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  #651  
Old 29th October 2013
duttluka duttluka is offline
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  #652  
Old 6th November 2013
nishanath nishanath is offline
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सहारनपुर की मस्त भाभी
मेरे पास रात के 12 बजे एक फ़ोन आया, उस समय मैं सो रहा था, एकदम मेरी नींद खुली, मैंने अनजान नंबर देखा और कॉल पिक किया... उधर से कोई नहीं बोला... मेरे कई बार हेलो हेलो हेलो बोलने के बाद वहाँ से आवाज आई- हेलो !
और वो एक लड़की की और बहुत ही सेक्सी आवाज़ थी। उसने मुझे अपने बारे में बताया तो मुझे याद आया कि मैंने उससे मेल से बात की थी... उसका नाम था गीतांजलि, उसके पति कार दुर्घटना में एक साल पहले मर चुके थे और वो अकेली रहती थी...

उस रात उसने मुझे अपने बारे में बहुत कुछ बताया और मेरे बारे में पूछा। हमने सुबह के चार बजे तक बात की। पूरी रात हमने दोस्तों की तरह बात की, हमारे बीच में कोई भी सेक्स की बात नहीं हुई।
इस तरह हमने कुछ दिन तक ऐसा ही किया। फिर उसने मुझे सहारनपुर आने के लिए कहा, मैंने कार्यक्रम बनाया। मैं तब तक सहारनपुर की तरफ गया ही नहीं था। मैंने दो दिन बाद जाने का निश्चय किया।


मैं सहारनपुर पहुँचा तो उसने मुझे वहाँ एक पार्क में मिलने को बुलाया। मैं वहाँ गया... वहाँ एक बेंच पर एक लाल रंग का सूट पहने एक लड़की बैठी थी। मैंने उसे पीछे से देखा, वो जैसे ही मेरी तरफ मुड़ी, मैं देख कर हैरान रह गया क्योंकि वो तो बहुत ही ज्यादा सेक्सी थी और उसके उरोज बहुत ही बड़े थे जो उसके कमीज में से बाहर निकल पड़ रहे थे... वो किसी भी नज़र से विवाहिता नहीं लग रही थी।
वहाँ से हम उसके घर के लिए चल दिए। वो अपनी कार लाई थी, वो मुझे अपने घर ले गई...

वहाँ उसने पहले से ही सभी तैयारी कर रखी थी। घर जाते ही उसने मुझे ड्राईंगरूम में बिठाया और अन्दर गई और गुलाबी रंग की पारभासक नाइटी पहन कर आई। उसने नाइटी के नीचे उसी रंग की ब्रा और पैंटी पहनी हुई थी, क्या कयामत लग रही थी...

जब वो आ रही थी, उसके वक्ष के उभार हिल रहे थे और उसकी कमर में गजब की लचक थी, वो बिल्कुल शराब की बोतल लग रही थी।

सच में दोस्तो, मैं तो मदहोश हो गया... गजब का सौन्दर्य था उसका यार...

फिर वो फ्रीज़ में से बीयर की बोतलें लेकर आई और आकर मेरी गोद में बैठ गई और अपने होंठ मेरे होंठों से चिपका दिए...

क्या मीठे मीठे लब थे उसके... एक लम्बा चुम्बन !

हम दोनों एक दूसरे के होंठ चूस रहे थे, 15 मिनट तक करने के बाद हम बीयर का मजा लेने लगे। थोड़ी देर के बाद नशा चढ़ने लगा और उसने धीरे से अपना हाथ मेरे लंड पर रख दिया और उसे दबाने लगी। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, मेरे ऊपर तो बीयर और उसके हुस्न का नशा चढ़ने लगा था, मैंने फ़िर से उसके लबों को अपने लबों में दबा लिया और चूसने लगा। मेरे हाथ उसके वक्ष पर थे... क्या नर्म गर्म मस्त स्तन थे उसके !

उसने जिप खोल कर मेरा लंड बाहर निकाल लिया और उसके साथ खेलने लगी। मैंने उसकी नाइटी को उतार दिया ! क्या गजब की कयामत लग रही थी वो... वो इतनी गर्म हो चुकी थी कि लोहा भी पिघल जाये... और मैं तो हुस्न का पुजारी हूँ ! मजा आ गया... फिर मैंने उसके पूरे बदन को चूमा... वो तो पागल ही हुए जा रही थी।

फिर मैंने उसकी ब्रा और पैंटी उतार दी, उसके विशाल स्तन और काले कुचाग्र कयामत ढा रहे थे... धीरे धीरे मैं चूमते हुए उसकी चूत तक पहुँचा... एकदम क्लीन शेव चूत थी उसकी... मैंने उसकी चूत को चूमा और उसके योनि-लबों को अपने होंठों में दबा लिया। क्या नमकीन सा स्वाद था...

थोड़ी देर उसकी चूत चाटने के बाद वो झर गई और उसका सारा पानी मैं चाट गया...

फ़िर वो उठी और मेरा लंड मुँह में लेकर पागलों की तरह चूसने लगी। वो ऐसे चूस रही थी कि जैसे कितने सालों की प्यासी हो...

