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  #11  
Old 10th September 2013
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चाय पीने के बाद किशोरीलाल ने बंसी को पुचछा,विकी कहा है ?
बाबा तो अभी सो रहे है बंसी ने जवाब दिया.
ठीक है बंसी अब तुम काम पे लग जाओ और जैसे ही विकी फ्रेश हो जाए कैसे भी कर के मुझे खबर कर देना और बाद मे एक घंटे के लिए हमे अकेला छोड़ देना कहकर किशोरीलाल ने राजेश्वरिदेवी को बोला,तुम भी वाहा कम से कम एक घंटे के लिए मत आना
बंसी और राजेश्वरिदेवी ने हा मे सिर हिलाया.
बाद मे किशोरीलाल नीचे आया और पूरी हवेली का चक्कर काटना शुरू किया. ग्राउंड फ्लोर और दो मजले से लेकर पूरा कॉरिडर बाल्कनी, गार्डेन घूमकर करीब 10 बजे जब वो दीवानखाने मे प्रवेश कर रहा था कि बंसी भागता उसके पास आया और बोला, भैया, बाबा अभी अभी उठे है और आप को ही याद कर रहे है, मैने बोल दिया है की आप अभी उसे मिलने जा रहे हो.
ठीक है बंसी अब कम से कम एक घंटे के लिया उस कमरे मे मत आनाकिशोरीलाल ने सूचना दी.
भैया... बंसी की आखे फिर भीगी और गले मे खराश आ गयी.
किशोरीलाल ने उसकी पीठ पे हाथ फिराया और मौन भाषा मे ही सांत्वना दी कि विकी को कुच्छ नही होगा, हम ज़हर पी के भी उसे सुधार पाएँगे. उसकी आँखो की चमक देखकर बंसी ने दो हाथ जोड़े और धीरे धीरे किचन की और कदम बढ़ाए. थोड़ी देर तक किशोरीलाल उस पढ़े लिखे लेकिन वफ़ादार इंसान की चाहत को मान ही मान मे सल्यूट करता रहा और उसने विक्रम की रूम की और कदम उठाए.

विक्रम के रूम को बाहर से नॉक किया, विक्रम ने खुद आके दरवाजा खोला, कुच्छ पल तक वो देखता रहा और फिर बोला,अंदर आने के लिए तो कब से नॉक करने लगा.
और हाथ पकड़ कर किशोरीलाल को अंदर ले गया, दोनो बेड पर बैठे. कुच्छ देर तक दोनो मे से कोई कुच्छ नही बोला फिर किशोरीलाल ने बात प्रारंभ की,विकी मे तुझसे कुच्छ पुछना चाहता हू अगर तू बुरा ना माने तो.
क्या बात कर रहा है, एक दोस्त दूसरे दोस्त का बुरा मान सकता है क्या ? विकी ने जवाब दिया.मैं जानता हू तू सुनंदा और अंकल की मृत्यु के बारे मे पुछनेवाला है, अगर मैं तेरी जगह होता तो कल रात ही सबकुच्छ पुच्छ लेता, तू इतना धीरजवाला है कि कम से कम एक रात तो बिता सकता है. लेकिन अब मेरी बारी है, मैं कल रात कुच्छ बताने के होश मे शायद नही था, लेकिन आज पूरा ओ.के. हू, मेरी इच्छा है तू पुच्छे इसके पहले मुझसे पूरा सुन ले बाद मे तेरा जो जी चाहे सवाल कर, वो पूरी बात, हादसा क्या हुवा, कैसे हुवा, क्यू हुवा और मैने आज तक तुझसे क्यू च्छुपाए रखा वो पूरी बात पहले तू सुन ले एक स्वास मे विकी बोल गया और फिर गहरी सांस ली.
किशोरीलाल ने मौन ही रहना उचित समझा और ये मौन भाषा को स्वीकृति समझ कर विकी ने बोलना शुरू किया और करीब 20 मिनिट तक बोलता रहा जो कुच्छ उसने बोला वो हादसा कुच्छ इसी तरह था:

विक्रम, नारायनप्रासाद. उसकी धर्मपत्नी और सुनंदा ने तीर्थयात्रा की शुरुआत सौराष्ट्रा फेमस और बारह ज्योर्ठिलिंग मे प्रमुख सोमनाथ ज्योर्ठिर्लिंग से की थी, बाद मे तुल्सिषयाम, द्वारका, ओखा, शिर्डी, उज्जैन, जगन्नाथ पूरी, कोनर्क, कॅल्कटा (उस टाइम कोलकॅटा का नाम कॅल्कटा था) काली माता टेंपल, गंगासागर तीर्थ, देल्ही, आगरा, बनारस, वाराणसी, त्रिवेणी संगम अल्लहाबाद से होकर फिर अट्मॉस्फियर अच्छा नही होने की वजह से साउत की और मदुरै, तिरुपति, रमेश्वरम और लास्ट मे कन्याकुमारी होकर वे लोग और आगे का प्लान करने वाले थे.


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  #12  
Old 10th September 2013
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जब वे लोग शिर्डी मे पहुचे और दर्शन के लिए लाइन मे खड़े थे, करीब एक घंटा लाइन मे वे लोग खड़े रहे तो विक्रम ने थके हुवे नारायनप्रासाद और अंटी को एक बेंच पे बिठाया और बोला की जब हमारी बारी आएगी तो वो खुद आके ले जाएगा और खुद फिर लाइन मे जाकर सुनंदा के साथ खड़ा हो गया. बस अब थोड़ी ही देर मे श्र्डी के साईबाबा के दर्शन होनेवाले थे, दूर से साईबाबा की मूरत दिखाई दे रही थी और विक्रम का मन भाव विभोर हो गया और पहले उसने मन ही मन प्रार्थना की और फिर हिम्मत कर के अपने प्यार का इज़हार सुनंदा के कानो मे किया कि वो उसे चाहता है और अगर सुनंदा भी वोही चाहती है तो वो आगे नारायनप्रासाद को बताने की हिम्मत करे वरना वो बात वोही ख़तम करेगा और फिर आगे कभी वो इसके बारे मे ना तो सोचेगा और ना तो कोई फ़र्क पड़ेगा उसके मन मे.
उसके असचर्या के बीच मे सुनंदा ने करीब 10 मिनट बाद साईबाबा की मूरत के पैर लगने के बाद स्वीकृति दे दी. विक्रम एकदम खुशी से पागल हो गया और दौड़ के उसने सब से पहले नारायनप्रासाद और आंटी के पैर छुवे. दोनो ने आशीर्वाद देकर पुचछा भी की आज क्या हुवा कि वो पैर पड़कर आशीर्वाद लेना चाहता है. विक्रम ने उसे पहले दर्शन के बोला और फिर वो सबकुच्छ बताएगा ऐसा कहकर दोनो को पहले दर्शन करवाया और फिर जब खाना ख़ाके शिर्डी से उज्जैन की ओर यात्रा शुरू हुई और दोनो बुजुर्ग ने बस मे ही नींद लेकर थकान दूर कर दी तभी विक्रम ने सबकुच्छ बताना उचित समझा था.

जब विक्रम ने सबकुच्छ बताया कि वो और सुनंदा एकदुसरे को चाहते है, और सुनंदा को जब नारायनप्रासाद ने पुचछा तो उसकी नज़रे भी ज़मीन देखने लगी तो दोनो पति पत्नी समझ गये और ज़ोर से हॅस्कर दोनो के प्यार को स्वीकृति दे दी. नारायनप्रासाद ने बताया की आज उसका जी हलका हो गया. आज उसका जिगरी दोस्त गंगाधर होता तो कितना खुश होता कि अब उसकी दोस्ती रिस्त्ेदारी मे बदलने जा रही है. ये सुनकर विक्रम की तो आनंद की कोई सीमा ना रही. फिर तो उज्जैन और पूरी मे दोनो ने महादेव और कृष्णा के आशीर्वाद भी ले लिया. नारायनप्रासाद ने उसे वचन दिया की तीर्थयात्रा समाप्त होते ही वो सगाई का शुभ मुहूर्त निकालेगे और अगले जाड़े मे दोनो की शादी भी करवा देंगे. ये सुनकर सुनंदा की आँखे शर्म से झुकी और विक्रम भी तिर्छि नज़रो से उसे देखता रहता था.

फिर वे लोग कोनर्क पहुचे. वैसे तो ये तीर्थयात्रा मे समाविष्ट नही था लेकिन टूरिस्ट बस हमेशा यंग कपल्स के लिए कोनर्क ज़रूर ले जाते है. कोनर्क का फेमस सन टेंपल उस जमाने की कामकला को मूर्ति के स्वरूप मे प्रदर्शित करता है. खास करके यंग कपल के लिए कामोत्तेजक मूरत मंदिर की चारो और लगाए हुवे है. पूरा टेंपल को एक रात का स्वरूप दिया गया है. रात के पहिए मे घड़ी का नाकषिकं किया गया है. गाइड बोल रहा था की जब सूरज की किर्ने इस रात पे गिरती है और सूरज की किर्ने और जहा किर्ने नही गिरती वो अंधेरे के सपोर्ट से उस जमाने मे समय का अंदाज़ा निकाला जाता था कि आक्चुयल टाइम क्या हुवा है. जैसे जैसे सूर्य आगे बढ़ता जाएगा वैसे वैसे उसकी किर्ने और अंधेरा बदलता जाता है उसी के आधार पर एग्ज़ॅक्ट टाइम समजज़ मे आता है. इसीलिए ये टेंपल सूर्य मंदिर के नाम से फेमस है.

