Xossip

Go Back Xossip > Mirchi> Stories> Hindi > खेल खेल में

Reply Free Video Chat with Indian Girls
 
Thread Tools Search this Thread
  #11  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community
Quote:
Originally Posted by neerathemall View Post
खेल खेल में 7



















मुझे मेरी दीदी बचपन से ही बहुत चाहती थी क्यूंकि मैं घर में सबसे छोटा हूँ। हम दोनो एक ही कमरे में सोते थे और दीदी के 20 साल की होने तक तो हम एक ही बेड प़र सोते थे।
प़र एक दिन माँ ने हमे अलग-अलग बिस्तर प़र सोने को कहा। मैंने हमेशा से ही दीदी को चोदने की सोची थी और रात को दीदी के सोते समय उनकी चूचियाँ और चूत कभी कभी दबा लेता था। प़र डर के कारण आगे कुछ नहीं कर पाता था। हाँ, बाथरूम में मुठ ज़रूर मार लेता था। दीदी को चोदने को मेरा बहुत मन करता था।
अब भारती दीदी वापस आ गई थी। सो मैं रोज उससे अच्छी अच्छी बातें करने लगा ताकि दीदी को किसी पुरानी घटना की याद न आये।
एक दिन भारती दीदी बाथरूम से नहाकर आ रही थी तो अचानक मेरी नज़र उन पर पड़ गई, शायद बाथरूम में तौलिया नहीं था, वो गीले बदन पर गाउन पहने थी। भारती दीदी के कपड़े शरीर से चिपके हुऐ थे और वो बहुत ही सुन्दर लग रही थी।
उस दिन फिर से मैंने मुठ मारी।
हम दोनों हमेशा कंप्यूटर प़र गेम और चैट करते रहते थे। एक दिन दीदी साथ वाले कमरे में सो रही थी। मैंने कंप्यूटर प़र जानबूझ कर 'दीदी की चुदाई' पढ़नी शुरू की। अचानक दीदी पास आकर बैठ गई और उसने वो कहानी पढ़ ली उसने मुझसे कहा- तुम यह सब पढ़ते हो क्या?
मैं चुपचाप उनको देखने लगा। मैंने मौका देख कर उसके होठों पर चूम लिया। भारती दीदी ने मुझे पकड़ कर अलग कर दिया और कहा- मार खाएगा तू !
और दीदी वहाँ से उठ कर जाने लगी। जाते समय मेरी तरफ देख रहस्यमयी मुस्कान दी। मैंने भी मुस्कुराते हुए दीदी की तरफ देखा।
थोड़ी देर में दीदी ने मुझे आवाज़ दी और सोने के लिए कहा। मैं सोने आ गया। बातों बातों में दीदी ने मुझे कहानी के बारे में मुझे पूछा। मैने भी सब बता दिया।दीदी ने मेरी तरफ देखा, मैंने मौका देख कर फ़िर उसके होठों पर चूम लिया। भारती दीदी ने मुझे पकड़ कर अलग करने की कोशिश की लेकिन मैंने उन्हें छोड़ा नहीं और चूमता रहा।
मैं भारती दीदी के होठों को अपने होठों से चिपका कर चूमे जा रहा था, वो बेतहाशा पागल हो रही थी।


फिर मैंने दीदी के स्तनों की तरफ हाथ बढ़ाया। दीदी के स्तनों अग्र भाग को अपनी उँगलियों से चुटकियों से पकड़ कर गोल गोल घुमाया तो दीदी सिसिया उठी। मैंने दीदी के चुचूक पकड़ लिए थे। उनके चुचूकों को जोर से मींसा तो दीदी फिर से सिसिया उठी, मगर दर्द से। दीदी के चुचूक तन गए थे, जो ब्रा में उभर आये थे। मैंने उन पर अपनी उँगलियों के पोर को गोल गोल नचाते हुए छेड़ा, इसी बीच मैंने दीदी का गाउन उतार कर फेंक दिया। दीदी के कोमल गौर-बदन की एक झलक देखने को मिली।
अन्दर दीदी ने काले रंग की ब्रा पहन रखी थी। दीदी ने अन्दर सफ़ेद रंग की पैंटी पहनी थी। मैंने जिंदगी में पहली बार किसी लड़की को इस रूप में देखा था। भारती दीदी का पूरा शरीर जैसे किसी सांचे में ढाल कर बनाया गया था। काली ब्रा में उनके शरीर की कांति और भी बढ़ गई थी। ब्रा के अन्दर दीदी के बड़े बड़े स्तन कैद थे, जो बाहर आने को बेकरार लग रहे थे। मैंने ब्रा के स्ट्रेप को कंधे से नीचे उतार कर स्तनों को ब्रा की कैद से पूरी तरह आजाद कर दिया। भारती दीदी को नग्न देख कर मेरी हालत खराब हो गई। मैंने कभी किसी के स्तनों को छूकर नहीं देखा था फिर से बड़ी बुरी तरह उन्हें मसला।
फिर दीदी ने मेरी टी-शर्ट को ऊपर की ओर उठा दिया। दीदी ने अपने हाथों से मेरा अंडरवियर उतार दिया, फिर लिंग को पकड़ लिया। भारती दीदी मेरे लिंग को देखकर आश्चर्यचकित रह गई। दीदी ने लिंग को प्यार से सहलाया। दीदी के हाथ के स्पर्श से ही लिंग में कसाव बढ़ गया। दीदी ने मुस्कुराते हुए मुझको को चूमा। फिर दीदी तुरंत उसे चूसने लगी। दीदी को इस तरह से करते हुए देख मजा आ रहा था। दीदी ने बाकी लिंग को बाहर से चाट चाट कर चूसा तो मैं भी उत्तेजना से कांप गया।
मैंने उनकी जांघों के ठीक बीच में अपना हाथ फिराया और दीदी की पैंटी की इलास्टिक में उँगलियाँ फंसा कर पैंटी को उतार लिया और हाथों से हल्के हल्के दीदी के योनि प्रदेश को सहलाने लगा तो दीदी गुदगुदी के मारे उत्तेजित हो रही थी।
कुछ देर बाद भारती दीदी बहुत ही उत्तेजित हो गई थी हम दोनों ही अब काफी उत्तेजित हो गए थे। अब मैं दीदी की टांगों को फैला कर खुद बीच में लेट गया। मैंने भारती दीदी की योनि को सहलाया, उनके चूत की खुशबू मस्त थी। फिर उस पर पास में पड़ी बोतल से वैसेलिन निकाल कर लगाई। भारती दीदी की चूत का छेद काफी छोटा था। मुझे लगा कि मेरी प्यारी भारती दीदी मेरे लण्ड के वार से कहीं मर न जाये।
दीदी उत्तेजना के मारे पागल हो रही थी। दीदी ने मुझे लण्ड अन्दर डालने के लिए कहा।
भारती दीदी की योनि को अच्छी तरह से वैसेलिन लगाने के बाद फिर से दीदी की टांगों के बीच बैठ गया। मैंने दीदी की कमर को अपने मजबूत हाथों से पकड़ लिया। मैंने कोशिश करके थोड़ा सा लिंग अन्दर प्रवेश करा दिया। दीदी हल्के हल्के सिसकारियाँ ले रही थी। फिर मैंने एक जोरदार झटका मारकर लिंग को काफी अन्दर तक योनि की गहराई तक अन्दर पहुँचा दिया कि दीदी की चीख निकल गई।
मैंने दीदी के चेहरे को देखा तो मैं समझ गया कि दीदी को दर्द हो रहा है। मैंने दोबारा वैसा ही झटका मारा, तो दीदी इस बार दर्द से दोहरी हो गई। मैंने यह देख कर उनके होठों पर चूम लिया वरना दीदी की आवाज़ दूर तक जाती।
दीदी एक मिनट में ही सामान्य नज़र आने लगी क्योंकि उनके मुँह से हल्की हल्की उत्तेजक सिसकारियाँ निकल रही थी। मैंने फिर से एक जबरदस्त धक्का मारा, दीदी इस बार दहाड़ मार कर चीख पड़ी। मैंने देखा कि इस बार दीदी की आँखों में आँसू तक आ गए थे। मैंने दीदी के होठों को अपने होठों से चिपका लिया और जोर-जोर से उन्हें चूमने लगा और साथ ही दीदी के स्तनों को दबाने लगा। दीदी भी उतनी तेजी से मुझे चूम रही थी।
मैं हल्के हल्के अपनी कमर चला रहा था। अब दीदी धीरे धीरे सामान्य होती लग रही थी। मुझे इतना समझ आया कि जब दीदी को दर्द कम हो रहा है। दीदी ने अपने टांगों को मेरी कमर के चारों ओर कस लिया। मैंने ने दीदी के होठों को छोड़ दिया और पूछा- अब मज़ा आ रहा है क्या ? दर्द तो नहीं है ?
दीदी बोली- आराम से करते रहो ! मैंने एक जोरदार झटका मारकर अपना लिंग दीदी की योनि में काफी अन्दर तक ठूंस दिया। इस बार दीदी के मुँह से उफ़ भी नहीं निकली बल्कि वो आह.. सी.. स्स्स्स...सस... की आवाज़ें निकाल रही थी।
दीदी बोली- मुझे बहुत अच्छा लग रहा है !
यह देखकर तीन चार जोरदार शॉट मारे और लिंग जड़ तक दीदी की योनि में घुसा दिया और अपने होठों को दीदी के होठों से चिपका उनके ऊपर चित्त लेटा रहा।
अब झटकों की गति और गहराई दोनों ही बढ़ा दी। आधे घंटे त़क दीदी के रास्ते में मैं दौड़ लगाता रहा फिर दीदी ने अपनी टाँगें ढीली कर ली। दीदी स्खलित हो गई थी। कुछ ही देर में मेरा शरीर ढीला हो गया। काफी देर मैं दीदी के ऊपर लेटा रहा। दीदी मेरे होठों को बार बार चूम रही थी और आत्मसंतुष्टि के भाव के साथ मुस्कुरा रही थी। मैंने दीदी के कामरस को खूब पिया उन्होंने मेरा सर पकड़ कर अपनी चूत में चिपका दिया था।

Last edited by neerathemall : 3rd September 2013 at 09:51 AM.

Reply With Quote
  #12  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community
Quote:
Originally Posted by neerathemall View Post
खेल खेल में -8































"सोनू, अच्छा राजेश रात को कितनी बार करता है... एक बार या अधिक...?"

"वो जब मूड में आता है तो दो बार, नहीं तो एक बार !" बड़े भोलेपन से उसने कहा।

"क्या तुम रोज़ एंजोय करते हो...?"

"अरे कहां विनोद... सप्ताह में एक बार या फिर दो सप्ताह में..."

"इच्छा तो रोज होती होगी ना..."

"बहुत होती है... हाय राम... तुम भी ना..." अचानक वो शर्म से लाल हो उठी।

"अरे ये तो नचुरल है, मर्द और औरत का तो मेल है... फिर तुम क्या करती हो?"
"अरे चुप रहो ना !" वो शरमाती जा रही थी।

"मैं बताऊँ... हाथ से कर लेती हो... बोलो ना?"

उसने मेरी ओर शरमा कर देखा और धीरे से सिर हाँ में हिला दिया। धीरे धीरे वो खुल रही थी।

"शरमाओ मत... मुझसे कहो दीदी... तुम्हारा भैया है ना... एकदम कुंवारा...!"