हम दोनों 69 की अवस्था में थे और मजा ले रहे थे जवानी का...

यह करते हुए दोनों के मुँह से आह ! ऊह ! उफ़्फ़ ! जैसी सेक्सी आवाजें निकल रही थी ...बहुत देर तक हमने एक दूसरे के यौनांगों को चाटा-चूसा। उसके बाद मैंने अपना चिपचिपा जीवन जल उसके मुँह में ही छोड़ दिया... वो बड़े मजे से उसे पी गई। फिर मैंने उठ कर उसकी चूत में दो उंगलिया घुसा दी, वो एकदम चिल्ला उठी, उसकी चूत बहुत कसी थी, मैं धीरे धीरे उसकी चूत को उंगली से चोदने लगा... पूरे कमरे में उसकी सेक्सी आवाजें गूंज रही थी- आउह... अह...उम्म... वो बोलने लगी- अब बर्दाश्त नहीं होता, घुसा दो इसमें जल्दी से ! यह एक साल से प्यासी है... आज इसको फाड़ दो... बुझा दो इसकी प्यास...

मैंने उसकी टांगों को अपनों कंधो पर रख उसकी चूत में अपना लंड घुसेड़ दिया... जैसे ही मैंने एक झटका मारा, उसकी आँखों से आँसू निकल गए लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

फिर थोड़ी देर रुक कर मैंने झटका मारा और पूरा लंड उसकी चूत में उतर गया, उसने अपने टाँगें मेरी कमर पर लपेट ली जैसे एक नागिन चंदन के पेड़ पर खुद को लपेट लेती है और अपने कूल्हे उछाल उछाल कर मेरा साथ देने लगी और सेक्सी आवाजें निकालने लगी... वो चिल्ला रही थी- आज फाड़ दो इसे ! खूब चोदो मेरे राजा... और जोर से और जोर से...

बहुत ही मजा आ रहा था उस समय... करीब बीस मिनट बाद मैंने अपना सारा वीर्य उसकी चूत में डाल दिया... इस बीच वो 2-3 बार झर चुकी थी...

थोड़ी देर तक हम एक दूसरे से लिपटे रहे, फिर वो उठी और फ्रेश होने क लिए बाथरूम की तरफ चल दी। मैंने उसे पकड़ा और अपनी बाहों में उठा लिया और बाथरूम ले गया... वहाँ जाते ही मैं उसे फ़व्वारे के नीचे लिटा दिया और उसके ऊपर चढ़ गया।

अब मेरा मूड उसकी गांड मारने का था। वो मना करने लगी लेकिन थोड़ी देर बाद वो मान गई, मैंने उसे घोड़ी बनाया और खूब सारा साबुन उसकी गांड में लगाया, लंड उसकी गांड पर टिका दिया और धीरे धीरे उसकी गांड में घुसाने लगा।

वो मजा ले रही थी लेकिन चिल्ला भी रही थी...

थोड़ी ही देर में लंड उसकी गांड में था। मैंने उसके चुच्चे दबा दबा कर उसकी गांड मारी, बहुत मजा आया... उसकी गांड मारने में तो उसकी चूत से भी ज्यादा मजा आया... बहुत ही तंग थी उसकी गांड... बहुत देर तक चोदने के बाद मैंने पूरा वीर्य उसकी गांड में छोड़ दिया...

वो बहुत ही ज्यादा खुश थी... बहुत दिनों बाद उसे दोनों तरफ से चुदाई करवाने का मौका जो मिला था... पूरी रात में हमने 3-4 बार चुदाई की... बहुत मजा आया दोस्तो... और सुबह मैं उसके घर से निकल गया...

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  #653  
Old 6th November 2013
nishanath nishanath is offline
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दोस्त की गर्लफ्रेंड की चुदाई

वैसे तो मैं बिहार का रहने वाला हूँ पर चार साल से मैं अपने एक दोस्त के साथ दिल्ली में रह रहा हूँ। मैं यहाँ की एक आईटी कंपनी में काम करता हूँ।

करीब चार महीने पहले की बात है जब मैंने जॉब छोड़ रखी थी और अपने रूम पर ही रहता था। मेरे दोस्त ने एक गर्लफ्रेंड बनाई थी जो हमारे मोहल्ले में ही रहती थी। वो अक्सर उससे मिलने के लिए रूम पर आती थी। हम साथ में बैठकर ड्रिंक भी करते थे और हंसी मजाक होती रहती थी। उसकी गर्लफ्रेंड का नाम पूजा था और वो देखने में बहुत सेक्सी थी। उसका कद 5 फ़ुट 5 इंच था और चुच्चे तो कमाल के थे।

मुझे कई बार उस पर शक होता था कि वो एक नंबर की चुदक्कड़ है। और वो थी भी एक नंबर की रण्डी ! उसका पहले से ही एक आशिक था जो उसके होम टाऊन का था पर वो नौकरी करने लिए दिल्ली में रहती थी। करीब एक हफ्ते तक वो रोज आती रही, मेरा दोस्त उसे चोदता रहा। अब मेरा भी लंड उसको देखकर खड़ा होने लगता था। मैंने सोच लिया कि अब इसकी बूर तो चोदनी ही है किसी भी हाल में।