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  #13  
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इतना समझा कर गाइड बोला अब सिर्फ़ यंग्स्टर्स मेरे साथ आए और बाकी लोग पिछे पिछे अपनी अपनी तरह से बढ़ते रहे.

कोनर्क टेंपल की शुरुआत मे ही रात के पहिए आते है, बाद मे शुरू होती है कामलीला की इंट्रेस्टिंग नक्काशी से, पत्थरो से बनाए हुवे बड़े बड़े मूरत. टेंपल की चारो ओर ऐसी कई मूर्तिया है. एक के बाद एक सेक्स के आसनो के बारे मे वो गाइड बताए जा रहा था और विक्रम एकदम रस्विभोर होकर देखता भी जा रहा था और सुनता भी जा रहा था. सुनंदा चुपचाप नीची नज़ारे झुकाए दो कदम पिछे चल रही थी. कभी कभी तिर्छि नज़ारो से वो भी देख लेती थी. लेकिन पुरुष और स्त्री के आंतरिक अंगो को भी बड़ा करके पत्थरो के मध्यम से सेक्स के हर आसान को बखूबी से वाहा तराशा गया था. तो सब के सामने सुनंदा उसे देखने मे संकोच महसूस कर रही थी. लेकिन विक्रम तो बड़ी जिग्यासा से सबकुच्छ देख रहा था. वो तो सबकुच्छ देखा के पागल हो गया था. कोई कोई आसान तो देखकर वो सोच रहा था की ऐसे आसान तो उसने कभी नही आज़माए.

उसने पलटकर सुनंदा की ओर देखा तो वो शर्मकार नज़ारे झुका बैठी. विक्रम ने हस्कर उसका हाथ थाम लिया तो सुनंदा के बदन मे बिजली दौड़ गयी, वो तो ठीक खुद विक्रम का बदन भी थर रा उठा. दोनो के हाथ की हथेली सिकुड़कर एक हो गयी, जिस्म की गर्मी दोनो महसूस कर रहे थे. विक्रम ने हाथो से सुनंदा की नज़ारे उठाई और मौन भाषा मे ही समझा दिया की ये स्वाभाविक है. हर कोई कपल यही देख रहा है, तो उसे भी देखना चाहिए, आख़िर यही सबकुच्छ आगे काम आनेवाला है. उसकी आँखो मे शरारत देखकर सुनंदा मुस्कुराइ और शरमा कर सिकुड गयी. जब विक्रम के लाख कोशिश के बाद भी उसने नज़रे नही उठाई तो विक्रम ने हाथ छ्चोड़ दिया और कोई फॉरिन गर्ल्स देख रही थी उसके पिछे जाकर खड़ा हो गया और नज़रे उठाकर सबकुच्छ देखने लगा. वो ऐसे खड़ा था कि उसके और वो फोरेंग गर्ल के बीच मे फासला बिल्कुल कम था. फॉरिन मे तो ये मामूली बात थी तो किसी ने वाहा ध्यान भी नही दिया, लेकिन सुनंदा ने जब देखा तो आँखो से उसने विक्रम को वाहा से हट जाने का इशारा किया, लेकिन विक्रम और नज़दीक गया. अब सुनंदा की आँखो मे प्यार का गुस्सा आया और वो भी नज़रे उठाकर आराम से सबकुच्छ देखने लगी और बिल्कुल गाइड के पास आकर खड़ी हो गयी. अब गाइड सुनंदा की नज़रो मे इंटेरेस्ट देखकर उसको ही सबकुच्छ समझाने लगा तो विक्रम झट से सुनंदा के पास आकर खड़ा हो गया और उसके शोल्डर पे अपना हाथ रख दिया.

जैसे ही सुनंदा ने विक्रम का हाथ अपने शोल्डर पर महसूस किया, उसने मूह अभी भी पत्थरो की मूरत पर ही रखा और जैसे विक्रम को पहचानती ही नही ऐसे देखती रही, पलटकर भी नही देखा. 1 मिनट तक विक्रम ऐसे ही खड़ा रहा. लेकिन तभी वो गाइड सेक्स के एक उच्त्तम आसान के बारे मे समझाने लगा, सुनंदा अब ध्यान से, जिग्यासा से और नालेज लेने के लिए सुन रही थी और साथ मे विक्रम का साथ और उसके हाथो की गरमी महसूस कर रही थी. लेकिन अब विक्रम गाइड की बात सुनते ही और सुनंदा के जिस्म की गर्मी महसूस होने से गरम हो चुक्का था जिसका रिज़ल्ट उसके हाथो की मजबूती सुनंदा के शोल्डर पर बढ़ी.

अब ये माजरा कुच्छ सुनंदा के शोल्डर पर बर्दाश्त नही हो रहा था तो सुनंदा ने झते की नफ़रत से एकदम पलटकर विक्रम की और देखा, तो विक्रम की निगाहे भी पलटी और चार आँखे मिली तो कुच्छ पल एकदुसरे को देखती ही रही. अब सुनंदा की आँखे धीरे धीरे झुकने लगी, क्यूकी प्यार की गरमी वो नही सहन कर सकी. जब नज़रे झुकी तो विक्रम का कमर का हिस्सा नज़र मे आया. विक्रम ने ऑफ ब्लू की पेंट और वाइट टी-शर्ट और उपर ब्लू जॅकेट पहनी हुई थी जॅकेट और पेंट दोनो एक ही कलर और एक ही कपड़े से जैसे बना हो वैसा लगता था. उस टाइम फॅशन बेलबटम पेंट की हुवा करती थी तो पेंट नीचे से वाइड होती थी जैसे आजकल हम बुटकट या शूस कट कहते है वैसे हुवा करती थी (70 की फ़िल्मे देख लेना खास करके अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना की फ़िल्मे देख लेना). और पेंट कमर से कसी हुवी फिट हुवा करती थी. जैसे ही सुनंदा की नज़ारे झुकी और धीरे धीरे विक्रम की कमर पे अटकी तो पेंट फिट होने की वजह से बीच से एकदम तनी हुई देखी.

अब सुनंदा के लिए ये बिल्कुल नया नज़ारा था. नवयौवन के जिन्सी स्पंदन की पहली कशिश थी ये सुनंदा के लिए कि एक आदम को वोही नज़र से पहली बार देख रही थी जो हर प्रेमिका शादी के बाद पत्नी बनकर अपने प्रेमी को पति के रूप मे देखती है. एक प्रेमिका को शादी के बाद प्रेमी का प्रेम के साथ कुच्छ और भी चाहिए होता है. लेकिन ये तो विक्रम की कमर के नीचे के हिस्से की चौड़ाई का तनाव देखकर सुनंदा की आँखो मे कुच्छ अजीब एक्सप्रेशन आए. इसकी वजह से उसकी आँखे फिर उठी और विक्रम की आँखो से टकराई. अब चौकाने की बारी विक्रम की थी. हर बार सुनंदा मे विक्रम ने एक निर्दोष आँखे और मासूम चेहरा देखा था. लेकिन ये तो विक्रम था, बिल्कुल देशी दारू की तरह चालू आइटम, उसने सुनंदा की आँखो मे रताश देखी और पलक झपकते ही वो समझ गया की ये रेडिश आँखे अब शो करती है कि ये टॉप (बच्चो का खिलोना) अब अपनी धार तेज़ करना चाहता है. उसे ये भी समझ मे आ गया कि उसकी तनी हुई पेंट को देखकर सुनंदा की गरमी सिर से लेकर पाव तक बढ़ चुकी है.

विक्रम अपने आप को कैसे रोक पाता, उसका एक हाथ जो सुनंदा के शोल्डर पे था वो धीरे से अपने आप ही खिसका और सुनंदा के हाथो से फिसलता हुवा उंगलियो पे जा अटका. सुनंदा की हथेली की गर्माहट बुखार की तरह तेज़ हो चुकी थी. विक्रम की हथेली की गर्मी और सुनंदा की हथेली की गरमी टकराई और सुनंदा की हथेली जैसे ही मुठ्ठी मे परिवर्तित हो रही थी कि उसकी गरमाहट से पसीना पैदा हुवा और पसीने की वजह से अपने आप ही विक्रम की हथेली सरक कर सुनंदा की मुठ्ठी मे ना समाकर धीरे से सुनंदा की कमर पर अटक गयी.