मैंने सोनू का हाथ धीरे से पकड़ लिया। वो थरथरा उठी। उसकी नजरें मेरी ओर उठी और उसने मेरे कंधे पर सर टिका दिया।

"भैया, मुझे कुछ हो रहा है... ये तुम किस बारे में कह रहे हो...?" उसकी आवाज में वासना का पुट आता जा रहा था।

"सच कहू दीदी, मैं कुंवारा हूँ ... आपको देख कर मेरे मन में भी कुछ कुछ होता है !" मैंने फिर अंधेरे में तीर मारा।

"हाय भैया... होता तो मुझे भी है...!" मैं धीरे से सरक कर उसके पीछे आ गया और अपनी कमर उसके चूतड़ों से सटा दी। मेरा उठता हुआ लण्ड उसके चूतड़ों की दरार में सेट हो गया और उसके पेटिकोट के ऊपर से ही चूतड़ों के बीच में रगड़ मारने लगा। वह थोड़ा सा कसमसाई...। उसे लण्ड का स्पर्श होने लगा था।
"दीदी आप कितनी अच्छी हैं... लगता है कि बस आपको..." मैंने लण्ड उसकी गाण्ड में और दबा दिया।

"बस...!" और हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और लहराती हुई भाग गई। लोहा गरम था, मैं मौका नहीं चूकना चाहता था। मैं भी सोनू के पीछे तुरन्त लपका और नीचे उसके कमरे में आ गया। वो बिस्तर पर लेटी गहरी सांसें भर रही थी। उसके वक्ष धौंकनी की तरह चल रहे थे। मुझे वहाँ देख कर शरमा गई, "भैया... अब देखो ना... मेरे सिर में दर्द होने लगा है... जरा दबा दो..."
मेरा लण्ड जोर मारने लगा था। मैंने सोचा सर सहलाते हुए उसकी चूचियाँ दबोच लूंगा। तब तो वो मान ही जायेगी।

"अभी लो दीदी... प्यार से दबा दूंगा तो सर दर्द भाग जायेगा।" मैं उसके पास जाकर बैठ गया और उसके कोमल सर पर हाथ रख कर सहलाने लगा। बीच बीच में मैं उसके चिकने गाल भी सहला देता था। उसने अपनी आंखें बंद कर ली थी। मैंने उसके होंठों की तरफ़ अपने होंठ बढ़ा दिये। जैसे ही मेरे होंठों ने उसके होंठ छुए, उसकी बड़ी-बड़ी आंखें खुल गई और वो शरमा कर दूसरी तरफ़ देखने लगी।

"हाय... हट जाओ अब... बस दर्द नहीं है अब..."

"यहाँ नहीं तो इधर सीने में तो है...!"

मैंने अब सीधे ही उसके सीने पर हाथ रख दिये... और उसकी चूचियाँ दबा दी। उसके मुख से हाय निकल पड़ी। उसने मेरे हाथ को हटाने की कोशिश की, पर हटाया नहीं।

"दीदी... प्लीज, बुरा मत मानना... मुझे करने दो !"

"आह विनोद... यह क्या कर रहे हो... मुझे तुम दीदी कहते हो...?"

"प्लीज़ दीदी... ये तो बाहर वालों के लिये है... आप मेरी दीदी तो नहीं हो ना।" मैंने उसके अधखुले ब्लाऊज में हाथ अन्दर घुसा कर दोनो कबूतरों को कब्जे में लिया। उसने कोई विरोध नहीं किया और मेरे हाथों के ऊपर अपना हाथ रख कर और दबा लिया।

"ओह्ह्ह्... मैं मर जाऊंगी विनोद... !" वो तड़प उठी और सिमटने लगी। मैंने उसे जबरदस्ती सीधा किया और उसके होंठो पर अपने होंठ दबा दिये। वो निश्चल सी पड़ी रही। मैं धीरे से उसके ऊपर चढ़ गया। मेरा लण्ड पजामे में से ही उसकी चूत में घुसने की कोशिश कर रहा था। मैंने अपना पजामे का नाड़ा ढीला कर लिया और नीचे सरका लिया। मेरा लण्ड बाहर आ गया। मैंने उसके पेटिकोट का नाड़ा भी खींच लिया और उसे नीचे सरकाने लगा। सोनू ने हाथ से उसे नाकाम रोकने की कोशिश की,"भैया... ये मत करो ... मुझे शरम आ रही है... मुझे बेवफ़ा मत बनाओ !" सोनू ने ना में हाँ करते हुए कहा।

"सोनू, शरम मत करो अब... तुम बेवफ़ा नहीं हो... अपनी प्यास बुझाने से बेवफ़ा नहीं हो जाते !"

"ना रे... मत करो ना... !" पर मैंने उसका पेटीकोट नीचे सरका ही दिया और लण्ड से चूत टकरा ही गई। लण्ड का स्पर्श जैसे ही चूत ने पाया उसमें उबाल आ गया। सोनू की चूत गीली हो चुकी थी। लण्ड चिकनी चूत के आस पास फ़िसलता हुआ ठिकाने पर पहुंच गया। चूत के दोनों पट खुल गये और चूत ने लण्ड का चुम्बन लेते हुए स्वागत किया। सोनू तड़प उठी और शरमाते हुए अपनी चूत का पूरा जोर लण्ड पर लगा दिया। चूत ने लण्ड को अपने में समेट लिया और अन्दर निगलते हुए जड़ तक बैठा लिया।

"आह भैया... आखिर नहीं माने ना... अपने मन की कर ली... हाय ... उह्ह्ह्ह !" सोनू ने मुस्करा कर मुझे जकड़ लिया।

"दीदी सच कहो ... आप को अच्छा नहीं लगा क्या...?"

"भैया... अब चुप रहो ना... " फिर धीरे से शरमाते हुए बोली..."चोद दो ना मुझे...हाय रे !"

"आप गाली भी... हाय मर जाऊं... देख तो अब मैं तेरी चूत को कैसी चोदता हूँ !"

ऊईईई... विनोद... चोद दे मेरे भैया... मेरी प्यास बुझा दे..." उतावली सी होती हुई वो बोली।

"मेरा लण्ड भी तो प्यासा है कब से... प्यारी सी सोनू मिली है, प्यारी सी चूत के साथ...आह्ह्हऽऽऽ !"

"मैया री... लगा... और जोर से... हाय चोद डाल ना...मेरी चूची मरोड़ दे आह्ह्ह !"

मैं उससे लिपट पड़ा और कस लिया लण्ड तेजी से फ़चा फ़च चलने लगा। मेरा रोम रोम जल उठा। मेरी नसों में जोश भर गया। लण्ड फ़डफ़डा उठा। चूत का रस मेरे लण्ड को गीला करके उसे चिकना बना रहा था। उसका दाना मेरे लण्ड से धक्के मारते समय रगड़ खा रहा था। मैंने अपना लण्ड निकाल कर कई बार उसके दाने पर रखा और हल्के हल्के रगड़ाई की। वो वासना में पागल हुई जा रही थी। उसकी आँखें गुलाबी हो उठी थी।

"मेरे राजा... मुझे रोज चोदा करो... हाय रे...मुझे अपनी रानी बना लो... मेरे भैया रे..."

उसकी कसक भरी आवाज मुझे उतावला कर रही थी।

"भैया... माँ रे... चोद डाल... जोर से... हाय मैं गई... लगा तगड़ा झटका... ईईईई... अह्ह्ह्ह.."

"अभी मत होना... सोनू... मैं भी आया... अरे हाय ... ओह्ह्ह्ह"

हम दोनों के ही जिस्म तड़प उठे और जोर से खींच कर एक दूसरे को कस लिया। चूत और लण्ड ने साथ साथ जोर लगाया। लण्ड पूरा चूत में गड़ चुका था और आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह्ह वीर्य छूट पडा... सोनू ने अपनी चूत जोर से पटकने लगी और उसका भी यौवन रस निकल पडा। हम आहें भरते रहे और झड़ते रहे। मेरा सारा वीर्य निकल चुका था। पर सोनू की चूत अब भी लपलपा रही थी और अन्दर लहरें चल रही थी। कुछ ही देर में दोनों निश्चल से शान्त पड़े थे।

"अब उठो भी... आज उपवास थोड़े ही है... चलो कुछ खा लो !"

हम दोनों उठे और कपड़े पहन लिये। हम दोनों ने खाना खाया और सुस्ताने लगे।

फिर अचानक ही सोनू बोली, "विनोद... तुम्हारा लण्ड मस्त है... एक बार और मजा दोगे?"

"जी हाँ, सोनू कहो तो, कल ही लो..."

"कल नहीं, अभी... सुनो, बुरा तो नहीं मानोगे ना... मैं कुछ कहूँ ?"

"दीदी, आप तो मेरी जान हो... कहो ना !"

Reply With Quote
  #13  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community
Quote:
Originally Posted by neerathemall View Post
खेल खेल में -9




















मेरे भैया की शादी हो चुकी थी। मेरे छोटे होने के कारण भाभी मुझसे बहुत स्नेह रखती थी। यूँ तो वो मुझसे सिर्फ़ पांच साल ही बड़ी थी। सच पूछो तो उसके पृष्ठ-उभार मुझे बहुत लुभाते थे, बस ! लुभाते ही थे ... पर भाभी के गोल गोल सुघड़ चूतड़ों को दबाने की इच्छा कभी नहीं हुई। भाभी अधिकतर टुक्की वाला ब्लाऊज पहनती थी। उनके कठोर पर्वत मुझे बहुत सुन्दर लगते थे, पर उन्हें मसलने जैसी इच्छा कभी नहीं हुई। उनके चिकने बदन पर मेरी दृष्टि फ़िसल फ़िसल जाया करती थी, पर ऐसा नहीं था कि मैं उस चिकने बदन को अपनी बाहों में लेकर उन्हें चूम लूँ !

बस हम दोनों एक दूसरे के साथ साथ खेलते थे। मैं उनके साथ खाना बनवाने में मदद करता था, वॉशिन्ग मशीन में कपड़े धो देता था और भी बहुत से काम कर देता था।

एक दिन अचानक ही ये सारी मर्यादायें टूट कर छिन्न भिन्न हो गई। दोनों के मन में काम भावनायें जागृत हो उठी...। उस दिन सारा काम निपटाने के पश्चात हम दोनों यूँ ही खेल रहे थे, कि मन में ज्वाला सुलग उठी। भाभी का टुक्की वाला ब्लाऊज कील में फ़ंस कर फ़ट गया और सामने से चिर गया। भाभी का एक कठोर स्तन उभर कर बाहर निकल आया। मेरी नजरें स्तन पर ज्यों ही पड़ी, मैं देखता ही रह गया, सुन्न सा रह गया। भाभी एक दम सिहर कर दीवार से चिपक गई। मैं अपनी आंखे फ़ाड़ फ़ाड़ कर उन्हें देखने लगा। भाभी सिहर उठी और अपने हाथों को अपने नंगे स्तन के ऊपर रख कर छुपाने लगी। मैं धीरे धीरे भाभी की ओर बढ़ने लगा। वो सिमटने लगी। मेरा एक हाथ उसके कठोर स्तनों को छूने के लिये बढ़ गया।

"नहीं भैया, नहीं... मत छूना मुझे !"

"ये... ये... कितने चमक दार, कितने सुन्दर है..."

मेरी अंगुलियों ने ज्यों ही उनके स्तन छुये, मेरे बदन में जैसे आग लग गई।

भाभी तुरन्त झुक कर मेरी बगल से भाग निकली, और दूर जाकर जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगी। मैं स्तब्ध सा उन्हे देखता रह गया। जाने क्यूँ इस घटना के बाद मैं चुप चुप सा रहने लगा। मेरे दिल में भाभी के लिये ऐसे वैसे वासना भरे विचार सताने लगे। शायद जवानी का तकाजा था, जो मेरे मन को उद्वेलित कर रहा था।

शाम को मैं छत पर टहल रहा था कि भाभी वहां आ गई।

"क्या बात है, आजकल तुम बहुत गुमसुम से रहने लगे हो?"

"नहीं ... हां वो ... ओह क्या बताऊ मैं...!"

"भैया मेरी कसम है तुझे ... जो भी हो, अच्छा या बुरा... कह दो। मन हल्का हो जायेगा।"

"बात यह है कि भाभी ... अब कैसे बताऊँ..."

"मैंने कसम दी है ना ... चलो अपना मुँह खोलो..." शायद भाभी को मेरी उलझन मालूम थी।

"ओह कैसे कहूँ भाभी,... आप मुझे बहुत अच्छी लगने लगी हैं !"

"तो क्या हुआ ... तुम भी देखो ना मुझे कितने अच्छे लगते हो, है ना?" भाभी की नजरें झुक गई।

"पर शायद... मैं आपको प्यार करने लगा हूँ..."