इसलिए वो जब भी आती मैं उसे मजाक मजाक में छूता रहता था। कभी कभी तो मैं उसके चुच्चों पर भी हाथ लगा देता था पर वो सिर्फ मुस्कराकर चली जाती थी। मैं समझने लगा था कि अब इसकी बूर के दर्शन जल्दी ही होने वाले हैं।

इधर मेरा दोस्त अपनी काम की वजह से व्यस्त रहने लगा था और उससे मिल नहीं पा रहा था और ज्यादा बात भी नहीं कर पाता था। वो मुझे कॉल करने लगी और हमारी काफी देर देर तक बाते होने लगी। मै उससे हमेशा फ्लर्ट करता रहता था कॉल पर।

एक दिन मेरा दोस्त ऑफिस गया था तो मैंने उससे मिलने के लिए बुलाया। पहले तो उसने बहुत नखरे दिखाए पर फिर उसने बोला कि तुम कुछ करोगे तो नहीं?

तो मैंने कहा- मैं जबरदस्ती कभी नहीं करता किसी के साथ !

तो मान गई और मेरे कमरे पर आ गई। मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया और उसे अन्दर के कमरे में ले गया। मैं अपने बिस्तर पर बैठ गया और वो कुर्सी पर। फिर मैं उसे छेड़ने लगा तो मुझे थप्पड़ दिखाती हुई मेरी तरफ बढ़ी तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और अपनी गोद में बिठा लिया। वो बैठते ही मेरे सीने से लग गई और मैं अपना हाथ उसकी पीठ पर फ़िराने लगा तो वो जोश में आने लगी।

मैं उसे अपने सामने करते हुए उसके होठों को चूसने लगा और पूरी तरह मेरा साथ देना लगी। साली बहुत बड़ी रांड जो थी।

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  #654  
Old 6th November 2013
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मैंने मौका न गवांते हुए तुरंत उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसके चुच्चे टॉप के ऊपर से ही दबाने लगा। उसकी मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगी थी और मजे लेने लगी थी। पहली बार था जब कोई लड़की इतनी आसानी से मान गई थी।

मैंने उसकी टॉप उतार कर अलग रख दी और उसकी पैंट भी तुरंत उतार दी। अब वो मेरे सामने नीले रंग की पैन्टी और ब्रा में थी। मैं भी तुरंत अपने अंडरवीअर के अलावा सारे कपड़े उतार कर उसके ऊपर चढ़ गया और उसके चचों को जोर जोर से दबाने लगा।

वो सिसकारियाँ भरती रही और मजे लेती रही।

अब मेरा लंड उसकी चूत में जाने के लिए उतावला हो रहा था। मैंने जल्दी जल्दी अपने और उसके सारे कपड़े उतार कर उसको नंगा कर दिया। क्या सेक्सी माल लग रही थी, मैं आपको बता नहीं सकता। मै उसकी दोनों चूचियों को चूसता रहा और अपनी उंगली उसकी चूत में पेल दी तो वो कराह उठी तो मैंने तुरंत अपना मुँह उसकी चूचियों से हटा कर उसके होठों पर रख दिया और चूसने लगा। अब हम दोनों पूरी तरह गर्म हो चुके थे। मै ऊपर की तरफ बढ़ा और अपना लंड उसकी मुँह में पेल दिया। वो लॉलीपोप की तरह मेरे लंड को चूसने लगी और मुझे बहुत मजा आ रहा था।

मैं फिर नीचे की तरफ बढ़ा और उसकी दोनों टांगों को फैलाकर अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ने लगा और वो सिसकारती रही, उह आह उह आह की आवाज़ें निकालती रही।

फिर मैंने आव देखा न ताव अपना लंड उसकी चूत पर रखकर जोर से धक्का मारा तो मेरा आधा लंड उसकी चूत को फाड़ता हुआ उसकी बूर में घुस गया। वो जोर से चीख पड़ी तो मैं रुक गया और उसके होठों को चूमने लगा।

धीरे धीरे वो सामान्य होने लगी और उसकी चूत गीली होने लगी तो मैंने फिर एक धक्का मारा तो मेरा पूरा लंड उसकी चूत में घुस गया और उसके मुँह से आवाज़ निकली- आह उई आह अह अहए।

मैं फिर धीरे धीरे उसकी चूत में अपना लंड अन्दर बाहर करने लगा। उसे अब बहुत मजे आ रहे थे और अब बोलने लगी- और चोदो मुझे और चोदो विक्रम ! आज मेरी चूत फ़ाड़ दो।

मैं और जोश में आकर उसे आधा घण्टे तक चोदता रहा फिर हम दोनों झड़ गए और एक दूसरे से लिपट कर लेटे रहे। उस दिन मैंने उसकी चूत तीन बार मारी। फिर वो मुझे अक्सर रात को अपने कमरे पर बुलाती रही और मैं एक महीने तक उसे लगभग हर रात को चोदता था।