एक मध्यम वर्ग ब्रामिन परिवार की बेटी सुनंदा की ड्रेस भी वैसी ही थी जैसे उस समाज की लड़किया पहना करती थी. सुनंदा ने सारी पहनी हुई थी. रेशम की बनावट से बॉटल ग्रीन कलर की सारी पे हल्का ग्रीन कलर का मॅचिंग ब्लाउस गुजराती औरत के तरीके से पहनी हुई थी. गुजरात औरत सारी का पल्लू लेफ्ट शोल्डर पे डालती है और इसकी वजह से मोस्ट ऑफ गुजराती औरत की नवल चाहे सारी नवल से नीची पहनी हो लेकिन नवल को ढूँढना मुश्किल होता है इसी तरह सुनंदा ने भी पूरे बदन को लपेटे हुए सारी पहन रखी थी और उसके उपर सारी के पल्लू का दूसरा एंड भी घूमकर राइट शोल्डर पे डाला था.

सुनंदा का चेहरा गोल और ब्रेस्ट अपनी आगे से थोड़े ज़्यादा और कमर भी गुजराती औरते की ज़्यादा रहती है. पूरे इंडिया मे सबसे ज़्यादा कमर साउथ और माहरॉशट्रे मे दिखाई देंगे उसे आप कमर नही कमरा कह सकते हो और सेकेंड नंबर. पे गुजराती और सबसे पतली कमर शायद पंजाब मे मिल सकती है. लेकिन ये कमर का मामला सिर्फ़ अनमॅरीड लड़कियो के बारे मे है. मॅरीड विमन आर ऑल ईक्वल. क्यो की उसकी कमर का द्वार खुल चुक्का होता है और जिसका द्वार खुला हो उसे कमर नही कमरा ही कहना ठीक होगा.

सुनंदा कोई स्मार्ट गर्ल नही दिख रही थी. वीटिश चेहरा था यानी कोई फॉरिन गर्ल वो नही दिख रही थी, लेकिन इस सारी मे वो कुच्छ हद तक अच्छी दिख रही थी. तो जैसे ही विक्रम का हाथ उसकी कमर पे ठहरा और रेशम की सारी की वजह से वो फिसलकर सारी की पल्लू के बीच जाकर अटक गया. सुनंदा ने सारी नवल के उपर के हिस्से तक पहनी थी लेकिन विक्रम की उंगलिया अब नवल के हिस्से के उपर खुल्ले पेट पर अटक गयी थी. अगर कोई देखता तो विक्रम की उंगलिया दिख नही रही थी क्यू की वो सारी के अंदर पल्लू के बीच डॅन्स कर रही थी. और गर्माहट, पसीना और बाहर की गर्मी की चिकनाहट से विक्रम की उंगलिया सुनंदा के खुल्ले पेट पर उपर नीचे फिसल रही थी. विक्रम की आँखे तो सुनंदा के रॅडिश हुए चेहरे को देख रही थी. वो बिल्कुल अंजान था की उसका हाथ सुनंदा के शोल्डर से कब फिसल कर पेट पर चला गया है.
********
क्रमशः................

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  #14  
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लेकिन कोई लड़की पहली बार जागृत अवस्था मे एक मर्द की उंगलिया अपने खुले पेट पर और वो भी सेक्स के आसनो की इतनी बाते सुनकर कैसे सफर कर सकती है. सुनंदा का बदन कराह उठा उसके होंठ (लिप्स) बंद होकर नाक के दोनो कॉर्नर अंदर बाहर होने लगे. लिप्स के नीचे का हिस्सा जैसे विंटर के मौसम मे दांतो मे टकराता है वैसी ही हालत सुनंदा की हो गयी. अब वो होश खोने लगी थी, बॉडी लेंग्वेज मदहोशी के बादल छाने की दस्तक दे रहा था. छाती तेज़ी से धड़कने लगी और मूह से तेज़ साँसे अंदर बाहर होने लगी. (ये सुनंदा का बाहरी अनुभव दिखाई दे रहा था, सारी के अंदर की बाते सिर्फ़ वो ही जानती थी, इसीलिए यहा लिखा नही है). जब विक्रम होश मे आया तो उसने देखा की सुनंदा मदहोशी मे जा रही है तब उसे अपनी उंगलियो के जादू का एहसास हुवा. और इस मौके को कोई मर्द क्यू छ्चोड़ेगा. विक्रम ने फिसलती हुई उंगलियो को कंट्रोल किया और सुनंदा की सारी के पल्लू मे से उंगलियो को साफ तरीके से सुनंदा के खुले पेट को सहलाने लगा और एक कदम नज़दीक आकर दोनो के बीच की दूरी और कम कर दी ता कि दूसरो की नज़रे कभी भी ना समझ पाए के विक्रम का हाथ क्या जादू कर रहा है. सुनंदा की मदहोशी मे भी उसके जाग्रत मन ने ऑर्डर दिया की आगे बढ़ो यानी कदम आगे बढ़ाओ तो सुनंदा अपने आप एक कदम जैसे ही पिछे हटी की विक्रम की उंगलियो ने अपने आप उसकी पूरी कमर पर ज़ोर लगाकर कस ली. ये शारीरिक आकर्षण, शारीरिक स्पर्श, आवेग, प्यास की मदहोशी मे भी सुनंदा जैसे ही दूर हटना चाही, विक्रम ने एक ही क्षण मे पूरा हाथ उसकी कमर पर लपेट लिया. मजबूरी मे ही सुनंदा उसके साथ निकल पड़ी. अब दोनो कपल की तरह आगे बढ़ने लगे. सुनंदा की आँखे अभी भी बंद थी लेकिन उसका जागृत मन अब सो रहा था इस ऑर्डर के साथ की अब तू ही तेरी मालिक है बचना चाहती है तो बचके निकल वरना इस प्रेम के दल दल मे जा के मर.

कोई भी नादान लड़की प्रेम के दल दल से बच सकती है क्या ? (मैं जानता हू आप ने अपने मन मे ना ही बोला होगा, वो मैं समझ कर बता रहा हू) नही. तो क्या सुनंदा नादान नही थी ? लड़की नही थी ? वो भी इस दल दल मे गिरी, गिरी क्या फसि और उसके कदम अपने आप ही विक्रम के साथ पड़ने लगे, अब उसकी आँखे खुली, स्पष्ट वासना से भरी पड़ी थी वो आँखे. विक्रम की आँखे हस रही थी ना जाने कह रही हो कि क्यू, आख़िर मैने तुझे हरा ही दिया ना. दोनो की शर्म तो जैसे गायब हो चुकी थी और अब सुनंदा पहली बार एक मर्द के साथ धीरे धीरे खुल रही थी. इसीलिए सुनंदा की आँखे अब आराम से चारो ओर घूम रही थी और जो भी नज़ारा वाहा था वो सब कुच्छ एक ही नज़र मे भर रही थी. लेकिन अब विक्रम का मन कही और चला गया था. उसके पैर और हाथ तो सुनंदा के साथ थे लेकिन मन अब सुनंदा को पत्नी के स्वरूप मे देखने को बेताब था. और ख़याल आते ही उसके हाथ की मजबूती सुनंदा के कंधो पे और बढ़े जैसे कह रहे हो कि मैं ज़िंदगीभर के लिए ये सहारा दूँगा.

करीब एक घंटे वो दोनो ऐसे ही घूमते रहे, दोनो मे से किसी ने कुच्छ नही बोला सिर्फ़ कुदरत के नज़ारो को महसूस किया और वापस टेंपल के बाहरी हैस्से पे खड़े हुवे नारायनप्रासाद और आंटी के पास जाने लगे. अब विक्रम ने हाथ अपने जॅकेट मे च्छूपा लिए थे. सुनंदा भी शरमाई हुई सी अपने मबाप के सामने आ रही थी. उसे कुच्छ अजीब लग रहा था कि जो नज़ारा वो विक्रम के साथ देख की आ रही है, वो नज़ारा पिछे या आगे उसके पेरेंट्स ने भी देखा है, तो वो लोग क्या सोचेंगे. अब उसे पछतावा होने लगा कि वो क्यू दौड़ के विक्रम के साथ चली गयी, अपने पेरेंट्स की शर्म तो कम से कम रखनी थी उसे. लेकिन फिर याद आया कि अगर वो नज़ारा अपने पेरेंट्स के साथ भी कहा देखने लायक था. इसीलिए अपने मन ही मन अपने आप को तसल्ली दे रही थी कि जो कुच्छ हुवा अच्छा ही हो रहा था. उसे भी पहली बार विक्रम का एकांत मिला और पहली बार रोमांच का एहसास हुवा. आज उसको पता चला कि प्यार, रोमॅन्स किसे कहते है. एक लड़की क्यू प्यार मे इतनी पागल हो जाती है, क्यू मदहोशी के बादल जीवन मे च्छा जाते है. दुनिया क्यू रेनबो की तरह रंगीन हो जाती है. अब उसका मन उसे सवाल पुच्छ रहा था कि अब ऐसा विक्रम का साथ दूसरी बार कब मिलेगा. वो स्पर्श, रोमांच का सामना फिर से कब होगा. चारो बिना कुच्छ बोले टेंपल से बाहर निकले और टूरिस्ट बस मे बैठे और बस आगे निकल पड़ी.