"ऐ ... चुप... क्या कहते हो ... मैं तुम्हारी भाभी हूँ..." सुनकर भाभी ने मुस्करा कर कहा

"कसम दी थी सो बता दिया ... पर मैं क्या करू... मैं जानता हूँ कि तुम मेरी भाभी..."

"भैया, अपने मन की कहूँ... प्यार तो मैं भी तुम्हे करती हूँ" भाभी ने भी झिझकते हुये कहा।

"क्या कहती हो भाभी ..."

भाभी ने धीरे से मेरे सीने पर अपना सर रख दिया... मेरी सांसें तेज हो उठी। तभी भाभी मुड़ कर तेजी से भाग कर सीढ़ियाँ उतर गई। मैं भौचक्का सा उन्हें देखता रह गया। यह क्या हो गया ? भाभी भी मुझसे प्यार करती हैं !!! और फिर बड़े भैया ? सभी कुछ गड-मड हो रहा था। मैं छत से नीचे उतर आया। भाभी मुझे देख कर खुशी से बार बार मुस्करा रही थी जैसे उनकी कोई मन की मुराद पूरी हो गई हो। मैं चुपचाप अपने कमरे में चला आया। कुछ ही देर में भाभी भी वहीं पर आ गई। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, भाभी मेरे पास बैठ कर मेरे बालों को सहलाने लगी।

"कमल, तुम तो बहुत प्यारे हो, तुम्हें देख कर मुझे तो बहुत प्यार आता है !"

"भाभी..."

"ना भाभी नहीं, दीपाली कहो, मेरा नाम लो ..." भाभी ने अपनापन दिखाते हुये कहा।

"दीपा, तुम्हें देख कर जाने मन में क्या क्या होने लगता है, ऐसा लगता है कि तुम्हें प्यार कर लूँ, चूम लूँ..." मैंने अपने होंठों पर जीभ फ़ेर कर अपनी मन की बता दी। मेरे गीले होंठ देख कर भाभी ने भी अपने होंठ थूक से गीले कर लिये और मेरे पर धीरे से झुक गई और इतने नजदीक आ गई कि उसकी गरम सांसें मेरे चेहरे से टकराने लगी।

"गीले होंठ बहुत रसीले होते हैं, एक बार और गीले कर लो !"भाभी ने अपना रस भरा अनुभव बताया।

मैंने अपने होंठ फिर से गीले कर लिये और भाभी ने अपने गीले होंठ मेरे होठों से लगा दिये और मेरा ऊपर का होंठ अपने होंठों से चूसने लगी। इतने नरम और थरथराते होंठ मुझे असीम सुख दे रहे थे। मैं पहली बार गीले नरम होंठों का स्पर्श इतनी मधुरता के साथ महसूस कर रहा था। धीरे धीरे भाभी ने अपनी जीभ भी मेरे मुख में डाल दी। भाभी की एक एक हरकत मुझे वासना की पीड़ा दे रही थी। वो अब मेरे होंठों को बेतहाशा पीने लगी थी। जब वो उठी तो उनकी आंखे वासना से सुर्ख हो गई थी। पर मेरी हिम्मत अब भी उनके स्तनों को दबाने की नहीं हो रही थी।

"बबुआ, कैसा लगा ... दिल की मुराद पूरी हुई या नहीं ?" भाभी ने मुझे मुस्कराते हुये पूछा।

मैं शरमा गया। मेरी आंखें झुक गई।

"मेरे भोले देवर, तू तो बुद्धू ही रहेगा !" और वो हंस दी।

इन सभी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मेरा लण्ड बेहद कड़ा हो चुका था और पजामे में तम्बू जैसा तना हुआ था। भाभी ने मेरा कड़क लण्ड देखा तो उसके मुख से आह निकल गई। वो उठ कर चल दी। आज तो भाभी का मन बाग बाग हो रहा था। रात को भी भाभी ने मुझे खाने के बाद मिठाई भी खिलाई, फिर मेरा चुम्मा भी लिया। अब मेरे दिल में भाभी के शरीर की सम्पूर्ण रचना बस गई थी। रह रह कर मुझे भाभी को चोदने को चोदने का मन करने लगा था। कल्पना में भाभी की रस भरी चूत को देखता, उनके भरी हुई उत्तेजक चूंचियों के बारे में सोचने लगता था। भैया नाईट शिफ़्ट के लिये जाने वाले थे। मैं भी अपने कमरे में कम्प्यूटर पर काम करने लगा। भैया के जाने के बाद भाभी मेरे कमरे में चली आई।

"भाभी, मम्मी-पापा सो गये क्या ?"

"हां सो गये, भैया के जाते ही वे भी सो गये थे, समय तो देखो ग्यारह बज रहे हैं।"

"ओह हाँ, मैं भी अब काम बन्द करता हूँ, भाभी एक चुम्मा दे दो !"

मैं उठ कर बिस्तर पर बैठ गया। भाभी ने लाईट बन्द कर दी और कमरा भी अन्दर से बन्द कर दिया।

"अब चाहे कितनी भी बाते करो, कोई डर नहीं !"

"भाभी आप कितनी सुंदर हैं, आपके प्यारे नरम होंठ बार बार चूमने को मन करता है !"

"सच ... तुम भी बहुत अच्छे हो... मेरे दिल में बस गये हो।"

"मुझसे बहुत प्यार करती हो ना ...?"

हमारी प्यार भरी बातें बहुत देर तक चलती रहीं। मेरा दिल बहुत खुश था... भाभी और मैं बिस्तर पर लेट चुके थे... भाभी ने अपने गीले होंठ एक बार फिर मेरे गीले होठों से चिपका दिये। मेरा डण्डा तन गया था। भाभी मेरी पीठ को सहलाते हुये सामने पेट पर हाथ ले आई। भाभी के कड़े स्तन मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे। वो बार बार अपनी चूंचियाँ मेरी छाती पर दबा दबा कर रगड़ रही थी। मुझे लगा कि जैसे मैं भाभी को सचमुच में प्यार करने लगा हूँ। मैंने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया,"भाभी सच कहूँ तो मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ, तुम्हारे बिना अब नहीं रहा जायेगा !"

"आह, मेरे कमल, तुमने तो मेरे दिल की बात की बात कह दी, मैं भी कैसे रह पाऊंगी तुम्हारे बिना... ?!!"

"पर भाभी, बड़े भैया का क्या होगा...?"

"बड़े भैया अपनी जगह है, अपन दोनों को तो बस प्यार करना है सो करते रहेंगे !"

भाभी के हाथ मेरे शरीर पर इधर उधर फ़िसल कर मुझे रोमान्चित करने लगे थे। मेरी छाती पर सर रख कर वो लेट गई थी और प्यार भरी बातें करने लगी थी। क्या वो प्यार की प्यासी थी, या उन्हें शारीरिक तृप्ति चाहिये थी ? पर कुछ भी हो, मैं तो बहुत खुश था। भाभी अपने एक एक अंग को मेरे शरीर के ऊपर दबा रही थी, सिसक रही थी... चुम्बनों से मेरा मुख गीला कर दिया था।

लण्ड मेरा फ़ूलता ही जा रहा था। लग रहा कि बस भाभी की चिकनी चूत को मार ही दूँ। भाभी के हाथ जैसे कुछ ढूंढ रहे थे... और ... और यह क्या ... ढूंढते हुए उनका हाथ मेरे तने हुए लण्ड पर आ गया। उन्होंने उसे छू लिया ... मेरा दिल अन्दर तक हिल गया। दो अंगुलियों से मेरे लण्ड को पकड़ लिया और हिलाने लगी। मुझे कुछ बचैनी सी हुई... पर मैं हिल ना सका... भाभी ने मेरे होंठों में अपनी जीभ डाल दी और मुझे कस कर चिपका लिया। मुझे एक अजीब सी सिरहन दौड़ गई। मेरे हाथ अपने आप भाभी की कमर पर कस गये। मेरा बड़ा सा लण्ड अचानक भाभी ने जोर से दबा दिया। मेरे मन में एक मीठी सी वासनायुक्त चिंगारी भड़क सी उठी।

"भाभी, आह यह कैसा आनन्द आ रहा है ... प्लीज और जोर से दबाओऽऽ !" मैं सिसक उठा।

"आह मेरे भैया ... क्या मस्त है ... " भाभी भी अपनी सीमा लांघती जा रही थी।

"भैया, अपना पजामा उतार दो !"

मेरे दिल यह सुनते ही बाग बाग हो उठा... आखिर भाभी का मन डोल ही गया। अब भाभी को चोदने का मजा आयेगा।

"नंगा होना पड़ेगा... मुझे तो शरम आयेगी !"

"चल उतार ना ... "

"भाभी... मुझसे भी नहीं रहा जाता है ... मुझे भी कुछ करने दो !"

भाभी की हंसी छूट गई ...

"किसने मना किया है ... कोई ओर होता तो जाने अब तक क्या कर रहा होता !"

"मैं बताऊँ कि क्या कर रहा होता?"

"हूँ... अच्छा बताओ तो..."

"तुम्हें चोद रहा होता... तुम्हारी चूंचियों को मसल रहा होता !"

"हाय ये क्या कह दिया कमल ... " उन्होंने मुझे चूम लिया और अपना पेटीकोट ऊपर उठा लिया।

"ले मैं अपना पेटीकोट ऊपर उठा लेती हूँ, तू अपना पजामा नीचे सरका ले !"

"नहीं भाभी, अब तो अपने पूरे कपड़े ही उतार दो... मैं भी उतार देता हूँ"

मैंने बिस्तर से उतर कर अपने सारे कपड़े उतार दिये और बत्ती जला दी। भाभी भी पूरी नंगी हो चुकी थी। पर लाईट जलते ही वो अपने बदन को छिपाने लगी। मैं भाभी के बिलकुल सामने लण्ड तान कर खड़ा हो गया। एक बारगी तो भाभी ने तिरछी नजरों से मुझे देखा, फिर लण्ड को देखा और मुस्करा उठी। वो जैसे ही मुड़ी मैंने उन्हें पीछे से दबोच लिया। मेरा लण्ड उनके चूतड़ों की दरार में समाने लगा।

"क्या पिछाड़ी मारेगा ..."

"भाभी, आपकी गाण्ड कितनी आकर्षक है ... एक बार गाण्ड चोद दूंगा तो मुझे चैन आ जायेगा... हाय कितनी मस्त और चिकनी है !"

"तो तेल लगा दे पहले ..."

मैंने तेल ले कर उसकी गाण्ड में लगा दिया और अपनी अंगुली भी गाण्ड में घुसा दी।

"ऐ ... अंगुली नहीं, लण्ड घुसा..." फिर हंस दी।

भाभी पलंग पर हाथ रख कर घोड़ी सी बन गई। मैंने भाभी के चूतड़ को चीर कर तेल से भरे छेद पर अपना लण्ड रख दिया।

"अब धीरे से अन्दर धकेल दे ... देख धीरे से...!"

मुझे गाण्ड मारने का कोई अनुभव नहीं था, पर भाभी के कहे अनुसार मैंने धीरे से दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। मेरा सुपाड़ा फ़क से छेद में उतर गया।

"अब देख जोर से धक्का मारना ... इतना जोर से कि मेरी गाण्ड फ़ट जाये !"

मैंने पोजिशन सेट की और जोर से लण्ड को अन्दर दबा कर पेल दिया। मेरे लण्ड में एक तेज जलन सी हुई। मैंने लण्ड को तुरन्त बाहर खींच लिया। मेरे लण्ड की सुपाड़े से चिपकी झिल्ली फ़ट गई थी और खून की एक लकीर सी नजर आई।

"क्या हुआ...? निकाला क्यूँ ...? हाय कितना मजा आया था... !" भाभी तड़प कर बोली।

"यह तो देखो ना भाभी ! खून निकल आया है...!"

भाभी ने मुझे चूम लिया... और मुझसे लिपट गई।

"आह कमल, प्योर माल हो ..."

"क्या मतलब ... प्योर माल ?"

"अरे कुछ नहीं... इसे तो ठीक होने में समय लगेगा... तो ऐसा करो कि मन की आग तो बुझा लें ... कुछ करें..."