फिर मेरी भी जॉब लग गई और हम दोनों अपने काम में व्यस्त हो गए।

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  #655  
Old 6th November 2013
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दिल का क्*या कुसूर 1



उस दिन मेरी शादी की 11वीं सालगिरह थी। संजय ने मुझे बड़ा सरप्राइज देने का वादा किया था। मैं बहुत उत्*सुक थी। कई बार संजय से पूछ भी चुकी थी कि वो मुझे क्*या सरप्राइज देने वाले हैं? पर वो भी तो पूरे जिद्दी थे। मेरी हर कोशिश बेकार हो रही थी।

संजय ने बोल दिया था कि इस बार सालगिरह घर में ही मनायेंगे किसी बाहर के मेहमान को नहीं बुलायेंगे बस हम दोनों और हमारे दो बच्*चे।

मैं ब्*यूटी पार्लर से फेशियल करवाकर बच्*चों के आने से पहले घर पहुँच गई। हम मध्*यम वर्गीय परिवारों की यही जिन्*दगी होती है।

मैंने शाम होने से पहले ही संजय के आदेशानुसार उनका मनपसंद खाना बनाकर रख दिया। बच्*चे कालोनी के पार्क में खेलने के लिये चले गये। मैं खाली वक्*त में अपनी शादी के एलबम उठाकर बीते खुशनुमा पलों को याद करने लगी। तभी दरवाजे पर घण्टी बजी और मेरी तंद्रा भंग हुई।

मैं उठकर दरवाजा खोलने गई तो संजय दरवाजे पर थे। वो जैसे ही अन्*दर दाखिल हुए, मैंने पूछा- आज छुट्टी जल्*दी हो गई क्*या?

और मुड़कर संजय की तरफ देखा। पर यह क्*या? संजय तो दरवाजे पर ही रुके खड़े थे।

मैंने पूछा- अन्*दर नहीं आओगे क्*या?

वो बोले- आऊँगा ना, पर पहले तुम एक रुमाल लेकर मेरे पास आओ दरवाजे पर।

मेरे मना करने पर वो गुस्*सा करने लगे। आखिर में हारना तो मुझे ही था, मैं रुमाल लेकर दरवाजे पर पहुँची।

पर यह क्*या उन्*होंने तो रुमाल मेरे हाथ से लेकर मेरी आँखों पर बांध दिया, मुझे घर के अन्*दर धकेलते हुए बोले- अन्दर चलो।

अब मुझे गुस्*सा आया- "मैं तो अन्*दर ही थी, आप ही ने बाहर बुलाया और आँखें बंद करके घर में ले जा रहे हो... आज क्*या इरादा है? मैंने कहा।"

"हा..हा..हा..हा.." हंसते हुए संजय बोले 11 साल हो गये शादी को पर अभी तक तुमको मुझे पर यकीन नहीं है। वो मुझे धकेल कर अन्*दर ले गये और बैडरूम में ले जाकर बंद कर दिया। मैं बहुत विस्मित सी थी कि पता नहीं इनको क्*या हो गया है? आज ऐसी हरकत क्*यों कर रहे हैं? क्*योंकि स्*वभाव से संजय बहुत ही सीधे सादे व्*यक्ति हैं।

अभी मैं यह विचार कर ही रही थी कि संजय दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल हुए और आते ही मेरी आँखों की पट्टी खोल दी।

मैंने पूछा, "यह क्*या कर रहे हो आज?"

संजय ने जवाब दिया, "तुम्*हारे लिये सरप्राइज गिफ्ट लाया था यार, वो ही दिखाने ले जा रहा हूँ तुमको !"

सुनकर मैं बहुत खुश हो गई, "कहाँ है....?" बोलती हुई मैं कमरे से बाहर निकली तो देखा ड्राइंग रूम में एक नई मेज और उस पर नया कम्*प्*यूटर रखा था। कम्*प्*यूटर देखकर मैं बहुत खुश हो गई क्*योंकि एक तो आज के जमाने में यह बच्*चों की जरूरत थी। दूसरा मैंने कभी अपने जीवन में कम्*प्*यूटर को इतने पास से नहीं देखा था। मेरा मायका तो गाँव में था, पढ़ाई भी वहीं के सरकारी स्*कूल में हुई थी... और शादी के बाद शहर में आने के बाद भी घर से बाहर कभी ऐसा निकलना ही नहीं हुआ। हाँ, कभी कभार पड़ोस में रहने वाली मिन्*नी को जरूर कम्*प्*यूटर पर काम करते या पिक्*चर देखते हुए देखा था।

पर संजय के लिये इसमें कुछ भी नया नहीं था, वो पिछले 15 साल से अपने आफिस में कम्*प्*यूटर पर ही काम करते थे। मुझे कई बार बोल चुके थे कि तुम कम्*प्*यूटर चलाना सीख लो पर मैं ही शायद लापरवाह थी। परन्*तु आज घर में कम्*प्*यूटर देखकर मैं बहुत खुश थी। मैंने संजय से कहा- इसको चलाकर दिखाओ।

