता है , तुम दोनो को उस तक पहुचाना है । उसकै मन मेँ भी कोई बुरी मंशा नही है I मेरे ख्याल में वो तुमसे कोई काम लेना चाहते है । बात करने में क्या हर्ज हैं । काम लेगे तो नोट भी देंगे । इस पर भी मै कमीशन नहीं मांग रहा I तुम न चलना चाहों तो कोई बात नहीं । काम तो देवराज चौहान से ही---!"



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  #50885  
Old 26th February 2017
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जुआरी-9


क्या काम है ?" देवराज चौहान ने पूछा I



"मैं नहीं जानता I" रामप्रकाश ने सिर हिलाकर कहा I



"कौन है वोजो. . I


"उसके बारे में मैं नहीं बताऊंगा । चलो और मिल लो ।"



"इस काम के लिये तुमने, उससे पैसे लिए होंगे !"


"हां I मुफ्त में मैंने कभी अपने बाप को भी पानी का गिलास नहीं द्विया I"


"मुझ तक कैसे पहुचे?" देवराज चौहान ने उसकी आंखों-में झांका ।



"ये तो अन्दर की बात है ।मत पूछ I क्या फायदा झूठ बोलूंगा । सच बात ये है कि जवाब नहीँ दूंगा । रामप्रकाश ने दोनों पर निगाह मारकर कहा----"जो बात करना चाहता-है , कर लो । सुन लो उसकी । नहीं बात जंचे तो चले आना । बो ऐसा नहीं है कि तुम्हारे इन्कार पर गोली मार देगा । शरीफ बंदा हे।"




देवराज चौहान ने-सिग्रेट सुलगाई! कश लिया । गर्मी की वजह से माथे और गाल पर पसीना नजर आने लगा था । देवराज चौहान ने रुमालं निकाला और पसीने से भरा चेहरा पोंछते हुए बोला ।


"अकेले हो?"



"नहीं I इस कार में ड्राईवर हैं । वो रिवॉल्वर भी रखता हे । यहां पार्किंग में खडी कारों में छ: आदमी ब्रैठे हैँ I जिनके पास रिवाॅल्बर हैँ I ये दादागिरी या र्धमकी नहीँ है देवराज चौहान । सब कुछ सावधानी के लिये है I जैसे तुम काम करते हो, वेसे ही मैं काम करता हूं । तुम अपने ढंग के , मै अपने ढंग कै । जो आदमी तुमसे बात करना चाहता है, उस तक पहुंचकर मेरा काम खत्म हो जायेगा । मेरी खातिर ही सही I रामप्रकाश गम्भीर था-"वैठ जाओ कार में I



देवराज चौहान ने कश लेकर रामप्रकाश को देखा ।


रामप्रकाश बहुत समझदारी और चालाकी से काम ले रहा था I वो उन्हें साथ ले जाना चाहता था । आस-पास उसके आदमी बिखरे हुए थे । इस पर भी हाथ जोडने वाले ढंग मेँ साथ चलने को कह रहा था I स्पष्ट था कि उसकी बात नहीं मानी गयी तो फिर सख्ती से उसे साथ ले जाना चाहेगा I लेकिन इस वक्त वो ये कोशिश कर रहा था कि माहौल बिगडे नहीं । प्यार से ही बात वन जाये I "


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  #50886  
Old 26th February 2017
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जुआरी-10


"जगमोहन । " देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा--- "चलो-बैठो कार में !


"कौन सी-अपनी के...!"


"इसकी कार मे ।"


"इसकी।" कहते-कहते जगमोहन ठिठका--"ठीक है । ये सामान.. .! फिर जगमोहन ने रामप्रकाश क्रो देखा---"ये लिफाफे हमारी कार में रख दे !"


" जो हुक्म! " रामप्रकाश ने शराफ़त से कहा और ज़ममोहन के हाथ से लिफाफे लिए और बगल में खडी उनकी कार में रखकर वापस आया । फिर देवराज चौहान के हाथ से लिफाफे लेकर, उंनकी कार में रख आया-- "कोई और सेवा हो तो बताईये । वो भी ।"


" जल्दी मत कर !" जगमाहन खुले दरवाजे से कार के भीतर बैठते हुए बोला---"बतायेंगे ।"


देवराज चौहान भी उसकी बगल में बैठ गया ।


रामप्रकाश ने कार का दरवाजा बंद किया और आगे वाली सीट पर बैठते हुए, स्टेयरिंग सीट पर बैठे व्यक्ति से कहा ।।



"चल भई ।"


उसने कार स्टार्ट की । बैक की । फिर पाकिग से निकलकर सड़क पर आकृर दौढ़ने लगी ।


रामप्रकाश गर्दन घुमाकर दोनों को देखता हुआ मुस्कराकर बोला ।



"आज का दिन बहुत अच्छा रहा । मैं डर रहा था किं कहीं तुमसे झगडा न हो जाये । नहीं हुआ । तुमने मेरी मज़बूरी समझी । बहुत खुश हूं मैं !"


"तेरे बाप का नाम क्या हैं?"


"ओमप्रकाश ।"



" मां का नाम ?"



" रामबती ?" रामप्रकाश ने उंसे देखा-'"क्यों पूछा?"



"मन में आया पूछ लिया । तेरे को दिक्कत क्या?"