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इतना कहकर विक्रम थोड़ा ठहरा और पानी पीने के लिए खड़ा हुवा, किशोरीलाल सोच रहा था कि क्या विक्रम जो बोल रहा है वो सत्य है या उसकी सेन्स जो बता रही है वो सत्य है, सत्य तो सिर्फ़ परमात्मा जानते थे या तो विक्रम. लेकिन सत्य का पर्दाफाश कब होगा ये तो कोई नही जानता था, ना तो किशोरीलाल और ना तो कोई और

पानी पी के फ्रेश होने के बाद विक्रम ने आगे बताना शुरू किया :
फिर रास्ते मे कुच्छ ज़्यादा बाते नही हो पाई, टूरिस्ट वालो ने नाइट हौल्ट भुवनेश्वर तय किया था. कोनर्क से बुवानेश्वर आते आते शाम ढाल चुकी थी. बुवानेश्वर के रेलवे स्टेशन के पास एक धर्मशाला मे नाइट हौल्ट रखा गया था. वाहा जाके सब अपने अपने रूम मे गये, अभी खाने की देरी थी इसीलिए टूरिस्च्वॉवो ने सूचना दी थी की अगर कोई भुवनेश्वर लोकल घूमना चाहे तो 3 या चार घंटे है इसके बाद पूरी रात वही आराम करना था और सुबह आगे बढ़ना था. मौका देख के विक्रम ने हिम्मत दिखाई और नारायनप्रासाद को बोला,अंकल क्यू ना हम मार्केट मे चले कुच्छ शॉपिंग भी हो जाएगी और घूमना फिरना भी हो जाएगा. नारायनप्रासाद ने बोला,हम तो थक चुके है, अगर तुम्हारा मन है तो तुम घूम के आ जाओ. विक्रम को थोड़ी निराशा तो ज़रूर हुई क्योकि अगर बाहर जाने को होता तो थोड़ी देर के लिए सुनंदा का साथ मिल जाता. लेकिन अब क्या हो सकता है. लेकिन उसका लक अच्छा था. उसकी बाजू वाली सीट के यात्रिओ मे से दो तीन कपल्स शॉपिंग के लिए जा रहे थे उसकी लॅडीस सुनंदा को आने के लिए बोल रही थी. जाने का मन तो सुनंदा का भी था लेकिन कैसे बोलती. जब वो इनकार कर रही थी तभी नारायनप्रासाद ने बोला,बेटी ये लोग बोल रहे है तो तुम भी कुच्छ खरीद कर लो यहा से, फिर बार बार तो यहा आना नही होता.सुनंदा बोली,पिताजी, आप लोग थके हुए है तो मे कैसे अकेली चली जाउ, वैसे भी अकेले मेरा मन नही कर रहा है

अरे तो विक्रम को साथ ले के जा ना. नारायनप्रासाद ने कहा ही था कि विक्रम जो रूम के बाहर विंडो के पास खड़ा था वो उच्छलकर अंदर आ गया. डॉक्टर ने बोला की सेहत के लिए स्वीट खानी चाहिए जैसा घट खड़ा हुवा था. नेकी और पुच्छ पुच्छ. सुनंदा ने उसे अंदर आया तो देखा इसीलिए जानबूजकर बोली,लेकिन पिताजी, मैं इनके साथ जाकर भी क्या करूँगी, बोर हो जाउन्गी.

विक्रम तो देखता ही रह गया. बड़ी आँखे फटी रह गयी थी. वो मन मे गली दे रहा था कि साली मौका मिल रहा है तो नखरे कर रही है. सुनंदा ने हसी मूह मे च्छुपाई और चोर नज़र से विक्रम को देखकर बाई आँख झपका कर उसे चिड़ाया.

लेकिन नारायनप्रासाद पलटकर सुनंदा की ओर पलटे और बोले,क्या बोली तू इसके साथ तो बोर हो जाएगी, मैं क्या तेरी मा से बोर हुवा हू कभी ? अरे इसके साथ ही तुझे चार फेरे लेने है तो क्या पूरी ज़िंदगी बोर नही होगी तू?

शर्म से लाल हो गयी सुनंदा, कुच्छ ना बोल सकी अपने बाबूजी से लेकिन अब विक्रम की बारी थी वो बोला,नही बाबूजी रहने दो ना वैसे भी आप थके हुए है और यहा से क्या खरीद करना अगर इसका (सुनंदा का) मन नही करता है तो छ्चोड़ो ना नही चलते है.

अब तू चुप बैठ और जा सुनंदा के साथ और जो भी जी चाहे दोनो खरीद कर लो और जल्दी जाओ ता कि खाने के वक़्त वापस आ सको, देखो यहा शाम जल्दी ढल चुकी है (भुवनेश्वर मे शाम को 5.30 बजे अंधेरा सा छाने लगता है)

अब दूसरे टूरिस्ट्स ने भी ज़ोर डाला और दोनो साथ मे निकल पड़े. सब साथ मे निकल कर रोड पर आए और लोकल बस मे बैठकर एक दो टेंपल घूमे तो एक घंटा तो ऐसे ही निकल गया तब तक सुनंदा और विक्रम सब साथ होने से चुप चाप सब देख रहे थे.दोनो मे कुच्छ खास बातचीत नही हो रही थी. लेकिन अब उनमे से कुच्छ कपल्स वाहा का फेमस इंदिरा गार्डेन के लिए रवाना हो रहे थे तो उस कपल्स के साथ विक्रम और सुनंदा ने जाने का फ़ैसला किया. क्यूकी वो भी यंग कपल्स थे और ये भी दो दो कपल्स अलग होकर ऑटो मे गार्डेन चले गये. दोनो कपल्स ने बाद मे शॉपिंग करने की सोची थी लेकिन पहले गार्डेन मे पहुचे. गार्डेन मे प्रवेश करने के बाद थोड़े दूर चलते रहे, अंधेरा छा चुक्का था और गार्डेन मे कोई नही दिख रहा था, तो विक्रम को तो मज़ा आया लेकिन दोनो लॅडीस ने बताया की यहा तो कोई नही है तो वापस चले. अब विक्रम ने भी दूसरे जेंट्स बोला, हा दोस्त यहा तो कुच्छ मज़ा नही आ रहा है.

दूसरा बोला,कैसे आदमी हो तुम यहा दूर तक क्या झक मारने के लिए मैं लाया हू, मे पहले भी यहा आ चुक्का हू, थोड़े दूर चलो फिर नज़ारा दिखाता हू फिर विक्रम के कानो मे धीरे से बोला,बच्चू, मैं जानता हू कोनर्क देखने के बाद यहा आना ज़रूरी होता है. मेरी भी शादी नही हुई है लेकिन थोड़ी प्रॅक्टीस तो कर लू यहा.

विक्रम बोला,क्या मतलब ?

अरे मतलब छ्चोड़ो सामने देखो वो आदमी बोला.
सामने विक्रम को कुच्छ नही दिखाई दिया तो बोला,क्या, सामने तो कोई भी नही है.

अबे यार वाहा नही वो पेड़ के पिछे जो अंधेरा है वाहा देखो ना कहकर उसने उंगली से राइट साइड पे इशारा किया. सब की नज़रे वाहा घूमी और सब देखते ही रह गये. उस गार्डेन के थोड़ा आगे जाने के बाद जहा लाइट नही पहुचती ऐसे जगह के पेड़ के पिछे या खुले आम कई कपल्स अपनी मस्ती मे बैठे थे. कोई नज़दीक बैठकर बाते कर रहे थे, तो कोई एकदुसरे की बाँहो मे व्यस्त थे, कोई एकदुसरे को किस कर रहा था तो कोई कपल्स ठंडी नही थी फिर भी चदडार ओढकर बैठे थे. ये दिखाकर दूसरा बोला,देखो भैया गार्डेन के प्रवेष्द्वार पे 45 मिनट के बाद मिलते है तब तक ना तो तुमलोग मुझे डिस्टर्ब करना नही हम आएँगे आप को डिस्टर्ब करने के लिए. इतना कहकर वो अपनेवाली गर्लफ्रेंड को लेकर अंधेरे मे च्छू हो गया.

अब सुनंदा और विक्रम अकेले थे. थोड़ी देर तो खड़े रहे अब सुनंदा शर्म से नज़रे झुकाए खड़ी थी और विक्रम कोई खाली जगह ढूँढ रहा था. वाहा से 35 कदम दूर एक छ्होटा सा पेड था, थोड़ी खुली जगह थी इसीलिए वाहा भीड़ कुच्छ कम थी वाहा इशारा कर के विक्रम बोला,वाहा चलते है.

चुप चाप सुनंदा उसके पिछे चलती रही. दोनो वाहा पहुचे ती विक्रम झट से बैठ गया लेकिन सुनंदा चारो ओर देख रही थी. विक्रम बोला,क्या देख रही हो.
यहा तो कई लोग बैठे है सुनंदा बोली.
तो क्या तुम कही ओर जहा कोई ना हो वाहा चलना चाह रही है ? विक्रम ने पुचछा.