उन्*होंने कहा- रूको मेरी जान, अभी इसको सैट कर दूँ, फिर चला कर दिखाता हूँ।

तभी बच्*चे भी खेलकर आ गये और भूख-भूख चिल्*लाने लगे। मैं तुरन्*त रसोई में गई। तभी दोनों बच्*चों का निगाह कम्*प्*यूटर पर पड़ी। दोनों खुशी से कूद पड़े, और संजय से कम्*प्*यूटर चलाने के जिद करने लगे। संजय ने बच्चों को कम्प्यूटर चला कर समझया और समय ऐसे ही हंसी-खुशी बीत गया। कब रात हो गई पता ही नहीं चला।

मैं दोनों बच्*चों को उनके कमरे में सुलाकर नहाने चली गई। संजय कम्*प्*यूटर पर ही थे।

मैं नहाकर संजय का लाया हुआ सैक्*सी सा नाइट सूट पहन कर बाहर आई क्*योंकि मुझे आज रात को संजय के साथ शादी की सालगिरह जो मनानी थी, पर संजय कम्*प्*यूटर पर व्*यस्*त थे। मुझे देखते ही खींचकर अपनी गोदी में बैठा लिया, मेरे बालों में से शैम्*पू की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी, संजय उसको सूंघने लगे।

उनका एक साथ कम्*प्*यूटर के माऊस पर और दूसरा मेरे गीले बदन पर घूम रहा था। मुझे उनका हर तरह हाथ फिराना बहुत अच्*छा लगता था। पर आज मेरा ध्*यान कम्*प्*यूटर की तरफ ज्*यादा था क्*योंकि वो मेरे लिये एक सपने जैसा था।

संजय ने कहा, "तुम चला कर देखो कम्*प्*यूटर !"

"पर मुझे तो कम्*प्*यूटर का 'क' भी नहीं आता मैं कैसे चलाऊँ?" मैंने पूछा।

संजय ने कहा, "चलो तुमको एक मस्*त चीज दिखाता हूँ।" उनका बांया हाथ मेरी चिकनी जांघों पर चल रहा था। मुझे मीठी मीठी गुदगुदी हो रही थी। मैं उसका मजा ले रही थी कि मेरी निगाह कम्*प्*यूटर की स्*क्रीन पर पड़ी। एक बहुत सुन्*दर दुबली पतली लड़की बाथटब में नंगी नहा रही थी। लड़की की उम्र देखने में कोई 20 के आसपास लग रही थी। उसका गोरी चिट्टा बदन माहौल में गर्मी पैदा कर रहा था।

साथ ही संजय मेरी जांघ पर गुदगुदी कर रहे थे।

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  #656  
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दिल का क्*या कुसूर 2



तभी उस स्*क्रीन वाली लड़की के सामने एक लम्*बा चौड़ा कोई 6 फुट का आदमी आकर खड़ा हुआ...

आदमी का लिंग पूरी तरह से उत्*तेजित दिखाई दे रहा था। लड़की ने हाथ बढ़ा का वो मोटा उत्*तेजित लिंग पकड़ लिया...

वो अपने मुलायम मुलायम हाथों से उसकी ऊपरी त्*वचा को आगे पीछे करने लगी।

मैं अक्*सर यह सोचकर हैरान हो जाती कि इन फिल्*मों में काम करने वाले पुरुषों का लिंग इतना मोटा और बड़ा कैसे होता है और वो 15-20 मिनट तक लगातार मैथुन कैसे करते रह सकते हैं।

मैं उस दृश्*य को लगातार निहार रही थी....

उस लड़की की उंगलियाँ पूरी तरह से तने हुए लिंग पर बहुत प्*यार से चल रही थी....

आह....

तभी मुझे अहसास हुआ कि मैं तो अपने पति की गोदी में बैठी हूँ ! उन्*होंने मेरा बांया स्*तन को बहुत जोर से दबाया जिसका परिणाम मेरे मुख से निकलने वाली 'आह....' थी।

संजय मेरे नाइट सूट के आगे के बटन खोल चुके थे.... उनकी उंगलियाँ लगातार मेरे दोनों उभारों के उतार-चढ़ाव का अध्*ययन करने में लगी हुई थी। मैंने पीछे मुड़कर संजय की तरफ देखा तो पाया कि उसके दोनों हाथ मेरे स्*तनों से जरूर खेल रहे थे परन्*तु उनकी निगाह भी सामने चल रहे कम्*प्*यूटर की स्*क्रीन पर ही थी।

संजय की निगाह का पीछा करते हुए मेरी निगाह भी फिर से उसी स्*क्रीन की तरफ चली गई। वो खूबसूरत लड़की बाथटब से बाहर निकलकर टब के किनारे पर बैठी थी। पर ये क्*या.... अब वो मोटा लिंग उस लड़की के मुँह के अन्*दर जा चुका था, वो बहुत प्*यार से अपने होठों को आगे-पीछे सरकाकर उस आदमी के लिंग को लॉलीपाप की तरह बहुत प्*यार से चूस रही थी।