भाभी ने मेरे हाथ अपने सीने पर रख दिये... और इशारा किया कि उसे दबाये। मुझे इसका पूरा आईडिया था। भाभी की नंगी छातियों को मैं सहलाने लगा। भाभी ने अपनी आंखें बन्द कर ली। उनके उभारों को मैं दबा दबा कर सहलाने लगा था।

वासना से उनकी छाती कड़ी हो चुकी थी और चुचूक भी कड़क हो कर तन से गये थे। मैंने हौले हौले से चुचूकों और उरोजों को दबाना और मसलना आरम्भ कर दिया। भाभी के मुख से सिसकारियाँ फ़ूट पड़ी। मेरी नजरें भाभी की रस भरी चूत पर पड़ी और मैं जैसे किसी अनजानी शक्ति से उसकी ओर झुक गया। मैंने अब उसकी चूचियाँ छोड़ दी थी और उनकी जांघों को दबा कर एक तरफ़ करने लगा। भाभी ने स्वतः ही अपनी टांगें चौड़ी कर ली। चूत की एक मदहोश करने वाली महक आई और मेरा चेहरा उस पर झुकता चला गया। मैंने उसकी पतली सी दरार में जीभ घुमाई, भाभी तड़प सी गई। मेरा लण्ड बेहद कड़क हो उठा था पर हल्का दर्द भी था। मैंने भाभी की गाण्ड के छेद में एक उंगली घुसा दी और चूत के दाने और लम्बी से फ़ांक को चाटने लगा। भाभी तीव्र वासना की पीड़ा में जोर से कांपने लगी थी। उनकी जांघें जैसे कंपकंपी से लहराने लगी थी। उनके मुख प्यारी सी सी... सी सी करती हुई सिसकारियाँ फ़ूट रही थी। तभी उन्होंने मेरा चेहरा अपनी टांगों से दबा लिया और झड़ने लगी। उनका रज छूट गया था। अब उन्होने अपनी टांगें पर बिस्तर पर पसार दी थी और गहरी गहरी सांसें ले रही थी।

इधर मेरा लण्ड फ़ूल कर कुछ कर गुजरने को तड़प रहा था। पर दर्द अभी था।
भाभी ने कहा," कमल, तुम अब बिस्तर पर अपनी आंखें बन्द कर के लेट जाओ... बस आनन्द लो !"

मैं बिस्तर पर चित्त लेट गया। लण्ड कड़क हो कर लग रहा था कि फ़ट जायेगा। तभी मुझे अपने लण्ड पर कोमल सा स्पर्श महसूस हुआ। भाभी ने रक्त रंजित लण्ड अपने मुख में लिया था और हल्के से बहुत मनोहारी तरीके से चूस रही थी। मैं दर्द वगैरह सब भूल गया। भाभी ने अपने अंगूठे और एक अंगुली से मेरे लण्ड के डण्डे के पकड़ लिया और उसे ऊपर नीचे करने लगी। मेरे शरीर में वासना की आग जल उठी। भाभी की पकड़ बस डण्डे के निचले भाग पर ही थी। भाभी के होंठ मेरे जरा से निकले खून से लाल हो गये थे। उनकी आंखें बन्द थी और और उनकी अंगुलियाँ और मुख दोनों ही मेरे लण्ड को हिलाते और चूसते ... मुझे आनन्द की दुनिया में घुमा रहे थे। मेरा दिल अब भाभी को चोदने को करने लगा था, पर भाभी समझदार थी, सो मेरे लण्ड को अब वो जरा दबा कर मल रही थी। शरीर में आग का शोला जैसे जल रहा था। मेरे सोचने की शक्ति समाप्त हो गई थी। बस भाभी और लण्ड ही नजर आ रहा था। अचानक जैसे शोला भभका और बुझ गया। मैंने तड़प कर अपना गाढ़ा वीर्य जोर से बाहर निकाल दिया। भाभी ने अपना अनुभव दिखाते हुये पूरे वीर्य को सफ़ाई के साथ निगल लिया। मैं अपना वीर्य पिचकारियों के रूप में निकालता रहा।
"अब कमल जी, आराम करो, बहुत हो गया..."

"पर भाभी, मेरा लण्ड बस एक बार अपनी चूत में घुसवा लो, बहुत दिनों से मैं तुम्हें चोदने के लिये तड़प रहा हूँ..."

"श्...श्... धीरे बोलो ... अभी तीन चार दिनों तक इन्तज़ार करो... वर्ना ये चोट खराब ना हो जाये, दिन में कई बार इसे साफ़ करना...!"

वो मुझे हिदायतें देकर चली गई।

अब रोज रात को हम दोनों का यही खेल चलने लगा। तीन चार दिन बाद मेरा लण्ड ठीक हो गया और मैंने आज तो सोच ही लिया था कि भाभी की गाण्ड और चूत दोनों बजाना है... पर मेरा सोचना जैसा उसका सोचना भी था। उसने भी यही सोचा था कि आज की रात सुहागरात की तरह मनाना है।

रात होते ही भाभी अपना मेकअप करके आई थी। बेहद कंटीली लग रही थी। कमरे में आते ही उन्होंने अपना पेटीकोट उतार फ़ेंका। उनके देखा देखी मैंने भी अपना पजामा उतार दिया और मेरे तने हुये लण्ड को उनकी ओर उभार दिया। हम दोनों ही वासना में चूर एक दूसरे से लिपट गये। भाभी के रंगे हुये लिपस्टिक से लाल होंठ मेरे अधरों से चिपक गये। उनके काजल से काले नयन नशे में गुलाबी हो उठे थे। भाभी के बाल को मैंने कस के पकड़ लिया और अपने जवान लण्ड की ठोकरें चूत पर मारने लगा।

"बहुत करारा है रे आज तो तेरा लण्ड ... लगता है आज तो फ़ाड़ ही डालेगा मेरी...!"

"भाभी, खोल दे पूरी आज, अन्दर घुसा ले मेरा ये किंग लिंग... मेरी जान निकाल दे ... आह्ह्ह ... ले ले मेरा लण्ड !"

" बहुत जोर मार रहा है, कितना करारा है ... तो घुसा दे मेरी पिच्छू में ... देख कितनी सारी क्रीम गाण्ड में घुसा कर आई हूँ ... यह देख !"

भाभी ने अपनी गोरी गोरी गाण्ड मेरी तरफ़ उभार दी ... मुझसे अब सहन नहीं हो रहा था। मैंने अपना कड़कता हुआ लण्ड उनकी क्रीम भरी गाण्ड के छेद के ऊपर जमा दिया। मेरा सुपारा जोर लगाते ही आप से खुल पड़ा और छेद में समाता चला गया। मुझे तेज मिठास भरी गुदगुदी हुई। भाभी झुकी हुई थी पर उनके पास कोई हाथ टिकाने की कोई वस्तु नहीं थी। मैंने लण्ड को गाण्ड में फ़ंसाये हुये भाभी को कहा,"पलंग तक चल कर बताओ इस फ़ंसे हुये लण्ड के साथ तो मजा आ जाये !"

"कोशिश करूँ क्या ..."

भाभी धीरे से खड़ी हो गई पर गाण्ड को लण्ड की तरफ़ उभार रखा था। मेरा लम्बा लण्ड आराम से उसमें फ़ंसा हुआ था। भाभी के चलते ही मेरे लण्ड में गाण्ड का घर्षण होने लगा, मेरा लण्ड दोनों गोलों के बीच दब गया। वो और मैं कदम से कदम मिला कर आगे बढ़े ... और अंततः पलंग तक पहुँच ही गये। इस बीच गाण्ड में लण्ड फ़ंसे होने से मुझे लगा कि मेरा तो माल निकला... पर नहीं निकला... पलंग तक पहुंच कर भाभी हंसते हुये बोली,"मेरी गाण्ड में लण्ड फ़ंसा कर जाने क्या क्या करोगे ... फिर चूत में घुसा कर मुझे ना चलाना !"

"नहीं भाभी मुझे लगा कि अब तुम झुकोगी कैसे, सो कहा था कि पलंग तक चलो।"

"चल शरीर कहीं के ..." भाभी ने हंसते हुये कहा और अपनी टांगें फ़ैलाने लगी और आराम जैसी पोजीशन में आ गई। आधा बाहर निकला हुआ लण्ड मैंने धीरे से दबा कर पूरा अन्दर तक उतार दिया। इस बार मुझे स्वर्ग जैसा आनन्द आ रहा था। कसी हुई गाण्ड का मजा ही कुछ और ही होता है। भाभी पीछे मुड़ कर मुझे देखने लगी। मैं तो धक्के मारने में लगा हुआ था। अचानक भाभी हंस दी।
"सूरत तो देखो... जैसे कोई खजाना मिल गया हो ... चोदते समय तुम कितने प्यारे लगते हो !"

"भाभी, उधर देखो ना, मुझे शरम आती है..."

"अच्छा जरा अब जम कर चोद दे..." भाभी ने मुझे और उकसाया।

मेरे धक्के तेज हो गये थे। भाभी भी अपनी गाण्ड हिला कर आनन्द ले रही थी।
"अरे मर गई मां ... ये क्या ... मेरी चूत चोदने लगे..."

पता नहीं कब जोर जोर से चोदने के चक्कर में लण्ड पूरा बाहर निकल रहा था और पूरा अन्दर जा रहा था। इस बार ना जाने कैसे फ़िसल कर उनकी रस भरी चूत में चला गया।

"ओह भाभी सॉरी ... ये जाने कहां कहां मुँह मारता रहता है !"

भाभी मेरी इस बात पर हंस दी, "चल चूत में अधिक मजा आ रहा है... साला भचाक से पूरा ही घुस गया।"

मैंने उनकी चूत को जोर जोर से चोदना आरम्भ कर दिया। इस बार भाभी की सिसकियाँ तेज थी।

"भाभी जरा धीरे से ... मजा तो मुझे भी आ रहा है, पर पकड़े गये तो सारा मजा गाण्ड में घुस जायेगा !"

"क्या करूँ, बहुत मजा आ रहा है ..." भाभी ने अपना मुख भींच लिया और सिसकारी के बदले जोर जोर से अपनी सांसें छोड़ने लगी।

"अरे मर गई साले ... भेनचोद ... फ़ाड़ दे मेरी ... चोद दे इस भोसड़ी को ... मां ऽऽऽऽऽ..."

"भाभी, खूब मजा आ रहा है ना ... मुझे मालूम होता तो मैं आपको पहले ही चोद मारता..."

"बस चोद दे मेरे राजा ... उफ़्फ़्फ़्फ़ ... साला क्या लौड़ा है ...अंह्ह्ह्ह्ह्...।"

भाभी का बदन मस्त चुदाई से मैं तो ऐंठने लगा था। उसने अपनी चूत और चौड़ा दी ... मुझे चूत में फ़ंसा लण्ड साफ़ दिखने लगा था... मैंने शरारत की, उसके फ़ूल जैसे उभरे हुये गाण्ड के छेद में अपनी दो अंगुलियाँ प्रवेश करा दी। इसमें उसे बहुत मजा आया..."और जोर से गाण्ड में घुसा दे... साले तू तो मस्त लौण्डा है ... जोर के कर !"

लण्ड चूत चोद रहा था और अंगुलियाँ गाण्ड में अन्दर बाहर होने लगी थी।
"भेन की चूत ... मेरे राजा ... मैं तो गई ..."

"मैं भी आया... तेरी तो मां की चूत..."

"राजा और जमा के मार दे ..."

"ले रानी ... ले ... लपक लपक कर ले ... पूरा ले ले ... साली चूत है या ... ओह मैं गया..."