नही मेरा ये मतलब नही था. सुनंदा बोलकर शर्मा गयी वो जानती थी कि उसने कुच्छ ग़लत बोल दिया है. विक्रम बोला,तो फिर यहा क्या खराबी है देखो यहा कई लोग है लेकिन किसी को देखने की फ़ुर्सत ही कहा है. 10 मिनट से हम देख रहे है, कोई माई के लाल ने हमारी तरफ मुड़ के भी देखा है क्या ? तो जहन्नम मे जाए दुनिया चल यहा आ के बैठ वरना ऐसे ही समय निकल जाएगा

सुनंद झट से बैठ गयी लेकिन दोनो के बीच 1 फुट की जगह थी. 1 मिनट विक्रम देखता रहा फिर बोला,हे भगवान क्या मुसीबत है
क्यू क्या हुवा ? सुनंदा बोली.
यहा क्या बस मे बैठे है और क्या तेरे पापा हैं साथ मे कि इतनी दूर बैठी हो विक्रम चिल्लाया. कहा दूर हू पास तो हू सुनंदा बोली और फिर ज़्यादा पास आई तो आप क्या शांति से बैठने देते ?
क्यू मैं क्या करता तुम्हे खा जाता क्या ? मैने आज तक कुच्छ किया है तुम्हे ? विक्रम ने पुचछा.
बस इतना ही करना बाकी रह गया है. सुनंदा बोली.
विक्रम अब सीरीयस होकर बोला,क्या सच मे मैने तुम्हे हर्ट किया है कोनर्क मे. सुनंदा ने विक्रम को गिल्टी फील करते हुए देखा तो बोल उठी,नही मेरा ये मतलब नही था, मैं तो मज़ाक कर रही हू ऐसी मज़ाक का ये समय नही है विक्रम अब नॉर्मल टोने मे बोला उठा.
तो कैसा समय है ?सुनंदा ने फिर चिदाना शुरू किया.
बता दू सच मे ? विक्रम बोला. अब उसकी आँखो मे शरारत देखकर और मदहोशी का अट्मॉस्फियर महसूस करके सुनंदा बोल उठी,बता दो लेकिन उसे पता नही था की उसने जो बात बोली है वो चिडाने के लिए बोली थी और विक्रम ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे खिचकर कुच्छ दूरी कम कर दी. दोनो का चेहरा नज़दीक आया आधे मिनट तक एकदुसरे की आँखे चार हो गयी और विक्रम ने बता दू क्या का इशारा आँखो से किया. सुनंदा ने नज़रे झुका दी. अभी वो कुच्छ समझे सोचे इतने मे विक्रम ने जल्दी से दोनो हाथो से उसे बाँहो मे भर लिया और ये गरम साँसे, मदहोशी का अट्मॉस्फियर और जिस्म की गरमी को सुनंदा कंट्रोल करे उसके पहले विक्रम ने अपने होठ सुनंदा के होंठो पर रख दिए. सुनंदा को किस का पहला अनुभव था इसीलिए जैसे ही उसके होंठो ने विक्रम के होंठो की नर्मी महसूस की वो झट से दूर हटी, लेकिन विक्रम की सख्ती ज़्यादा थी और विक्रम ने अब कस के होंठो से सुनंदा के होंठो को काटना शुरू किया. 5 सेकेंड मे सुनंदा हार गयी और उसकी सांस फूलने लगी, सब ज़ोर चला गया, वो विक्रम के बॉडी पर गिरने लगी. आँखे बंद हो चुकी थी दोनो की. विक्रम अब होंठो से सुनंदा के होंठोको चूस रहा था. सुनंदा के हाथ ज़मीन से उठकर विक्रम के सिर के बालो पर चले गये और वाहा सहलाने लगे थे. समय गिरा जा रहा था और मदहोशी च्छा चुकी थी, जिस्म गरम हो चुके थे, सब्र का बाँध टूट चुका था, मर्यादा पिघल चुकी थी, दो जिस्म गरम होकर एकदुसरे के करीब आ चुके थे. विक्रम और सुनंदा दोनो की साँसे जोरो से चल रही थी. सुनंदा की छाती जोरो से धड़क रही थी जिसकी वजह से बार बार विक्रम की छाती से टकरा रही थी. अभी भी विक्रम पैर उल्टा करके बैठा था और सामने सुनंदा पैर उल्टा कर के बैठी थी तो दोनो के आलिंगन की व्जह से सुनंदा संतुलन खो रही थी और उसके पैर की अंगड़ाई ज़्यादा हो रही थी. इसकी वजह से अभी सुनंदा की छाती पूरी तरह से विक्रम के जिस्म से नही चिपकी थी. 3 मिनट के बाद इतनी साँस फूल गयी के सुनंदा के होंटो पर दर्द भी महसूस हो रहा था. और विक्रम ने आँखे खोल के अपने होठ वापस लिए. सुनंदा तेज़ी से साँसे फूला रही थी. जैसे ठंड के मौसम मे बॉडी कांपती है ऐसे सुनंदा का पूरा शरीर काँप रहा था. उसने आँखे खोली. सुनंदा की आँखे बहुत बड़ी थी. अंधेरे मे भी स्पष्ट विक्रम ने उसकी आँखो मे रॅडिश देखी. नीचे पेंट मे गरमाहट बढ़ती ही जा रही थी. अब विक्रम ने सुनंदा की आँखो मे प्यास देखी, क्यू की इस बार सुनंदा की नज़रे उठी हुई ही थी, उसकी नज़रे नही तो झपकी मार रही थी, ना तो नीचे झुक रही थी. इसका मतलब वो अभी भी कुच्छ ज़्यादा किस्सिंग का एहसास करना चाहती थी. लेकिन उल्टा पैर रख के विक्रम के घुटनो पे दर्द हो रहा था. वो अब दोनो पैर सीधा करके बैठ गया और सुनंदा कुच्छ और सोचे समझे इस के पहले उसने सुनंदा की बाँहो को पकड़ कर खीच के अपने गोद मे झूला दिया और फिर अपने होंठो से कार्य प्रारंभ किया. इसबार उसको कुच्छ नही करना पड़ा. सुनंदा ने अपने होंठो से विक्रम को काटना शुरू किया, इसका मतलब वो इतनी गरम हो चुकी थी की उस से अब रहा नही जा रहा था. पूरा जिस्म पिघल रहा था. विक्रम का साधन पेंट फाड़ने को बेताब था. कुच्छ मिनट के बाद विक्रम के हाथ मे सुनंदा की पूरी बॉडी नीचे सरकती चली गयी. इसकी वजह से अब सुनंदा पूरी तरह से विक्रम की गोद जा चुकी थी उसके पैर लंबे विक्रम की दाई ओर फैले पड़े थे. अब गोद मे आने की वजह से विक्रम का नीचे का तनाव सुनंदा की पीठ पर महसूस हो रहा था. लेकिन चुंबन की गर्मी की वजह से अभी सुनंदा पूरी खो चुकी थी, वो नशीली बेहोशी मे खो चुकी थी. वो विक्रम के पेंट के तनाव से बिल्कुल अंजान थी. विक्रम ने अब सुनंदा की जीव को चूसना शुरू कर दिया था, तो पहली बार सुनंदा के मूह से आहे निकलने लगी, सांस तो पहले से ही फूली हुई थी, सुनंदा के स्तन अब विक्रम की छाती से चिपक गये थे. विक्रम का नीचे का तनाव बढ़ता ही जा रहा था अब वो स्पष्ट रूप से सुनंदा को पिछे टक्कर मार रहा था.
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क्रमशः................



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दोनो एकदुसरे मे इतने खोए हुवे थे कि आस पास का कुच्छ ध्यान दोनो को नही था. अब विक्रम ने सुनंदा के होंठो से लेकर गाल चूमना शुरू किया और इसके बाद विक्रम के लिप्स एक्सप्रेस ने स्पीड ली और गले की तरफ प्रस्थान किया सुनंदा के गले को कस के चूम लिया और लिप्स एक्सप्रेस फिसलती हुई गले से सरकती हुई छाती के उपर के हिस्से तक आ पहुची. सुनंदा की साडी छाती से कब की खिसक चुकी थी और ब्लाउस के उपरी हिस्से तक विक्रम पहुच गया. सुनंदा की चूचियो की गहराई के उपर के हिस्से को विक्रम चूम रहा था और अचानक उसकी जीभ बाहर निकल के दोनो स्तन के बीच की गहराई मे फिसलने लगी.

सुनंदा के लिए ये नया एहसास था. सांस तो तेज़ चल ही रही थी, लेकिन अब सुनंदा के मूह से आआहह की स्लो चीख निकल रही थी. सुनंदा पूरी मदहोशी और नशे मे थी. लेकिन स्लो चीख की वजह से विक्रम की तंद्रा टूट गयी और 5 सेकेंड्स के लिए वो रुक गया और आहिस्ता बोला : धीरे , कोई सुन लेगा
और इतना सुनते ही सुनंदा होश मे आई, पलक झपकते ही वो दूर हटी और फूली हुई साँसे, और चारो ओर उसने आँखे घुमाई, अब उसे समय और स्थल का एहसास हुवा कि वो कहा थी और किस हालत मे थी. उसने अपने पर नज़र डाली, सारी का पल्लू सरक कर छाती तक आ चुका था. अगर और आगे खिसक जाता तो शायद पूरी छाती नंगी हो जाती. उसने झट से पल्लू शोल्डर पे डाला और दूसरा एंड घूमाकर दूसरे शोल्डर पर डाला. अभी भी उसके साँसे तेज़ थी. विक्रम उसे देखते ही जा रहा था. अब सुनंदा ने विक्रम पे नज़र डाली. विक्रम की साँसे भी तेज़ थी, दोनो को जैसे बुखार हुवा हो ऐसे बदन गर्मी खा चुके थे. सुनंदा खड़ी होने गयी तो विक्रम ने हाथ पकड़ कर उसे गिरा दिया और फिर से उसको अपने बाँहो मे भरकर गहरा चुंबन लिया और फिर आराम से सुनंदा की आँखो मे झाँक कर देखने लगा. सुनंदा आधी ज़मीन पर और आधी विक्रम की बाँहो मे झूल रही थी. उसने फिर उठाने की कोशिश की लेकिन विक्रम के ज़ोर के आगे कुच्छ ना कर सकी.