मैंने महसूस किया कि नीचे मेरे नितम्*बों में भी संजय का लिंग घुसने को तैयार था। वो पूरी तरह से उत्*तेजित था।

मैं खड़ी होकर संजय की तरफ घूम गई, संजय ने उठकर लाइट बंद कर दी और मेरा नाइट सूट उतार दिया।

वैसे भी उस माहौल में बदन पर कपड़ों की जरूरत महसूस नहीं हो रही थी। मैंने कम्*प्*यूटर की स्*क्रीन की रोशनी में देखा संजय भी अपने कपड़े उतार चुके थे। उनका लिंग पूरा तना हुआ था। उन्*होंने मुझे पकड़ कर वहीं पड़े हुए सोफे पर लिटा दिया... वो बराबर में बैठकर मेरा स्*तनपान कर रहे थे, मैं लगातार कम्*प्*यूटर पर चलने वाले चलचित्र को देख रही थी... और वही उत्*तेजना अपने अन्*दर महसूस भी कर रही थी।

बाथटब पर बैठी हुई लड़की की दोनों टांगें खुल चुकी थी और वो आदमी उस लड़की की दोनों टांगों के बीच में बैठकर उस लड़की की योनि चाटने लगा। मुझे यह दृश्*य, या यूँ कहूँ कि यह क्रिया बहुत पसन्*द थी, पर संजय को नहीं। हालांकि संजय ने कभी कहा नहीं पर संजय से कभी ऐसा किया भी नहीं। इसीलिये मुझे ऐसा लगा कि शायद संजय को यह सब पसन्*द नहीं है।

वैसे तो संजय से मेरा रोज ही सोने से पहले एकाकार होता था। परन्*तु वो पति-पत्नी वाला सम्भोग ही होता था, जो हमारे रोजमर्रा के कामकाज का ही एक हिस्*सा था, उसमें कुछ भी नयापन नहीं था।

पर जब उत्*तेजना होती थी... अब वो भी अच्*छा लगता था।

अब तक संजय ने मेरी दोनों टांगें फैला ली थी परन्*तु मेरी निगाह कम्*प्*यूटर की स्*क्रीन से हट ही नहीं रही थी। इधर संजय का लिंग मेरी योनि में प्रवेश कर गया... तो मुझे... आह.... अहसास हुआ कि... मैं कितनी उत्*तेजित हूँ....

संजय मेरे ऊपर आकर लगातार धक्*के लगा रहे थे...

अब मेरा ध्*यान कम्*प्*यूटर की स्*क्रीन से हट चुका था.... और मैं अपनी कामक्रीड़ा में मग्*न हो गई थी....

तभी संजय के मुँह से 'आह....' निेकली और वो मेरे ऊपर ही ढेर हो गये।

दो मिनट ऐसे ही पड़े रहने के बाद वो संजय ने मेरे ऊपर से उठकर अपना लिंग मेरी योनि से बाहर निकाला और बाथरूम में जाकर धोने लगे।

तब तक भी उस स्*क्रीन पर वो लड़की उस आदमी से अपनी योनि चटवा रही थी 'उफ़्फ़... हम्मंह...' की आवाज लगातार उस लड़की के मुँह से निकल रही थी वो जोर जोर से कूद कूद कर अपनी योनि उस आदमी के मुँह में डालने का प्रयास कर रही थी। तभी संजय आये और उन्*होंने कम्*प्*यूटर बंद कर दिया।

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दिल का क्*या कुसूर 3



संजय मेरे ऊपर आकर लगातार धक्*के लगा रहे थे...

अब मेरा ध्*यान कम्*प्*यूटर की स्*क्रीन से हट चुका था... और मैं अपनी कामक्रीड़ा में मग्*न हो गई थी...

तभी संजय के मुँह से 'आह....' निेकली और वो मेरे ऊपर ही ढेर हो गये।

दो मिनट ऐसे ही पड़े रहने के बाद वो संजय ने मेरे ऊपर से उठकर अपना लिंग मेरी योनि से बाहर निकाला और बाथरूम में जाकर धोने लगे।

तब तक भी उस स्*क्रीन पर वो लड़की उस आदमी से अपनी योनि चटवा रही थी 'उफ़्फ़... हम्मंह...' की आवाज लगातार उस लड़की के मुँह से निकल रही थी वो जोर जोर से कूद कूद कर अपनी योनि उस आदमी के मुँह में डालने का प्रयास कर रही थी।

तभी संजय आये और उन्*होंने कम्*प्*यूटर बंद कर दिया।

मैंने बोला, "चलने दो थोड़ी देर?"