"नहीं ।"रामप्रकाश मुस्करा पड़ा-"कहो तो भाई-बहनों कै नाम ।"



" बो बाद में । अभी इतना ही बहुत है।" कार तेजी से दोड्री जा रहीँ थी।



रामप्रकाश सीधा होकर बैठा ।


मोवाइंल फोन निकाला ।


नम्बर मिलाया । बात की ।








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  #50888  
Old 26th February 2017
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जुआरी 11



"हां I मैं । देवराज चौहान साथ है मेरे ! बोल, किधर पहुंचूं ? बढिया रहा । बढिया बंदा हे ।.. .ठीक है । पन्द्रह मिनट में हम तेरी बताई जगह पर पहुच रहे हैं ।" कहकर उसने फोन बंद कर दिया ।


"ओमप्रकाश से बात कर रहा था !" जगमोहन ने रामप्रकाश पूछा !!



"ओमप्रकाश-वो तो मेरा बाप.. .।" कंहते-कहत्ते वो ठिठका l गर्दन घुमाकर जगमोहन को देखा । मुस्कराया---"क्यों मुझे खींच रहा है । जितना हू उतना ही रहने दे I लम्बा मत कर !"



"किससे बात की?" जगमोहन ने पूछा !



"दस मिनट की बात है । उसके पारा पहुच जायेंगे । देखना उसे ।"


"उसी ने हमसे बात करनी है?"



"नहीं । वो-तुम दोनों को असल बंदे तक ले जायेगा ।"


रामप्रकाश ने कहा । खामोश बेठे देवराज चौहान ने कश लिया ओरे सिग्रेट खिडकी कै बाहर उछाल दी ।





. पन्द्रह मिनट बाद, सढ़क किनारे जहां कार रूकी, वहां एक कार पहले से ही मौजूद थी । उसमें तीन लोग थे I एक बाहर खड़ा था I



रामप्रकाश वाली "एसेन्ट" कार के वहां पहुचते ही, बाहर खडे व्यक्ति ने झुककर कार कै भीतर बैठे व्यक्ति से कुछ कहा तो भीतर बैठा व्यक्ति बाहर निकला । दोनों एसेन्ट कार की तरफ बढ गये ।


एसेन्ट से रामप्रकाश और कार चलाने वाला बाहर निकल रहे थे ।


उनके पास पहुचते ही रामप्रकाश ने मुस्कराकर भीतर की तरफ इशारा किया ।


उनमें से एक ने भीतर झांका । देवराज चौहान से उसकी नजरे टकराई । कई पलों तक वो देवराज चौहान को और देवराज चौहान उसे देखता रहा ।


"गुड I उस व्यक्ति ने सिर हिलाया और सीधा. खड़ा हो गया I



"क्या मामला है रामप्रकाशा ये तेरा बाप ओमप्रकाश तो नहीं लगता?" जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा ।




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  #50889  
Old 26th February 2017
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12



" कुछ देर की बात है !" रामप्रकाश फौरन कह उठा---"आप दौनों मेरे पर भरोसा रखिये । सब ठीक है ।"



"ठीक न भी हो तो हमें ठीक करना आता है । तेरे भरोसे की जरूरत नहीँ ।" जगमोहन का स्वर पहले जैसा ही था ।


बो व्यक्ति रामप्रकाश वाली सीट पर, कार में बैठा ।


दूसरे ने ड्राईविंग सीट सभाल ली ।


देखते-ही-देखते कार आगे बढ़ गयी ।


रामप्रकाश और कार चलाने चाला वहीँ सढ़क पर खड़े रह गये थे । रामप्रकाश की सीट पर जो व्यक्ति बैठा था, उसने कीमती कपडे पहन रखै थे । कलाई में कीमती घडी थी । हाथ की उगलियों में दो हीरे की अंगूठियां । चेहरे से ही पैसे वाला व्यक्ति लगता था ।



देवराज ओर जगमोहन से वो कुछ नहीं बोला था ।



कार दौडी जा रही थी I


"कौन हो तुम ।" जगमोहन ने पूछा ।



"विवेक वोहरा । उसने बिना पीछे देखे शांत स्वर मे कहा "अभी कुछ मत पूछो l मैं ज्यादा जवाब नहीं दे पाऊगा । आघे घंटे की बात है । आपको खुद ही, जवाबं मिलने शुरू हो जायें ।"



"ये भी नहीँ बताओगे कि किसको, हमसे बात करने की जरूरत पढ़ गयी?"


विवेक वोहरा खामोश रहा ।



जगमोहन की बात का जवाब नहीँ दिया ।


कार सड़कों पर दौड़े जा रही थी ।



चालीस मिनट बाद एसेन्ट काली कार शहर के रिहायशी इलाकै मे स्थित छोटे से बंगले के गेट से भीतर प्रवेश कर के पोर्च मे जा कर रूक गई ।


छोटा सा पोर्च था I

एक कार ही एक वक्त मे खडी हो सकती थी। कार रुकते ही विवेक वोहरा ओर कार चलाने वाला बाहर निकले और उन्होंने पीछे कै दरवाजे खोले ।



देवराज चौहान और जगमोहन कै लिये इशारा था कि वे बाहर निकल आये ।



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  #50890  
Old 26th February 2017
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