उसने होठ भीच कर गुस्से से विक्रम की ओर देखा, तो विक्रम ने शोल्डर पर किस कर दिया. सुनंदा ने बोलने के लिए मूह खोलने की कोशिश की तो फिर जवाब मे एक गहरा चुंबन. थक कर उसने मूह फेर लिया तो विक्रम ने हद कर दी.

विक्रम ने अब उसकी सुंदर घाटियो की गहराई मे अपना मूह घुसाया और होंठो से किस तो किया लेकिन जीभ बाहर निकाल कर ब्लाउस मे डालने लगा. सुनंदा पहले तो बेहोशी की हालत मे थी तो उसे छाती का एहसास नही हुवा था लेकिन ये तो जागृत अवस्था मे जब अपने स्तन की गहराई मे किसी मर्द के मूह, होठ और जीभ का एहसास हुवा तो उसे याद आया की ऐसा तो विक्रम अभी अभी ये दूसरी बार कर रहा है. अब उसने झटका देकर खड़े होने की कोशिश की.

ज़ोर देने पर विक्रम थोड़ा पिछे मुड़ा तो उसे चान्स मिल गया खड़ा होने का लेकिन अब ब्लाउस का हुक विक्रम के जॅकेट मे फस चुका था, जिस की वजह से खाट आवाज़ आई और ब्लाउस का फर्स्ट हुक टूट गया और सारी फिर खिसक गयी थी, लेकिन झटका ज़ोर से देने के कारण सुनंदा आधी खड़ी हो चुकी थी, उसने नज़र उलट दी और अपनी पीठ विक्रम के सामने रख दी ता की विक्रम उसकी छाती ना देख सके. लेकिन साथ मे उसने अपना हाथ भी स्वाभाविक तरीके से अपनी छाती पर रख के उसे क्लोज़ करने की कोशिश की.

इस मे तो विक्रम को ओर आज़ादी मिल गयी क्योकि अब सुनंदा के हाथ बँधे हुवे थे और विक्रम ने पिछे से उसे पकड़ा और अपने होठ उसके खुले शोल्डर पर रखकर काट लिया. सुनंदा धीरे से चिल्लाई, उसके शोल्डर पर विक्रम के दाँत के निशान पड़े और उसने स्वाभाविक अपना हाथ उठाया और विक्रम को दूर हटाने की कोशिश की. बदले मे विक्रम ने हाथ पकड़ कर उसे उल्टा ही खिचा. अब सुनंदा उल्टी उसके गोद मे गिरी और पिछे से ही विक्रम ने करीब 2 मिनट तक मूह से लेकर शोल्डर, गाल, नेक, आँखे, छाती, लिप्स को बार बार कस के चूमना शुरू किया और अंत मे बाए स्तन के निपल्स को मूह मे ब्लाउस के उपर से ही ले लिया और हल्के से काट लिया


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इस हरकत से सुनंदा थोड़ा ओर ज़ोर से चिल्लाई तो विक्रम की गिरफ़्त लूज हुई और सुनंदा ने तेज़ीसे पलट कर विक्रम के सामने घूमकर ज़मीन पर आधी बैठ गयी, उसके पैर उल्टे थे, दोनो हाथ मे से एक हाथ छाती पर था जहा विक्रम ने काट लिया था और दूसरे से फटाफट वो सारी से पूरा बदन च्छुपाने की कोशिश करने लगी. होठ सखती मे बाँध करके करारी नज़रो से गुस्से मे विक्रम को घूर रही थी. साँसे अभी भी तेज़ थी, उसने बारी बारी अपने शोल्डर और बाए स्तन की निपल्स की ओर देखकर विक्रम से बिना नज़रे मिलाए बोली,जंगली.
विक्रम ने सुना तो बोला,क्या ?
कुच्छ नही कहकर सुनंदा ने नज़रे उठाकर विक्रम को घूर्ना शुरू किया.
मेडम, जंगली किसे कहते है पता है विक्रम बोला.
सुनंदा चुप रही और नज़रे दूसरी ओर ले गयी. बताउ जंगली कैसे होते है विक्रमने फिर चिड़ाया.
सुनंदा ने झट से घूमकर विक्रम को घूरा. विक्रम शायद अभी भी कुच्छ कर सकता था ये अंदाज़ा लगाकर बोली,देर हो रही है
पहले मेरी बात का जवाब दो कि क्या मैं बताउ जंगली क्या कर सकता है विक्रम ने फिर सवाल दोहराया.
मूज़े कुच्छ नही सुन ना है कहकर सुनंदा ओर आगे बोली,शरीफ लड़की को क्या कोई ऐसे कहकर सुनंदा ने बात आधी छोड़ दी, उसे पता था वो कुच्छ भी बोलेगी विक्रम सामने प्रत्युतर करेगा ही. लेकिन अब वो पिच्छा छुड़ाने के मूड मे थी. वो जैसे खड़ी होनी चाही. विक्रम ने हाथ को झतका दिया और फिर उसे अपनी गोद मे लेकर अपना मूह उसके लिप्स के करीब ले जाकर बोला,पहले मेरी बात का जवाब मेडम, वरना और आगे
प्लीज़, मुझे छ्चोड़िए ना कुच्छ ज़्यादा नही हो गया क्या ? अब सुनंदा की आवाज़ धीमी होने लगी, उसे डर था की विक्रम कही और अटॅक ना करे.
मेडम मैं कुच्छ समझा नही, क्या कुच्छ ज़्यादा, मैने किया क्या है कि मैं जानवर, मैने कुच्छ ज़्यादा किया, आख़िर मेरा कुसूर क्या है ? विक्रम ने अब सुनंदा की फिरकी लेनी शुरू की.
नही बाबा आप की नही मेरी भूल थी बस अब तो मुझे छ्चोड़ दो, प्लीज़ मैं आप के पाव पड़ती हू बस सुनंदा अब बेबस औरत होकर गिड़गिडाई.
मेडम आप से क्या ग़लती हुई मुझे बताएगी क्या ? अब विक्रम ने दूसरा अटॅक किया.
इस सवाल से सुनंदा की बोलती बंद हो गयी, वो हल्की हल्की मुस्कुराहट के साथ नज़रे झुकाकर धीरे से बोली,ये सबकुच्छ कुच्छ ज़्यादा हो गया आज, मुझे शरम आती है अब
लेकिन मेडम आप ने ऐसा क्या किया कि शर्म आ रही है वो मैं जानना चाहता हू विक्रम ने फिर शरारत की.
ऐसी बाते बोलनी ज़रूरी है क्या ? कितने बेशर्म हो आप ? एक तो आज पूरा दिन मेरा फाय्दा उठाया और मेरे ही मूह से सबकुच्छ. सुनंदा कुच्छ आगे बोले उसके पहले विक्रम ने ओर कस के सुनंदा को बाँहो मे भर लिया और बोला,मेडम मैने आप का फ़ायदा उठाया, ऐसा हुवा और मुझे ही मालूम नही बोलो. उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे जैसे हुवा ये तो
क्या मैने कहा था ये सब करने के लिए ? सुनंदा प्यार भरे गुस्से से बोली.
लेकिन हमने किया क्या यार जो आप इल्ज़ाम पे इल्ज़ाम लगाए जा रही है मेडमविक्रम ऐसे आसानी से कहा छ्चोड़नेवाला था.
देखो वो भैया ने हमे 45 मिनट मे वापस जाने के लिए कहा था और टाइम ख़तम हो चुका है सुनंदा ने ट्रॅक चेंज किया.
अरे भाड़ मे जाए वो, यहा मुझे कोई जंगली, चोर, एक मजबूर महिला पर अत्याचार करनेवाला कहा जा रहा है और साला वो तो ना जाने क्या क्या कर रहा होगा अभी, लेकिन जब तक मुझे मेरे सवालो के जवाब नही मिलते मैं तो यहा से नही जाउन्गा विक्रम ने सुनंदा को ओर कस से पकड़ा. अब सुनना पूरी तरह उसके गिरफ़्त मे आ चुकी थी.
प्लीज़, बंद करो ना इतना तो मुझे परेशान किया अभी और क्या चाहिए आप को ? सुनंदा ने फिर गिड़गिडना जारी रखा.
लेकिन हमने क्या किया वो बताओ पहले फिर ही मैं छ्चोड़ूँगा मेडम विक्रम अपनी ज़िद पर अड़ा रहा.
सुनंदा कुच्छ देर तक विक्रम को देखती रही. उसकी आँखो मे फुल शरारत भरी पड़ी थी. सुनंदा ने नज़रे बचाने की लाख कोशिश की. 2 मिनट के बाद भी विक्रम ने उसे ना तो छ्चोड़ा ना तो कुच्छ बोला सिर्फ़ सुनंदा के चेहरे को देखकर मुस्कुराता रहा तो सुनंदा से नही रहा गया ओर बोली,अच्च्छा बाबा मुझे माफ़ करो मेरी ग़लती हो गयी बस
लेकिन आप से ग़लती क्या हुई मेडम ?यही मेरा सवाल है, कौन सा जुर्म किया है आज आपनेविक्रम ने फिर वोही दोहराया.
सुनंदा की हालत ओर खराब हो गयी फिर बोली, देखिए मेरे कपड़े मुझे ठीक करने दीजिए, कोई देख लेगा. आप अभी भी संतुष्ट नही है क्या ?
संतुष्ट ?, कोन से कार्य मे संतुष्ट मेडम ? विक्रम बोला.
ये सुनकर शरमाकर नज़रे फेर कर सुनंदा हस पड़ी,जाइए ना सब मेरे ही मूह से बुलाएँगे आप मैं जानती हू
अगर आप जानती है तो बताने का कष्ट कीजिए ना प्लीज़ तो हमारी बहस ख़त्म हो जाएँगी ओर हम चले जाएँगे बस विक्रम ने अब धीरे से फुसलाने की कोशिश की.
पक्का वादा की आप मुझे छ्चोड़ देंगे सुनंदा ने हारकर समर्पण किया.
जेंटल प्रॉमिस बस विक्रम बोला.
लेकिन क्या बोलू मैं ? सुनंदा ने पुचछा.
यही की हमने क्या किया अभी ? एक एक वर्ड्स अलग अलग स्टाइल मे विक्रम ने दोहराया.
कुच्छ देर तक सुनदा नीची नज़रो से मुस्कुराती रही ओर फिर नज़रे उठाकर विक्रम के चेहरे को देखा ओर फिर अपने होंठो से विक्रम के होंठो को किस किया ओर बोली,ये किया हमने.
शाबाश लेकिन इसे क्या कहते है विक्रम ने अभी शरारत नही छ्चोड़ी थी.
अब बस भी करो ना मुझे शर्म आती है. मैं लड़की हू लड़का नही सुनंदा गुस्से से बोली.
जवाब मे विक्रम ने फिर बाए स्तन के निपल्स को हल्के से काटा ओर बोला,ये तो मुझे पता है क्यूकी यहा कुच्छ करने से मुझे कुच्छ नही होता लेकिन आप को कुकछ ज़रूर होता है
वो काटने की चीज़ नही है जंगली सुनंदा आह कर के चिल्लाई.
तो क्या करने की चीज़ है वो ? विक्रम ने पुचछा, अगर आप बताएगी तो अगली बार मैं काटुंगा नही जैसा आप बोलेगी वैसा मैं करूँगा
अब सुनंदा भी जोश मे आई और बोल दिया,वो आप के लिए नही है बच्चो का खिलोना है समझे
मेडम अच्छा हुवा बता दिया लेकिन मैं तो अभी बच्चा ही हू अभी मेरी शादी कहा हुई है विक्रम बोला और फिर अपना मूह स्तन पे मार्कर ज़ोर से काट लिया.
ऊओउच सुनंदा ज़ोर से चिल्लाई कि विक्रम के हाथ छूट गये. चारो ओर से नज़रे अब उसकी तरफ घूम रही थी.