एक सीत्कार के साथ भाभी का रस चू पड़ा... और मेरा वीर्य भी... आह उसकी चूत में भरने लगा। वो और झुक गई, अपना सर बिस्तर से लगा लिया। हम दोनों पसीना पसीना हो चुके थे ... उसके पांव अब थरथराने लग गये थे... शायद वो इस अवस्था में थक गई थी। मैंने भाभी को सहारा दे कर बिस्तर पर लेटा दिया। भाभी ने अपना हाथ बढ़ा कर मुझे खींच लिया। मैं कटे वृक्ष के समान उनके ऊपर गिर पड़ा। भाभी ने अपने बदन के साथ मुझे पूरा चिपका लिया और बहुत ही इत्मिनान से मुझे लपेटे में लेकर प्यार करने लगी। जाने कब तक हम दोनों एक दूसरे को चूमते रहे, प्यार करते रहे... तभी भाभी चिंहुक उठी। मेरा खड़ा लण्ड जाने कब उनकी चूत में जोर मार कर अन्दर घुस कर चूत को चूमने लगा था। लाल टोपा चूत की गुलाबी चमड़ी को सहलाता हुआ भीतर घुस कर ठोकर मार कर अपनी मर्दानगी दिखाना चाह रहा था ...... रात फिर से गर्म हो उठी थी... दो जवान जिस्मों का वासना भरा खेल फिर से आरम्भ हो गया था ...

Reply With Quote
  #14  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community

Reply With Quote
  #15  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community

Reply With Quote
  #16  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community
Quote:
Originally Posted by neerathemall View Post
खेल खेल में 10




जब तक मैं मोना के साथ रहा, हमने सेक्स के बहुत मज़े लिए पर उसी बीच एक ऐसी बात हो गई जिसने मुझे बहुत डरा दिया। मुझको लगा कि अब न तो मुझको मोना के शरीर से खेलने का मौका मिलेगा और डाँट भी पड़ेगी।
हुआ यह कि एक दिन मोना दोपहर में मेरे घर आई, उस वक़्त घर में कोई नहीं था। मैंने उसको अन्दर बुला कर दवाजा बंद कर लिया, उसको अपनी बाहों में ले लिया और चूमने लगा पर वो अपने को मुझसे दूर करके बिस्तर पर बैठ गई।

मैंने उससे पूछा- जान ! क्या बात है? आज मन नहीं है या कुछ और कारण है?
मोना बोली- एक परेशानी हो गई है ! मेरी दीदी को सब कुछ पता चल गया है और वो कह रही है कि वो यह बात सबको बता देगी ! संजय, मुझको बहुत डर लग रहा है ! कुछ करो !
मैंने उसको समझाया कि मैं कुछ करुंगा और उसको प्यार करके घर भेज दिया। मैंने उसको तो समझा दिया पर मन ही मन में मैं खुद बहुत डर गया था। मैं मोना की दीदी को जानता था, वो कॉलेज़ में पढ़ती थी और गुस्से वाली भी थी। वो कुछ भी कर सकती थी सो डर लगना ही था।
अगले दिन में मेरी माता मोना की मम्मी के साथ बाज़ार गई और मैं घर पर अकेला था। तभी दरवाज़े की घण्टी बजी, मुझको लगा कि मोना होगी तो मैंने दरवाज़ा खोला। पर सामने देखते ही डर के कारण मेरी जान निकल गई। सामने मोना की दीदी खड़ी थी। मैंने चुपचाप उनको अन्दर आने को कहा तो वो अन्दर आ कर सोफे पर बैठ गई, मैं भी वहीं नज़रें नीची करके बैठ गया।
वो बोली- संजय, यह सब क्या चल रहा है?
मैं कुछ नहीं बोला तो वो बोली- अब नज़रे नीचे करके क्या बैठा है, जवाब दे? मुझको मोना ने सब कुछ बता दिया है, मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि तू ऐसा है।
मुझको लगने लगा था कि आज मेरी खैर नहीं पर अब क्या कर सकता हूँ।
उन्होंने मुझको अपने पास बुलाया तो मैं चुपचाप उठ कर उनके पास गया। वो क्या बोल रही थी, डर के कारण मुझको कुछ समझ नहीं आ रहा था।
तभी उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर कहा- अब बचना चाहते हो तो मेरा कहना मानना होगा !
मैंने कहा- दीदी, गलती हो गई ! माफ़ कर दो !
तो वो बोली- गलती तो तुमने की है पर अब बचने के लिए तुमको एक गलती और करनी पड़ेगी ! मेरी तरफ देखो ! तुमको मेरे साथ भी वही करना पड़ेगा जो तुमने मेरी बहन के साथ किया है !
यह सुन कर मैं एकदम सकते में आ गया, मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मेरी किस्मत इतनी अच्छी कैसे हो गई है ?
मेरे सामने एक 21 साल की भरपूर जवान लड़की बैठी है और खुद मुझको चोदने को कह रही है।
मैंने जब पहली बार दीदी को देखा था तब से ही यह इच्छा मेरे मन में थी, पर वो उम्र में बड़ी थी और गुस्से वाली भी थी। तो कहना तो दूर, उनको ठीक से देखने की भी हिम्मत नहीं हुई। पर आज वही लड़की मेरे पास बैठी थी। मैंने उनको सर से पाँव तक देखा। काला टॉप और सफ़ेद स्कर्ट में वो बहुत सुन्दर लग रही थी। रंग इतना साफ़ जैसे दूध हो !
मैं उनको देख ही रहा था कि वो बोली- क्या सोच रहा है ? क्या मैं मोना जितनी सुन्दर नहीं हूँ?
मैंने कहा- ऐसी बात नहीं है दीदी !
वो बोली- तो क्या सोच रहा है?
इतना कह कर उन्होंने मेरा हाथ अपनी टांगों पर रख दिया। कसम से जैसे ही उन्होंने यह किया, मुझको कर्रेंट सा लगा। कितनी चिकनी टांगें थी उनकी ! बिल्कुल मखमल की तरह ! मोना और उनमें जमीन-आसमान का फर्क था। मैंने सोच रहा था कि कहाँ मैंने इतने दिन खराब कर दिए।
मैंने हिम्मत करके उनके पैरों पर हाथ फेरना शुरु कर दिया। वो सोफे पर थोड़ा लम्बा होकर लेट गई। अब मेरी हिम्मत बढ़ गई और डर दूर हो गया था। मैंने उनकी टांगों पर हाथ फेरना शुरु कर दिया और धीरे धीरे उनकी स्कर्ट के अन्दर हाथ डालना शुरु कर दिया। क्या मज़ा था उसमें ! एकदम चिकनी और गोरी टाँगें थी उनकी ! मैंने उनकी स्कर्ट इतनी ऊपर कर दी कि मुझे उनकी पैंटी दिखने लगी। सफ़ेद रंग की पैंटी पहन रखी थी उन्होंने और उस पर गीला गीला धब्बा भी हो चुका था।
मैंने धीरे से उनकी दोनों टाँगें फ़ैलाई और उनकी तरफ देखा। वो मुस्कुराई और आँखें बंद करके बैठ गई। मैंने अपना मुँह उनकी चूत पर पैंटी के ऊपर से ही लगा दिया और चूमने लगा। उनके अमृत का खट्टा सा स्वाद मेरी जीभ महसूस कर रही थी। उनके हाथ मेरे सर पर थे और वो मेरे सर को दबा कर मेरा मुँह अपनी चूत के और पास ले जाने की कोशिश कर रही थी। मैंने अपने हाथ ऊपर उठा कर उनके स्तनों पर रख दिए और उनको सहलाने लगा।
मोना से दुगने आकार के स्तन थे उनके ! वो मुँह से आहा आहा उऽऽहू की आवाजें निकाल रही थी।
फिर मैंने उनसे कहा- दीदी बिस्तर पर आ जाओ ! आपको आराम मिलेगा।
वो उठी और मेरा हाथ पकड़े-पकड़े बिस्तर पर आकर लेट गई। उन्होंने अपनी एक टांग सीधी और एक टांग घुटना मोड़ कर रख ली। मुझको वो लेटी हुई कयामत लग रही थी। मैंने फुर्ती से अपनी शर्ट उतारी और उनकी टांगों पर चूमने लगा। उनकी टांगों, फिर जांघों को चूमते-चूमते मैंने उनकी स्कर्ट पूरी ऊपर कर दी और अपनी उंगली उनकी पैंटी में डाल कर उसको एक तरफ़ करके पहली बार उनकी चूत के दर्शन किये। क्या मस्त माल थी ! वो गुलाबी सी बिना बालों की चूत मुझको मस्त कर रही थी।
मैंने तुरंत उनकी पैंटी उतार दी तो उन्होंने अपनी टांगें पूरी चौड़ी कर दी। मैंने अपना मुँह उनकी गुलाबी चूत पर रख दिया और कभी उसको चाटता तो कभी अपनी जीभ उनकी चूत में डाल देता। मैं बार-बार उनके दाने को अपनी जीभ से सहला रहा था और हर बार वो मुँह से सेक्सी आवाज़ निकालती जो मुझको मस्त कर देती। थोड़ी देर तक ऐसा करने के बाद मेरा लंड पूरा तन गया था। मैंने अपने रहे सहे कपड़े भी उतार दिए और पूरा नंगा होकर उनके सामने खड़ा हो गया और अपने हाथ उनके टॉप में डाल कर स्तनों पर रख दिए। अब मैं उनके मोटे मोटे चूचे दबा रहा था।
उन्होंने प्यार से मुझको देखा और उनकी नज़र मेरे लंड पर आकर रुक गई। उन्होंने अपने कोमल हाथों में मेरे लंड को पकड़ा और उसको सहलाने लगी। फिर धीरे से उन्होंने अपने गुलाबी होंठ मेरे लंड पर रख कर उसको चूमना शुरु किया। फिर उन्होंने अपने होंठ गोलाई में किये और मेरा टोपे पर रख दिए। मैंने उनके सर पर हाथ रख कर अपना लंड उनके मुँह में डालना शुरू किया। मेरा लंड पूरा उनके मुँह में था और वो बड़े प्यार से उसको चूस रही थी। मुझको बड़ा मज़ा आ रहा था।
जल्दी ही मैंने उनका टॉप और स्कर्ट उतार दी, अब वो सिर्फ ब्रा में थी और उनके स्तन बाहर आने को बेताब थे। मैंने उनकी ब्रा का हुक खोल कर उनको चूमना शुरू कर दिया और फिर उनके चुचूक को मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। मेरी एक ऊँगली उनकी चूत में अंदर-बाहर हो रही थी और वो अपने हाथों से मेरे लंड से मुठ मार रही थी।
थोड़ी देर इसी अवस्था में रहने के बाद हम दोनों 69 की दशा में आ गए। अब मेरा मुँह और जीभ उनकी चूत चाट रही थी और वो मेरा लंड अपने मुँह में अन्दर-बाहर कर रही थी। थोड़ी देर में हम दोनों झड़ गए और वैसे ही लेट गए। उनकी चूत से गंगा-जमुना बह रही थी और क्या खुशबू आ रही थी।
थोड़ी देर में हम फिर तैयार थे।
उन्होंने कहा- अब देर मत कर और मेरी जवानी की प्यास बुझा दे !
तो मैंने अपने लंड का टोपा उनकी दोनों टांगो के बीच के गुलाबी छेद पर रख दिया। मैंने धीरे धीरे जोर लगाना शुरू किया। उन्होंने बताया कि वो पहली बार चुद रही है, इससे पहले वो सिर्फ अपनी उंगली से ही मज़ा किया करती थी और उन्होंने अपनी झिल्ली भी ऐसे ही तोड़ी ली थी।
मैंने कहा- दीदी, थोड़ा दर्द होगा पर फिर मज़ा भी बहुत आएगा !
तो वो बोली- इस मज़े के लिए मैं कुछ भी सहने को तैयार हूँ !
वैसे भी उनकी चूत का पानी अभी तक रुका नहीं था सो चूत बहुत चिकनी हो रही थी। मैंने धीरे धीरे जोर लगाना शुरू किया, उनको थोड़ा दर्द हुआ पर जल्द ही मेरा लौड़ा उनकी चूत में उतर गया। उन्होंने मुझे कस कर पकड़ किया। अब मैं धक्के मार रहा था और वो चूतड़ उठा-उठा कर मेरा साथ दे रही थी। बीच बीच में मैं उनके स्तन भी दबा रहा था। मुझको बिल्कुल जन्नत का सुख मिल रहा था। थोड़ी देर में उनका शरीर ऐंठने लगा और मुझको भी लगा कि मेरा माल निकलने वाला है, मैंने अपना लंड उनकी चूत से जैसे ही निकाला, उनकी पिचकारी छूट गई, वो झड़ चुकी थी, मैंने अपना लंड उनके मुँह में डाल दिया, फिर दो तीन झटकों के बाद मेरा सारा माल उनके मुँह में निकल गया। वो मेरा सारा पानी चाट गई और अपनी जीभ से मेरा लंड भी साफ़ कर दिया। अब मैं थोड़ा नीचे सरक कर उनके ऊपर लेट गया और उनके चुचूक मुँह में लेकर चूसने लगा।
थोड़ी देर बाद हमने एक बार और सेक्स का मज़ा किया और मैंने उनकी गांड भी मारी ज़िस कारण थोड़ी देर तक तो वो ठीक से चल भी नहीं पाई।
उस दिन हमने तीन घंटे सेक्स का बहुत मज़ा लिया। जब वो जाने लगी तो उन्होंने मुझसे कहा- मुझको पता नहीं था कि तुम ऐसे हो ! वरना मोना से पहले तुम्हारे लंड का स्वाद मैं ही चखती ! और आज मैं सोच कर आई थी कि मैं आज तुम से अपनी प्यास बुझा ही लूंगी। अब जब भी मौका मिले, तुम मेरे शरीर से खेल सकते हो।
मैंने कहा- पर मोना के होते हम कैसे मिल सकते हैं?
तो वो मुस्कुराई और बोली- मोना को भी मैंने इसी शर्त पर माफ़ किया है। तुम चिंता मत करो !
यह कह कर वो मुझे चूम कर चली गई।
बाद में मोना ने पूछा- क्या हुआ था?