संजय ने कहा, "कल सुबह ऑफिस जाना है बाबू... सो जाते हैं, नहीं तो लेट हो जाऊँगा।"

अब यह कहने कि हिम्*मत तो मुझमें भी नहीं थी कि ‘आफिस तो तुमको जाना है ना तो मुझे देखने दो।’ मैं एक अच्*छी आदर्शवादी पत्नी की तरह आज्ञा का पालन करने के लिये उठी, बाथरूम में जाकर रगड़-रगड़ कर अपनी योनि को धोया, बाहर आकर अपना नाइट सूट पहना और बैडरूम में जाकर बिस्*तर पर लेट गई।

मैंने थोड़ी देर बाद संजय की तरफ मुड़कर देखा वो बहुत गहरी नींद में सो रहे थे। उत्*सुकतावश मेरी निगाह नीचे उसके लिंग की तरफ गई तो पाया कि शायद वो भी नाइट सूट के पजामे के अन्*दर शान्*ति से सो रहा था क्*योंकि वहाँ कोई हलचल नहीं थी। मेरी आँखों के सामने अभी भी वही फिल्*म घूम रही थी। शादी के बाद पिछले 11 सालों में केवल 3 बार संजय के साथ मैंने ऐसी फिल्*म देखी, पता नहीं ऐसा मेरे साथ ही था, या सभी के साथ होता होगा पर उस फिल्*म को देखकर मुझे अपने अन्*दर अति उत्*तेजना महसूस हो रही थी।

हालांकि थोड़ी देर पहले संजय के साथ किये गये सैक्*स ने मुझे स्खलित कर दिया था। पर फिर भी शरीर में कहीं कुछ अधूरापन महसूस हो रहा था मुझे पता था यह हर बार की तरह इस बार भी दो-तीन दिन ही रहेगा पर फिर भी अधूरापन तो था ही ना....

वैसे तो जिस दिन से मेरी शादी हुई थी उस दिन से लेकर आज तक मासिक के दिनों के अलावा कुछ गिने-चुने दिनों को छोड़कर हम लोग शायद रोज ही सैक्*स करते थे यह हमारे दैनिक जीवन का हिस्*सा बन चुका था। पर चूंकि संजय ने कभी मेरी योनि को प्*यार नहीं किया तो मैं भी एक शर्मीली नारी बनी रही, मैंने भी कभी संजय के लिंग को प्*यार नहीं किया। मुझे लगता था कि अपनी तरफ से ऐसी पहल करने पर संजय मुझे चरित्रहीन ना समझ लें।

सच तो यह है कि पिछले 11 सालों में मैंने संजय का लिंग हजारों बार अपने अंदर लिया था पर आज तक मैं उसका सही रंग भी नहीं जानती थी... क्*योंकि सैक्*स करते समय संजय हमेशा लाइट बंद कर देते थे और मेरे ऊपर आ जाते थे। मैंने तो कभी रोशनी में आज तक संजय को नंगा भी नहीं देखा था। मुझे लगता है कि हम भारतीय नारियों में से अधिकतर ऐसी ही जिन्*दगी जीती हैं... और अपने इसी जीवन से सन्*तुष्*ट भी हैं। परन्*तु कभी कभी इक्*का-दुक्*का बार जब कभी ऐसा कोई दृश्*य आ सामने जाता है जैसे आज मेरे सामने कम्*प्*यूटर स्*क्रीन पर आ गया था तो जीवन में कुछ अधूरापन सा लगने लगता है जिसको सहज करने में 2-3 दिन लग ही जाते हैं।

हम औरतें फिर से अपने घरेलू जीवन में खो जाती हैं और धीरे-धीरे सब कुछ सामान्*य हो जाता है। फिर भी हम अपने जीवन से सन्*तुष्*ट ही होती हैं। क्*योंकि हमारा पहला धर्म पति की सेवा करना और पति की इच्*छाओं को पूरा करना है। यदि हम पति को सन्*तुष्*ट नहीं कर पाती हैं तो शायद यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी कमी है।

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दिल का क्*या कुसूर 4


परन्*तु मैं संजय को उनकी इच्*छाओं के हिसाब से पूरी तरह से सन्*तुष्*ट करने का प्रयास करती थी। यही सब सोचते सोचते मैंने आँखें बंद करके सोने का प्रयास किया। सुबह बच्*चों को स्*कूल भी तो भेजना था और संजय से कम्*प्*यूटर चलाना भी सीखना था। परन्*तु जैसे ही मैंने आँखें बन्*द की मेरी आँखों के सामने फिर से वही कम्*प्*यूटर स्*क्रीन वाली लड़की और उसके मुँह में खेलता हुआ लिंग आ गया। मैं जितना उसको भूलने का प्रयास करती उतना ही वो मेरी नींद उड़ा देता।

मैं बहुत परेशान थी, आँखों में नींद का कोई नाम ही नहीं था। पूरे बदन में बहुत बेचैनी थी जब बहुत देर तक कोशिश करने पर भी मुझे नींद नहीं आई तो मैं उठकर बाथरूम में गई नाइट सूट उतारा और शावर चला दिया। पानी की बूंद बूंद मेरे बदन पर पड़ने का अहसास दिला रही थी। उस समय शावर आ पानी मुझे बहुत अच्*छा लग रहा था। का*फी देर तक मैं वहीं खड़ी भीगती रही और फिर शावर बन्*द करके बिना बदन से पानी पोंछे ही गीले बदन पर ही नाइट सूट पहन कर जाकर बिस्*तर में लेट गई।