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विक्रम बोला,आहिस्ता मेडम आहिस्ता
नही मैं अब ज़ोर से चिल्लाउन्गि अगर तुम बाज ना आए तो सुनंदा ने धमकी दी अभी भी वो अपना हाथ बाए स्तन पे दबाए बैठी थी.

अच्छा चिल्ला के दिखाओ तो विक्रम पूरे मज़े लूट रहा था.
आप क्या चाहते है प्लीज़ सुनंदा थक हार कर बोली.
आज रात अंकल के सोने के बाद मुझे मिलने आओगी विक्रम ने हिम्मत के साथ खुल्लेआम बोल दिया.
ना बाबा मैं ऐसा नही कर सकती सुनंदा ने घबरा कर बोला.
मेडम अभी तक जो भी आप ने किया, जॉब ही कुच्छ कर रही थी इस कम से बड़ा आसान कम मैने आप को बोला है विक्रम ने फिर शरारत की.
वो तो हम अकेले है इसीलिए वरना पिताजी के सामने कोई ऐसा करेगा क्या ? सुनंदा ना जवाब दिया.
हमे पिताजी के सामने कुच्छ नही करना है जो कुच्छ करना है पिताजी के सो जाने के बाद करना है विक्रम ने बाई आँख ज़पककर सुनंदा को चिड़ाया.
अब रात को आप ओर क्या करनेवाले हो ?, अभी आप को चेन नही मिला क्या ?, कम से कम मेरी हालत पे तो गौर कीजिए, मुझे दर्द हो रहा है. जोश मे जो नही होना चाहिए था वो मैं कर चुकी हू. सुनंदा एक ही सांस मे बोल गयी और हाथ जोड़कर गिड-गिदाने लगी.
मेडम, अगर रात का वादा नही करती है तो अभी और सज़ा मिलेगी कहकर फिर विक्रम ने उसे बाँहो मे भरकर होंठो को काटना शुरू किया.
ऊउउउउउउउ ऑफ ऑफ आअ करके सुनंदा ने दोनो हाथो से सरेंडर का इशारा किया तब जाके विक्रम ने उसे छ्चोड़ा और पुचछा,क्या रात को आओगी ?
कोशिश करूगी सुनंदा ने हारकर जवाब दिया.
हा ये अच्छा हुवा क्यूकी वादा करती हो तो वो तो अक्सर टूट जाया करते है लेकिन कोशिश ज़रूर कामयाब होती है विक्रम ने हस्कर बोल दिया.
लेकिन आप भी कोशिश करना कि कोई ऐसा वैसा काम ना करे जिस से मुझे कुच्छ तकलीफ़ हो सुनंदा ने उंगली सीधी रखकर विक्रम से वादा चाहा.
मेडम मुझे तो वोही करना है जो आप सिखओगि, दूसरा मैं तो बच्चा हू खिलौने मुझे पसंद है तो जैसे आप सिखओगि वैसे खिलोने से खेलूँगा कहकर विक्रम ने सुनंदा का बाए स्तन की निपल्स को उंगली से च्छुकर इशारा किया.
अब सुनंदा झट से खड़ी हो गयी और बोली घूम जाइए प्लीज़.
क्यू कपड़े चेंज करने है ? विक्रम ने नज़दीक आकर बोला.
आप को तो सिर्फ़ वोही दिखाई देता है, मुझे कोई कपड़े चेंज नही करने है अब मैं कुच्छ साड़ी ठीक कर लू ता की बाहर वो भैया को पता ना चले कि हमने यहा क्या किया है सुनंदा गुस्से से बोली लेकिन उसके टोन मे नमी थी.
वो साला तो इस से भी ज़्यादा कुच्छ मज़े कर के वापस आएगा अभी तो उसका कार्यक्रम आधा भी समाप्त नही हुवा होगा, मेरी ही किस्मत खराब है कि मेरे कार्यक्रम की बालम्रत्यु हो गयी विक्रम आहे भरकर वहीं ज़मीन पर लेट गया.
ऐसा बोलने मे भी शरम नही आती तुमको तो और अच्छा हुवा बल्म्रुत्यु हो गयी वरना मेरी मृत्यु हो जाती कहकर विक्रम का हाथ पकड़कर उसे खिचा और हाथ पकड़ कर आगे आगे चलने लगी और बोलती रहीकैसे जंगली आदमी से पाला पड़ा है जितना भी दो ......कम ही पड़ता है

विक्रम धीरे धीरे कदम बढ़ता उसके पिछे पिछे चलता रहा था उसका मन नही था फिर भी देर तो हो ही रही थी. 2 मिनट तक मौन दोनो चलते रहे तो दोनो थोड़े उजाले मे आ पहुचे थे. सुनंदा ने विक्रम का हाथ पकड़कर पुचछा,नाराज़ हो ?. विक्रम ने नकार मे सिर हिलाया. तो फिर बोलती बंद क्यू हो गयी ? अब वो खुलकर बोल रही थी मानो 45 घंटे मे उसकी ज़बान मे जादू आ गया था. लगता था कि लड़की को एकबार खोल दो वो इतनी खुल जाती है कि बंद करना भी मुश्किल हो जाता है.