तो मैंने उसको चूम कर कहा- तुम चिंता मत करो ! अब हमको कोई चिंता नहीं !
और मोना को बिस्तर पर पटक कर उस पर चढ़ गया। मैं बहुत खुश था- आखिर दो चूतों का स्वाद जो मिला था मेरे लौड़े को !
उसके बाद जब भी जिस भी बहन के साथ मौका मिलता, मैं सेक्स के मज़े लेता। जब तक हम वहाँ रहे, हमने सेक्स के बहुत मज़े लिए। आज हम दूर हो गए और कई लड़कियाँ मेरे बिस्तर पर आ चुकी हैं पर मोना और उसकी दीदी के साथ गुजरे सेक्स के वो पल और उन बहनों के नंगे जिस्म मुझको बहुत याद आते हैं।

Reply With Quote
  #17  
Old 3rd September 2013
incestluver's Avatar
incestluver incestluver is offline
Custom title
 
Join Date: 3rd June 2011
Location: EARTH
Posts: 1,980
Rep Power: 8 Points: 999
incestluver has received several accoladesincestluver has received several accoladesincestluver has received several accoladesincestluver has received several accolades
nice........
______________________________
ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन जब प्यार करे कोई तो देखे केवल तन...

Reply With Quote
  #18  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community
Quote:
Originally Posted by neerathemall View Post
खेल खेल में 11


मेरे मम्मी-
पापा को तुरन्त मामा जी के घर जाना पड़ा।
परीक्षा के कारण पिताजी ने कहा कि तुम
दोनों भाई घर पर ही रहकर पढ़ाई करो, हम
मामा के घर से दो दिन बाद वापिस आ जायेंगे।
हम दोनों भाई ऐसे नहीं थे कि अपने लिए
खाना बना सकें इसलिए मम्मी ने
कहा कि खाना बनाने के लिये पड़ोस में रहने
वाली संजना को बोल देती हूँ, वो आकर तुम
दोनों का खाना बना देगी। बस दो दिन की बात
है किसी तरह काम चला लो।
वो शनिवार का दिन था। सुबह सुबह मम्मी-
पापा मामा के घर चले गये और हम दोनों भाई स्कूल
परीक्षा देने। दोपहर को जब हम दोनों स्कूल से
वापस आये तो देखा कि संजना दीदी हमारे घर
आकर खाना बना चुकी हैं और हम
दोनों भाइयों का इंतजार कर रही हैं।
उन्होंने हमें गर्म खाना खिलाया और शाम
को दुबारा आने को बोल कर अपने घर चली गईं।
हम दोनों भाई भी खेलने चले गये। शाम को खेलकर
जब मैं संजना दीदी के घर गया तो उनकी मम्मी ने
मुझे बहुत डाँट लगाई, बोली- तेरी मम्मी घर में
नहीं हैं और तूने सारा दिन खेलने में बिता दिया?
अगली परीक्षा की तैयारी भी नहीं की? अब आज
रात को संजना दीदी तेरे घर में ही रहेगी और
तेरी परीक्षा की तैयारी कराएगी। अगर इस बार
भी तूने लापरवाही कि तो मेरी मार तो पक्की।
मैंने डरकर तुरंत हाँ कर दी।
रात को संजना दीदी अपने घर का काम निपटाकर
मेरे घर आईं। उन्होंने प्रेम से खाना बनाकर हम
दोनों भाइयों को खिलाया। पढ़ाने के समय
बिजली चली गई। संजना दीदी हम
दोनों भाइयों को पढ़ाने के लिए छत पर ले गईं।
वहाँ करीब 11 बजे तक हमने उनसे पढ़ाई की, उसके
बाद हम सब सोने लगे।
बिजली नहीं होने के कारण मैं नीचे घर से एक चादर
ले आया और उसी को छत पर बिछा कर हम
दोनों भाई सो गये। मेरा भाई थका होने के कारण
लेटते ही सो गया। संजना दीदी की भी पलकें
भारी हो रही थीं। वे बात करते-करते मेरे बराबर
में ही लेट गईं।
मैंने पूछा- दीदी, आपको अलग से चादर ला दूँ?
उन्होंने मना कर दिया, बोली- अभी तेरे पास
ही लेट जाती हूँ, थोड़ी देर बाद चली जाऊँगी।
मेरे लिये उनको इतने करीब महसूस
करना पहली बार हो रहा था। इससे पहले कभी मैंने
इस बारे में सोचा भी नहीं था। उनका सामिप्य
मुझे अच्छा लग रहा था। मैं उऩसे बात कर
रहा था लेकिन मादा स्पर्श से
प्रकृति की स्वाभाविक प्रेरणा मेरे लिंग पर असर
डालने लगी। थोड़ी देर में तनाव मेरी निक्कर पर
भी महसूस होने लगा।
संजना दीदी ने भी इसे महसूस कर लिया।
वो अपना हाथ आगे बढ़ा कर बोली- यह क्या है?
मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था।
वो गुस्से में बोली- मेरे बारे में ऐसी सोच रखता है?
तुझे पता है कि तू मेरे से कितना छोटा है? तुझे शर्म
नहीं आती?
मैं डर से भागकर नीचे अपने कमरे में आ गया। पीछे
पीछे संजना दीदी भी नीचे आ गई तो मेरी हालत
और खराब हो गई लेकिन संजना दीदी बोली-
इतना डरने की जरूरत नहीं है पर तू मेरे बारे में
ऐसा सोचता है, तूने कभी बताया नहीं?
मैंने कहा- दीदी, मैं क्या सोचता हूँ, मुझे खुद समझ में
नहीं आ रहा।
दीदी ने निक्कर के ऊपर से ही मेरे लिंग को स्पर्श
किया और बोली- मतलब तू नहीं सोचता, तेरा यह
पप्पू सोचता है।
मैं तो इतना डर चुका था कि जवाब देने की हिम्मत
ही नहीं जुटा पा रहा था। तभी दीदी बोली-
जरा दिखा अपना पप्पू ! देखूँ तो कैसा है?
डर के बावजूद मुझे दीदी का स्पर्श
बड़ा सुखदायी लग रहा था, मन कर
रहा था वो वहाँ से हाथ ना हटाएँ।
दीदी ने मेरी निक्कर को नीचे कर दिया,
मेरा 'पप्पू' तोप की तरह तना था, गोले छोड़ने
को तैयार।
दीदी ने बहुत ही प्यार से उसे अपने मुलायम
हाथों में ले लिया और आगे-पीछे रगड़ना शुरू कर
दिया। मेरे जीवन के उस असीम आनन्द
की कल्पना से आज भी सिहर उठता हूँ।
कुछ समय बाद ही मेरे लिंग में से क्रीम कलर
का द्रव निकलने लगा। दीदी ने कपड़ा उठा कर
उसको साफ कर दिया। साफ करने के बाद दीदी ने
पूछा- कैसा लगा?
मेरे पास शब्द नहीं थे।
मेरे चेहरे पर खुशी की लहर और मुस्कुराहट देखकर
दीदी बोली- तेरा चेहरा बता रहा है कि तुझे बहुत
मजा आया?
मैंने हाँ में अपना सर हिला दिया।
थोड़ी देर बाद मैंने हिम्मत करके दीदी से कहा- एक
बार फिर से करो ना, बहुत अच्छा लग रहा था।
दीदी ने पूछा- तुझे पता है तू क्या कर रहा था?
मुझे पता नहीं था।
दीदी ने मेरे लिंग को हाथ में पकड़ कर कहा-
अच्छा बता, यह पप्पू किस काम आता है?
मैंने कहा- सू सू करने के !
दीदी हँस पड़ी- अभी थोड़ी देर पहले जो इसमें से
निकला, वो क्या सू सू था?
मैंने कहा- नहीं, कुछ मलाई जैसा था।
"बस तो फिर यह समझ ले कि ये पप्पू सू सू करने के
अलावा भी और बहुत महत्वपूर्ण काम करता है।"
मेरी आँखों में बस जिज्ञासा थी।
दीदी दो क्षण ठहरी, फिर बोली- तुझे ये सब कुछ
सीखना है क्या?
मैंने पूरी तरह से सम्मोहित था और इसी सम्मोहन
में मैंने कहा- हाँ !
दीदी बोली- मैं तुझे सब कुछ सिखा दूंगी, पर
वादा करना होगा कि किसी को नहीं बतायेगा।
अब तो उस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिये मैं
कुछ भी करने के लिये तैयार था, मैंने वादा कर
लिया किसी को कुछ नहीं बताऊँगा।
दीदी ने मेरा कान पकड़ा और कठोर स्वर में
चेताया- किसी को भी बताएगा तो तेरे मम्मी-
पापा से तेरी शिकायत कर दूंगी।
मैं डर और सम्मोहन, इन दो मनोभावों के वशीभूत
था, मुझे पता भी नहीं चला कब बिजली आ गई थी।
दीदी ने पंखे की हवा में उड़ते अपने कुर्ते
का निचला सिरा पकड़ा और मेरी आँखों में देखते हुए
उसे धीरे धीरे उठाने लगी।
मेरी आँखें फैल गईं। ब्रा में ढके उनके सधे हुए स्तन मेरे
सामने आ गए। पूर्ण विकसित युवती का वक्ष।
जिंदगी में पहली बार देख रहा था। मेरा 'पप्पू'
आँधी सी उठाती उत्तेजना के सामने बेकाबू था।
दीदी ने मेरे लिंग की ओर संकेत करते हुए कहा- तेरे
पप्पू को तो तेरे से भी ज्यादा जल्दी है !?
मेरी सूखी सी आवाज निकली- नहीं दीदी, आप
जैसा बोलोगी, मैं वैसा ही करूंगा। यह पप्पू
पता नहीं क्यों मेरे काबू में नहीं है।
"आज यह तेरे नहीं, मेरे काबू में है।" कहते हुए
दीदी ने अपने हाथ पीठ पीछे ले जाकर हुक खोल
दिए और कंधों से सरकाते हुए ब्रा उतार कर अलग
कर खाट पर रख दी।
मेरी आँखों के सामने उनके दोनों स्तन पूरे गर्व से खड़े
थे, साँसों की गति पर ऊपर नीचे होते। मेरी साँस
बहुत तेजी से चलने लगी। मैं खुद पर से
अपना नियन्त्रण खोकर पूरी तरह से दीदी के वश
में था।
दीदी ने मुझे अपने पास खींचा और मेरा मुँह पकड़कर
अपने बाएँ वक्ष पर लगा दिया। उसकी भूरे रंग
की टोपी मेरे मुँह में थी और मुझे शहद जैसा आनन्द दे
रही थी।
उत्तेजनावश मैंने दीदी के वक्ष पर काट लिया।
दीदी के मुँह से निकल रही लयपूर्ण सी...सी...
की आवाज में ऊँची 'आह' का हस्तक्षेप हुआ।
उसने मेरा सिर थपथपाया और कहा- धीरे धीरे कर
न। अब तो ये दूध का गोदाम तेरा ही है।
जितना चाहे उतना पीना।
दीदी की बात मेरी समझ में आ गई और मैंने फिर
धीरे धीरे प्यार से पीना शुरू कर दिया। बदल-
बदलकर कभी दायें को पीता, कभी बायें को !
दीदी को अपूर्व सुख मिल रहा था, उनका हाथ मेरे
लिंग पर प्यार से घूम रहा था।
रात अपने दूसरे पहर में प्रवेश कर चुकी थी और मैं
इस दुनिया से आनन्द के स्वर्ग में पहुँच
चुका था जहाँ संजना दीदी मुझे साक्षात
रति की देवी नजर आ रही थी।
मैं बस उन दुग्धकलशों को पिए जा रहा था, मुझे
इससे ज्यादा कुछ आता भी तो नहीं था।
दीदी ने मेरा प्रवेश अगली कक्षा में कराने
का फैसला किया, मुझसे बोली- सिर्फ दूध
ही पीता रहेगा या मलाई भी खायेगा?
मैंने कहा- आपका शिष्य हूँ। अभी तक आपने सिर्फ दूध
पीना ही तो सिखाया है।
दीदी उठ खड़ी हुई और अपनी सलवार
की डोरी झटके से खींच दी। कमर से
डोरी ढीली करके एक क्षण मेरी आँखों में देखा और...
देखने के लिए एक बटा दस सेकंड चाहिए होते हैं।
सेकंड के उस दसवें हिस्से में उनकी गोरी कमर,
जांघों, घुटनों को प्रकट करती हुई सलवार के
एड़ियों के पास जमा हो जाने का दृश्य मेरी आँखों में
रील की तरह दर्ज हो गया। अब दीदी, एक
पूरी औरत, अपनी पूर्ण प्राकृतिक नग्नावस्था में
मेरे सामने थी।
मैं, जो अब तक दूध के कलशों पर ही सम्मोहित था,
बेवकूफ-सा उनकी टांगों के बीच के काले घास के
मैदान पर जाकर अटक गया। लग रहा था उसे
देखना वर्जित है पर न जाने किस प्रेरणा से
मेरी निगाह वहीं बँध गई थी। कभी ऐसा दृश्य
देखा नहीं था। मुझे वहाँ निहारना अच्छा लग
रहा था। मेरा 'पप्पू' भी विकराल हो गया था।
दीदी बोली- ज़न्नत का दरवाजा दिखाई देते
ही दूध का गोदाम छोड़ दिया? तुझे पता है कि इस
जन्नत में जाने का रास्ता दूध के गोदाम से होकर
ही जाता है?
मैंने पूछा- दीदी, वो कैसे?
दीदी हँसने लगी। वो मेरे सामने बैठ गई। वो मुझसे
बड़ी थी, उन्हें मेरी खाट के सामने जमीन पर बैठते
देख मुझे बहुत संकोच हुआ। उन्होंने मेरे लिंग को अपने
नाजुक हाथों में पकड़कर प्यार से सहलाया। फिर
अपना मुँह आगे बढाया और उसके मुँह पर "पुच्च..."
एक चुम्मी दे दी।
मुझे नहीं मालूम था इसे चूमा भी जाता है, पर
वो मेरी गुरू थी, उन्होंने मुझसे पूछा- कैसा लगा?
"बहुत अच्छा !" उन्होंने उसे अपने मुँह में खींच
लिया और लालीपोप की तरह चूसने लगी।
यह मेरे लिये सर्वथा नया अनुभव था। मैंने कुछ देर
पहले ही प्राप्त हुए अनुभव के आधार पर दीदी के
वक्षों को सहलाना शुरू कर दिया।
थोड़ी देर बाद दीदी फर्श से उठी और मुझे बिस्तर
पर लिटा दिया। उसके बाद घूमी और मेरे ऊपर खुद
इस तरह लेट गई कि मेरा लिंग पूरी उनके मुँह
की तरफ आ गया और
उनकी दोनों टांगों का संधिस्थल मेरे मुंह की तरफ।
उन्होंने मेरा लिंग फिर से मुंह में उठाया और पहले
की भाँति चूसना शुरू कर दिया। साथ
ही अपनी टांगों के बीच की दरार को मेरे मुँह के
ऊपर रगड़ने लगी। थोड़ी देर तक अजीब लगने के
बाद मुझे इसमें भी आनन्द आने लगा। मैंने खुद
ही अपना मुँह खोल दिया और उनकी योनि के
दोनों होठों को चूसना शुरू कर दिया।
काफी देर तक हम दोनों इस अवस्था का आनन्द लेते
रहे। फिर अचानक मेरे लिंग से वो ही द्रव निकलने
लगा जो करीब एक घंटा पहले निकला था। मैंने
महसूस किया कि दीदी की योनि से
भी हल्की हल्की बारिश मेरे मुँह पर हो रही है
जिसे चाटने पर कसैला नमकीन स्वाद महसूस हुआ।
दीदी ने पूछा- कैसी लगी मेरी मलाई?
अब मुझे समझ में आया थोड़ी देर पहले दीदी किस
मलाई की बात कर रही थी। मैंने कहा, "बहुत
अच्छी, बहुत मजा आया दीदी।"
मैं दो बार स्खलित हो चुका था। पहली बार
दीदी के हाथों में और दूसरी बाद दीदी के मुँह में।
मैं खुद को आनन्द की पराकाष्ठा पर महसूस कर
रहा था।
परन्तु दोस्तो, अभी तो असली आनन्द बाकी था।
दीदी ने मेरी तंद्रा भंग करते हुए फिर पूछा- इससे
भी ज्यादा मजा चाहिए?
अब मेरे चौंकने का समय था, मैंने कहा- दीदी, मैंने
इतना ज्यादा मजा जीवन में कभी नहीं पाया।
ऐसा लग रहा है कि मैं जन्नत में हूँ। क्या इससे
भी अधिक मजा मिल सकता है?
दीदी बोली- अभी तूने खाली जन्नत
का दरवाजा देखा है, जन्नत के अंदर
तो गया ही नहीं।
इतना बोलकर दीदी ने मेरे पूरे बदन को नीचे से
उपर तक चाटना शुरू कर दिया, यह मेरे लिये
अनोखी बात थी। मैं भी प्रत्युत्तर में
वैसा ही करते हुए दीदी का ऋण चुकाने
को प्रयत्नशील था।
करीब पन्द्रह मिनट तक हम दोनों एक दूसरे के
बदन को इस प्रकार चाटते रहे और पसीने से
तरबतर नमकीन स्वाद का आनन्द लेते रहे।
मैंने महसूस किया कि मेरा लिंग फिर से करवट लेने
लगा है और एक नई पारी खेलने के लिये तैयार है।
अपने पहले दोनों स्खलन के अनुभवों को देखते हुए मुझे
इस बार कुछ नया होने की उम्मीद थी। मेरा लिंग
उठकर अपने गुरू यानि मेरी दीदी को सलामी देने
लगा और उनकी नाभि से टकराने लगा।
दीदी ने मुझे छेड़ते हुए कहा- तेरे पप्पू को चैन नहीं है
क्या? दो बार मैं इसको मैदान में हरा चुकी हूँ, फिर
से कुश्ती करना चाहता है? मैंने कहा- दीदी, इस
कुश्ती में इतना मजा आ रहा है कि बार-बार हारने
का दिल कर रहा है।
"यही तो नए पहलवान की खूबी है। मैंने ऐसे
ही थोड़े इसे चुना है।" दीदी ने कहा।
उन्होंने दो बार उस 'चेले' को ठुकठुकाकर
उसकी सलामी स्वीकार की और पूछा- तैयार है
ना?
"हाँ दीदी !" मैंने उत्साह से कहा।
दीदी ने एक बार फिर से मेरा लिंग अपने मुलायम
हाथों में ले लिया। लिंग की सख्ती और
विकरालता देखकर बोली- लगता है, इस बार तू मुझे
हराने के मूड में है।
और वो मुझे नीचे लिटा कर मेरे टांगों के दोनों ओर
अपनी टांगें करके मेरे ऊपर बैठ गई। मैं उत्सुक शिष्य
की तरह उनकी हर क्रिया देख रहा था और
उसका आनन्द ले रहा था। मुझे आश्चर्य में डालते हुए
दीदी ने अपनी टांगों के बीच की दरार को मेरे
लिंग पर रखा और हल्का सा धक्का लगाया। और
मुझे लगा कि मेरा लिंग ही गायब हो गया। मेरे पेड़ू
की सतह उसकी पेड़ू की सतह से ऐसे मिली हुई
थी जैसे वहाँ कभी कुछ था ही नहीं।
कहाँ चला गया?
दीदी मेरे ऊपर बैठ कर हल्के-हल्के आगे-पीछे हिलने
लगी, बोली- अब बताओ, कैसा लग रहा है। पहले से
ज्यादा मजा आ रहा है कि नहीं?
सुखद एहसास से मेरा कंठ गदगद हो रहा था।
योनि के अन्दर लिंग के रगड़ खाने का आनन्द
तो पिछले दोनों बार के आनन्द से बहुत ही अलग और
उत्तेजक था। सचमुच यही जन्नत है। ऐसा लग
रहा था जैसे अब तक मैं कहीं रास्ते में था और अब
मंजिल पर पहुँच गया हूँ।
दीदी बोली- अब तक जो जन्नत तुझे बाहर से
दिखाई दे रहा था, अब तू उस जन्नत के अन्दर
प्रवेश कर गया है।
मैंने भी दीदी को खुशी देने के लिए नीचे लेटे लेटे
ही उनके दोनों वक्षों को सहलाना शुरू कर दिया।
नशे में मेरी आँखें मुंद गईं। वो अपना काम करने में
व्यस्त थी और मैं अपना।
अचानक दीदी की हरकतें तेज हो गईं। अपने पेड़ू
को मुझ पर जोर से मसलती हुई मुँह से अजीब-
सी मोटी आवाज में 'आह.....आह.......' निकालने
लगी।
मैंने घबराकर पूछा- क्या हुआ?
दीदी ने झुककर मुझे चूम लिया।
मुझे इत्मीनान हुआ, कुछ गड़बड़ नहीं है। शायद
सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति होने वाली है।
दीदी ने कहा- मेरा तो हो गया। अब हिम्मत
नहीं है।
लेकिन मुझे मंजिल नहीं मिली थी। मैं कमर जोर जोर
से उचकाकर उसे पा लेने के लिए बेचैन था।
दीदी ने कहा- तेरा दो बार हो चुका है ना।
इसलिए थोड़ा समय लगेगा।
वो मेरे ऊपर से उतर गई और हाथ से मेरा लिंग
पकड़़कर तेजी से आगे पीछे करके सहलाने लगी।
मैंने कहा- दीदी, ऐसे वो मजा नहीं आ
रहा जो जन्नत के अन्दर आ रहा था।
दीदी फिर से मेरे ऊपर बैठ गई और दोबारा से मेरे
लिंग को अपनी जन्नत में धारण कर लिया। अब
फिर से मुझे वही रगड़ का आनन्द मिलने लगा। फिर
से जन्नत का मजा मिलने लगा। पुन: मैं फिर से
दीदी के वक्षों को सहलाने लगा।
दीदी ने मेरी तरफ देखा और बोली- इस बार
की कुश्ती में तूने मुझे हरा दिया। आखिर तूने
बदला ले ही लिया।
कुछ देर बाद मेरे लिंग से तेजी से स्खलन होने लगा।
दीदी भी आह........ आह........ करती फिर स्खलित
होने लगी। हम दोनों एक साथ स्खलित हो गये, और
सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हुई।
तो पाठकों यह थी मेरे यौवन के प्रथम गुरू
की दीक्षा,

Reply With Quote
  #19  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community
Quote:
Originally Posted by neerathemall View Post
खेल खेल में 12
आज भी आकाश में हल्के बादल थे। हवा चल रही थी ... मेरे जिस्म को गुदगुदा रही थी। एक तरावट सी जिस्म में भर रही थी। मन था कि उड़ा जा रहा था। उसी मस्त समां में मेरी आंख लग गई और मैं सो गई। अचानक ऐसा लगा कि मेरे शरीर पर पानी की ठण्डी बूंदे पड़ रही हैं। मेरी आंख खुल गई। हवा बन्द थी और बरसात का सा मौसम हो रहा था। तभी टप टप पानी गिरने लगा। मुझे तेज सिरहन सी हुई। मेरा बदन भीगने लगा। जैसे तन जल उठा।

बरसात तेज होती गई ... बादल गरजने लगे ... बिजली तड़पने लगी ... मैंने आग में जैसे जलते हुये अपना पेटीकोट ऊंचा कर लिया, अपना ब्लाऊज सामने से खोल लिया। बदन जैसे आग में लिपट गया ...