कुच्छ बोलो तो सही क्या हुवा, इतने चुप चुप से क्यू हो सुनंदा ने फिर पुचछा.
विक्रम खड़ा रह गया और सुनंदा की बाँहो मे हाथ डालकर आँखो मे आँखे डालकर बोला,थॅंक्स
सुनंदा ने नज़रे झुका दी और थोड़ी ही देर मे पलक उठाकर विक्रम को प्यार भरी निगाहो से देखने लगी.
मैने कुच्छ ज़्यादा तो परेशान नही किया ना ?विक्रम ने शोल्डर सहलकर पुचछा.
देखना है आप को तो खुद ही देख लो कहकर सुनंदा ने धीरे से शोल्डर से विक्रम का हाथ हटाया और शोल्डर पर से सारी का पल्लू हटाया और ब्लाउस की धार को थोड़ा हटाकर ब्रा की स्ट्रीप (पहले ब्रा की स्ट्रीप सिंगल पट्टी की नही थी बल्कि वाइड स्ट्रीप हुवा करती थी) को हटाकर अपना शोल्डर दिखाया और सारी का पल्लू हटाकर ब्लाउस को छाती से हटाया और खुद नज़रे झुकाकर कर खड़ी रही.
विक्रम ने उसकी पलको मे मासूमियत के साथ एक प्रेमिका का अपने प्रेमी के पति पूरी श्रधढा के साथ समर्पण दिखाई दिया फिर उसकी नज़र सब से पहले शोल्डर पर पड़ी वाहा उसने दो तीन बार काटा था. मदहोशी, आवेग मे उसे पता नही था लेकिन उसके दांतो के निशान शोल्डर पे बहुत गहरे थे और रॅटाश दिखाई दे रही थी. उसके बाद विक्रम की नज़र छाती पर गयी, पहला हुक टूट जाने की वजह से छाती की गहराई स्पष्ट दिखाई दे रही थी. दोनो स्तन के बीच मे लाल लाल दाग लग चुके थे और बाए स्तन का ब्लाउस भीना था और ब्लाउस के उपर दन्तो के निशान पड़ चुके थे. निपल्स तन के खड़ा था जो गवाही दे रहा था की कितनी जोरो से उसे काटा गया है.
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क्रमशः................


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विक्रम ने अपने हाथो से सुनंदा के कपड़े ठीक किए और बोला,आइ आम सॉरी मुझे तो पता ही नही था कि मैं तुझे काट रहा हू
कोई बात नही धीरे से कहकर फिर सुनंदा साथ मे चलने लगी.
मैं ये दर्द रात को मिटा दूँगा विक्रम ने हस्कर बोला.
ये दर्द कभी किसी लड़की का मिटा है क्या ? सुनंदा ने नज़रे झुका कर बोल दिया.
हा ये भी ठीक है लेकिन एक ट्रिक है मेरे पास जिस से तुम्हारा दर्द समाप्त हो जाएगा
वो कैसे ? सुनंदा ने पुचछा.
वो क्या है कि किसी को नीचा दिखाना हो तो उसकी लाइन को छुते नही है लेकिन उसके आगे हमारी लाइन बड़ी कर देते है वैसे ही ये छ्होटे दर्द को मिटाने के लिए थोड़ा बड़ा दर्द उठा लो तो ये तो मामूली दर्द है मिट जाएगा विक्रम ने नज़रे उल्टी कर के एक ही सांस मे बोल दिया. उसे पता था कि अब सुनंदा ज़रूर घूर रही होगी. वो इंतेज़ार कर रहा था कि सुनंदा का रिप्लाइ क्या होगा.
अचानक सुनंदा ने पैर उठा कर ज़ोर से चप्पल विक्रम के पैर के बीच मे लगा दिया.
ओ माआआआ करके विक्रम एक पैर पे लंगड़ाने लगा और थोड़ी देर जंप करता रहा.
सुनंदा देख कर मुस्कुराने लगी और बोली, जंगली को शरीर नौचने के सिवा कुच्छ सूझता ही नही है, आधी तो ज़ख़्मी कर दिया है अब रात को ना जाने क्या करोगे

अम्मा इसमे मैं क्या करू तेरा दर्द मिटाना मेरा परम कर्तव्या है ना, लेकिन ये लात मारने की क्या ज़रूरत थी, एक तो हालत पे मदद करो ओर दूसरी ओर जूते खाओ, लड़की है या मुसीबत विक्रम अभी भी दर्द से आहे भर रहा था.

लेकिन तब तक दोनो गार्डेन के बाहर आ चुके थे. सामने ही वो कपल आइस-क्रीम खा रहे थे. वो भैया ने विक्रम और सुनंदा को देखा और बोला,हो गया जल्दी, चलो कुच्छ शॉपिंग कर के वापस चले वरना हमारी पोल खुल जाएँगी

अब पूरे उजाले मे विक्रम ने सुनंदा का चेहरे देखा. देखकर कोई भी बता सकता था कि सुनंदा के साथ क्या हुवा है. सुनंदा के होठ पे चूसने की वजह से काले ब्लड की तरह कलर च्छा गया था. गले मे रॅटाश आ चुकी थी. आँखो मे मदहोशी भर चुकी थी. अब उसे ध्यान मे आया की नशे मे कितनी ज़ोर से दोनो ने क्या कुच्छ कर दिया था.


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विक्रम सुनंदा के बिल्कुल करीब जाकर कान मे बोला,मेडम टवल से चेहरा साफ कर लो वरना सब कुच्छ दिखाई दे रहा है सुनंदा ने चेहरा पलटकर अपने छ्होटे रुमाल से चेहरा पर से साफ करने लगी. वो भैया देख रहा था और उसे थोड़ा बहुत सुनाई भी दे रहा था वो विक्रम के करीब आकर बोला,कोई बात नही सुरुआत मे ऐसा ही होता है, बाद मे आदत हो जाती है.
विक्रम ने हस्कर पुचछा,अच्छा तो आप सीनियर है तो आप को तो रुमाल की कोई ज़रूरत ही नही होती ना
रुमाल, अरे वो तो ज़रूरत होती ही है ना लेकिन कुच्छ अलग तरीके से ज़रूरत पड़ती है वो भैया ने बोला.
कैसे ? विक्रम ने पुचछा.
वो आदमी विक्रम के बिल्कुल करीब आकर कान मे बोला,अरे भाई, वो रुमाल तो डस्टबिन मे ही जाएगा ना. यू नो जस्ट यूज़ आंड थ्रो इट. कहकर ज़ोर से हस दिया.
तभी विक्रम को पता चला कि साला सबकुच्छ कर के गार्डेन से बाहर निकाला है उसने पुचछा,आप कितनी देर से यहा वापस आकर हमारी रह देख रहे हो ?
करीब 20 या 25 मिनट से वो भैया ने बताया.
क्या सिर्फ़ 15 या 20 मिनट आप गार्डेन घूमकर वापस आ गये ?
बिल्कुल और फिर आवाज़ स्लो कर के बोले, अरे भाई 5 मिनट आने की 5 मिनट जाने की 5 मिनट एंजिन स्टार्ट करने मे और जर्नी की 5 मिनट, बस स्टेशन आ गया और हम बाहर. इतना कहकर फिर से ज़ोर से हस दिया.

विक्रम तो देखता ही रह गया उसे, साला घूमने आया था कि सेक्स एंजाय करने. फिर चारो ने एक ऑटो की और 1 घंटे मे जल्दी जल्दी सब को दिखाने के लिए शॉपिंग की, सुनंदा ने दो सारी ले ली और सब वापिस आ गये. सुनंदा ने सारी अपने पेरेंट्स को दिखाई और फिर सब ने खाना खाया और सोने के लिए चल दिए. बाजू के रूम मे 2 जेंट्स को कमरा दिया था जहा विक्रम बेकरारी से सुनंदा के इशारे की राह देख रहा था. रात के 11 बज चुके थे.

9 बजे से लेकर 11 बजे तक बहुत इंतेज़ार करने के बाद भी जब सुनंदा नही आई तो बचैनि मे विक्रम उठकर रूम से बाहर आया और जहा सुनंदा और सब सोए हुए थे वाहा आके विंडो से देखा तो अंकल, अंटी के साथ सुनंदा आराम से सोई हुई थी, शायद पूरा दिन घूमने से थॅकी हुई होगी, इसीलिए उसे समय का पता नही चला था और गहरी नींद मे जा चुकी थी. विक्रम ने करीब आधे घंटे मे यहा वाहा चक्कर काटे तीन बार सिगरते पी चुका था, लेकिन सुनंदा ने तो करवत् भी नही बदली. आख़िर थक्कर, हारकर घायल शेर की तरह गुस्से मे विक्रम आकर अपने रूम मे बेड पर गिरा और सोने की कोशिश कर रहा था. लेकिन जब शेर शिकार करने से चुकता है और जो हालत होती है वैसी ही हालत विक्रम की हो रही थी. बार बार उसे कोनर्क की मूर्तिया और सुनंदा के साथ बिताया हुवा आधा घंटा परेशान कर रहा था. उसका बदन मे तेज़ी से जिस्म की गरमी बढ़ती ही जा आयी थी. अर्ली मॉर्निंग तक वो करवाते बदलता रहा, उसे अब गुस्से के साथ एक प्रेमिका के विरह का एहसास हो रहा था. वो सुनंदा पर बहुत ही खफा हो चुका था और अर्ली मॉर्निंग वो नींद की आगोश मे समा गया.


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