मैंने अपने स्तन भींच लिये ... और सिसकियाँ भरने लगी। मैं भीगे बिस्तर पर लोट लगाने लगी। अपनी चूत बिस्तर पर रगड़ने लगी। इस बात से अनजान कि कोई मेरे पास खड़ा हुआ ये सब देख रहा है।

"रीता भाभी ... बरसात तेज है ... नीचे चलो !"

मेरे कान जैसे सुन्न थे, वो बार बार आवाज लगा रहा था।

जैसे ही मेरी तन्द्रा टूटी ... मैं एकाएक घबरा गई।

"दीपू ... तू कब आया ऊपर ... " मैंने नशे में कहा।

"राम कसम भाभी मैंने कुछ नहीं देखा ... नीचे चलो" दीपू शरम से लाल हो रहा था।

"क्या नहीं देखा दीपू ... चुपचाप खड़ा होकर देखता रहा और कहता है कुछ नहीं देखा" मेरी चोरी पकड़ी गई थी। उसके लण्ड का उठान पजामें में से साफ़ नजर आ रहा था। अपने आप ही जैसे वह मेरी चूत मांग रहा हो। मैंने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर खींच लिया और उसे दबोच लिया ... कुछ ही पलों में वो मुझे चोद रहा था। अचानक मैं जैसे जाल में उलझती चली गई। मुझे जैसे किसी ने मछली की तरह से जाल में फ़ंसा लिया था, मैं तड़प उठी ... तभी एक झटके में मेरी नींद खुल गई।

मेरा सुहाना सपना टूट गया था। मेरी मच्छरदानी पानी के कारण मेरे ऊपर गिरउ गई थी। दीपू उसे खींच कर एक तरफ़ कर रहा था। मेरा बदन वास्तव में आधा नंगा था। जिसे दीपू बड़े ही चाव से निहार रहा था।

"भाभी ... पूरी भीग गई हो ... नीचे चलो ... " उसकी ललचाई आंखे मेरे अर्धनग्न शरीर में गड़ी जा रही थी। मुझ पर तो जैसे चुदाई का नशा सवार था। मैंने भीगे ब्लाऊज ठीक करने की कोशिश की ... पर वो शरीर से जैसे चिपक गया था।

"दीपू जरा मदद कर ... मेरा ब्लाऊज ठीक कर दे !"

दीपू मेरे पास बैठ गया और ब्लाऊज के बटन सामने से लगाने लगा ... उसकी अंगुलियाँ मेरे गुदाज स्तनों को बार बार छू कर जैसे आग लगा रही थी। उसके पजामे में उसका खड़ा लण्ड जैसे मुझे निमंत्रण दे रहा था।

"भाभी , बटन नहीं लग रहा है ... "

"ओह ... कोशिश तो कर ना ... "

वह फिर मेरे ब्लाऊज के बहाने स्तनों को दबाने लगा ... जाने कब उसने मेरे ब्लाऊज को पूरा ही खोल दिया और चूंचियां सहलाने लगा। मेरी आंखे फिर से नशे में बंद हो गई। मेरा जिस्म तड़प उठा। उसने धीरे से मेरा हाथ लेकर अपने लण्ड पर रख दिया। मैंने लण्ड को थाम लिया और मेरी मुठ्ठी कसने लगी।

बरसात की फ़ुहारें तेज होने लगी। दीपू सिसक उठा। मैंने उसके भीगे बदन को देखा और जैसे मैं उस काम देवता को देख कर पिघलने लगी। चूत ने रस की दो बूंदें बाहर निकाल दी। चूंचियां का मर्दन वो बड़े प्यार से कर रहा था। मेरे चुचूक भी दो अंगुलियों के बीच में सिसकी भर रहे थे। मेरी चूत का दाना फ़ूलने लगा था। अचानक उसका हाथ मेरी चूत पर आ गया और दाने पर उसकी रगड़ लग गई।

मैं हाय करती हुई गीले बिस्तर पर लुढ़क गई। मेरे चेहरे पर सीधी बारिश की तेज बूंदे आ रही थी। गीला बिस्तर छप छप की आवाज करने लगा था।

"रीता भाभी ... आप का जिस्म कितना गरम है ... " उसकी सांसे तेज हो गई थी।

"दीपू ... आह , तू कितना अच्छा है रे ... " उसके हाथ मुझे गजब की गर्मी दे रहे थे।

"भाभी ... मुझे कुछ करने दो ... " उसका अनुनय विनय भरा स्वर सुनाई दिया।

" कर ले, सब कर ले मेरे दीपू ... कुछ क्यों ... आजा मेरे ऊपर आ जा ... हाय, मेरी जान निकाल दे ... "

मेरी बुदबुदाहट उसके कानो में जैसे अमृत बन कर कर उतर गई। वो जैसे आसमान बन कर मेरे ऊपर छा गया ... नीचे से धरती का बिस्तर मिल गया ... मेरा बदन उसके भार से दब गया ... मैं सिसकियाँ भरने लगी। कैसा मधुर अनुभव था यह ... तेज वर्षा की फ़ुहारों में मेरा यह पहला अनुभव ... मेरी चूत फ़ड़क उठी, चूत के दोनों लब पानी से भीगे हुये थे ... तिस पर चूत का गरम पानी ... बदन जैसे आग में पिघलता हुआ, तभी ... एक मूसलनुमा लौड़ा मेरी चूत में उतरता सा लगा। वो दीपू का मस्त लण्ड था जो मेरे चूत के लबों को चूमता हुआ ... अन्दर घुस गया था।

मेरी टांगे स्वतः ही फ़ैल गई ... चौड़ा गई ... लण्ड देवता का गीली चूत ने भव्य स्वागत किया, अपनी चूत के चिकने पानी से उसे नहला दिया। दीपू लाईन क्लीअर मान कर मेरे से लिपट पड़ा और चुम्मा चाटी करने लगा ... मैं अपनी आंखें बंद करके और अपना मुख खोल कर जोर जोर से सांस ले रही थी ... जैसे हांफ़ रही थी। मेरी चूंचियां दब उठी और लण्ड मेरी चूत की अंधेरी गहराईयों में अंधों की तरह घुसता चला गया। लगा कि जैसे मेरी चूत फ़ाड़ देगा। अन्दर शायद मेरी बच्चेदानी से टकरा गया। मुझे हल्का सा दर्द जैसा हुआ। दूसरे ही क्षण जैसे दूसरा मूसल घुस पड़ा ... मेरी तो जैसे हाय जान निकली जा रही थी ... सीत्कार पर सीत्कार निकली जा रही थी। मैं धमाधम चुदी जा रही थी ... दीपू को शायद बहुत दिनों के बाद कोई चूत मिली थी, सो वो पूरी तन्मयता से मन लगा कर मुझे चोद रहा था। बारिश की तेज बूंदें जैसे मेरी तन को और जहरीला बना रही थी।

दीपू मेरे तन पर फ़िसला जा रहा था। मेरा गीला बदन ... और उसका भीगा काम देवता सा मोहक रूप ... गीली चूत ... गीला लण्ड ... मैं मस्तानी हो कर लण्ड ले रही थी। मेरे
शरीर से अब जैसे शोले निकलने लगे थे ... मैंने उसके चूतड़ों को कस लिया और उसे कहा,"दीपू ... नीचे आ जाओ ... अब मुझे भी चोदने दो !"

Reply With Quote
  #20  
Old 3rd September 2013
neerathemall's Avatar
neerathemall neerathemall is offline
Custom title
 
Join Date: 29th October 2012
Posts: 5,053
Rep Power: 8 Points: 1645
neerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our communityneerathemall is a pillar of our community
"पर रीता भाभी, चुदोगी तो आप ही ना ... " दीपू वर्षा का आनन्द लेता हुआ बोला।
"अरे, चल ना, नीचे आ जा ... " मैं थोड़ा सा मचली तो वो धीरे से मुझे लिपटा कर पलट गया। अब मेरी बारी थी, मैंने चूत को लण्ड पर जोर दे कर दबाया। उसका मूसल नुमा लण्ड इस बार मेरी चूत की दीवारों पर रगड़ मारता हुआ सीधा जड़ तक आ गया। मेरे लटकते हुये स्तन उसके हाथ में मसले जा रहे थे। दीपू की एक अंगुली मेरे चूतड़ों की दरार में घुस पड़ी और छेद को बींधती हुई गाण्ड में उतर गई।

मैं उसके ऊपर लेट गई और अपनी चूत को धीरे धीरे ऊपर नीचे रगड़ कर चुदने लगी। बारिश की मोटी मोटी बूंदें मेरी पीठ पर गिर रही थी। मैंने अपना चेहरा उसकी गर्दन के पास घुसा लिया और आंखें बन्द करके चुदाई का मजा लेने लगी। हम दोनों जोर जोर से एक दूसरे की चूत और लण्ड घिस रहे थे ... मेरे आनन्द की सीमा टूटती जा रही थी। मेरा शरीर वासना भरी कसक से लहरा उठा था। मुझे लग रहा था कि मेरी रसीली चूत अब लपलपाने लगी थी। मेरी चूत में लहरें उठने लगी थी। फिर भी हम दोनों बुरी तरह से लिपटे हुये थे। मेरी चूत लण्ड पर पूरी तरह से जोर लगा रही थी ... बस ... कितना आनन्द लेती, मेरी चूत पानी छोड़ने लिये लहरा उठी और अन्ततः मेरी चूत ने पानी पानी छोड़ दिया ... और मैं झड़ने लगी। मैं दीपू पर अपना शरीर लहरा कर अपना रज निकाल रही थी।

मैं अब उससे अलग हो कर एक तरफ़ लुढ़क गई। दीपू उठ कर बैठ गया और अपने लण्ड को दबा कर मुठ मारने लगा ... एक दो मुठ में ही उसके लण्ड ने वीर्य छोड़ दिया और बरसात की मूसलाधार पानी के साथ मिल कहीं घुल गया। हम दोनों बैठे बैठे ही गले मिलने लगे ... मुझे अब पानी की बौछारों से ठण्ड लगने लगी थी। मैं उठ कर नीचे भागी। दीपू भी मेरे पीछे कपड़े ले कर नीचे आ गया।

मैं अपना भीगा बदन तौलिये से पोंछने लगी, पर दीपू मुझे छोड़ता भला। उसने गीले कपड़े एक तरफ़ रख दिये और भाग कर मेरे पीछे चिपक गया।

"भाभी मत पोंछो, गीली ही बहुत सेक्सी लग रही हो !"

"सुन रे दीपू, तूने अपनी भाभी को तो चोद ही दिया है , अब सो जा, मुझे भी सोने दे !"

Reply With Quote
Reply Free Video Chat with Indian Girls


Thread Tools Search this Thread
Search this Thread:

Advanced Search

Posting Rules
You may not post new threads
You may not post replies
You may not post attachments
You may not edit your posts

vB code is On
Smilies are On
[IMG] code is On
HTML code is Off
Forum Jump



All times are GMT +5.5. The time now is 07:54 PM.
Page generated in 0.01952 seconds