इस बार बिस्*तर में लेटते ही मुझे नींद आ गई।

सुबह 6 बजे रोज की तरह मेरे मोबाइल में अलार्म बजा। मैं उठी और बच्*चों को जगाकर हमेशा की तरह समय पर तैयार करके स्*कूल भेज दिया। अब बारी संजय को जगाने की थी। संजय से आज कम्*प्*यूटर चलाना भी तो सीखना था ना। मैं चाहती थी कि संजय मुझे वो फिल्*म चलाना सिखा दें ताकि संजय के जाने के बाद मैं आराम से बैठकर उस फिल्*म का लुत्*फ उठा सकूँ। पर संजय से कैसे कहूँ से समझ नहीं आ रहा था।

खैर, मैंने संजय को जगाया और सुबह की चाय की प्याली उनके हाथ में रख दी। वो चाय पीकर टॉयलेट चले गये और मैं सोचने लगी कि संजय से कैसे कहूँ कि मुझे वो कम्प्यूटर में फिल्*म चलाना सिखा दें।

तभी मेरे दिमाग में एक आइडिया आया। मैं संजय के टॉयलेट से निकलने का इंतजार करने लगी। जैसे ही संजय टायलेट से बाहर आये मैंने अपनी योजना के अनुसार अपनी शादी वाली सी डी उनके हाथ में रख दी और कहा, "शादी के 11 साल बाद तो कम से कम अपने नये कम्*प्*यूटर में यह सी डी चला दो, मैं तुम्*हारे पीछे अपने बीते लम्*हे याद कर लूँगी।"

संजय एकदम मान गये और कम्*प्*यूटर की तरफ चल दिये।

मैंने कहा, "मुझे बताओ कि इसको कैसे ऑन और कैसे ऑफ करते हैं ताकि मैं सीख भी जाऊँ।"

संजय को इस पर कोई एतराज नहीं था। उन्*होंने मुझे यू.पी.एस. ऑन करने से लेकर कम्*प्*यूटर के बूट होने के बाद आइकन पर क्लिक करने तक सब कुछ बताया, और बोले, "ये चार सी डी मैं इस कम्*प्*यूटर में ही कापी कर देता हूँ ताकि तुम इनको आराम से देख सको नहीं तो तुमको एक एक सी डी बदलनी पड़ेगी।"

मैंने कहा, "ठीक है।"

संजय ने सभी चारों सी डी कम्*प्*यूटर में एक फोल्*डर बना कर कापी कर दी और फिर मुझे समझाने लगे कि कैसे मैं वो फोल्*डर खोल कर सी डी चला सकती हूँ।

मैं अपने हाथ से सब कुछ चलाना सीख रही थी। जैसे-जैसे संजय बता रहे थे 2-3 बार कोशिश करने पर मैं समझ गई कि फोल्*डर में जाकर कैसे उस फिल्*म को चलाया जा सकता है। पर मुझे यह नहीं पता था कि वो रात वाली फिल्*म कौन से फोल्*डर में है और वहाँ तक कैसे जायेंगे।

मैंने फिर संजय से पूछा, "कहीं इसको चलाने से गलती से वो रात वाली फिल्*म तो नहीं चल जायेगी।"

"अरे नहीं पगली ! वो तो अलग फोल्*डर में पड़ी है।" संजय ने कहा।

"पक्*का ना....?" मैंने फिर पूछा।

तब संजय ने कम्*प्*यूटर में वो फोल्*डर खोला जहाँ वो फिल्*म पड़ी थी और मुझसे कहा, "यह देखो ! यहाँ पड़ी है वो फिल्*म बस तुम दिन में यह फोल्*डर मत खोलना।"

मेरी तो जैसे लॉटरी लग गई थी। पर मैंने शान्*त स्*वभाव से बस, "हम्म...." जवाब दिया। मेरी निगाह उस फोल्*डर में गई तो देखा यहाँ तो बहुत सारी फाइल पड़ी थी। मैंने संजय से पूछा। तो उन्*हानें ने बताया, "ये सभी ब्*लू फिल्*में हैं। आराम से रोज रात को देखा करेंगे।"

"ओ...के...अब यह कम्*प्*यूटर बंद कैसे होगा...." मैंने पूछा क्*योंकि मेरे लायक काम तो हो ही चुका था।

संजय ने मुझे कम्*प्*यूटर शट डाउन करना भी सिखा दिया। मैं अब वहाँ से उठकर नहाने चली गई, और संजय भी आफिस के लिये तैयारी करने लगे। संजय को आफिस भेजने के बाद मैंने बहुत तेजी से अपने घर के सारे काम 1 घंटे में निपटा लिये। फ्री होकर बाहर का दरवाजा अन्*दर से लॉक किया। कम्*प्*यूटर को संजय द्वारा बताई गई विधि के अनुसार ऑन किया। थोड़े से प्रयास के बाद ही मैंने अपनी शादी की फिल्*म चला ली। कुछ देर तक वो देखने के बाद मैंने वो फिल्*म बन्*द की और अपने फ्लैट के सारे खिड़की दरवाजे चैक किये कि कोई खिड़की खुली हुई तो नहीं है। सबसे सन्*तुष्*ट होकर मैंने संजय का वो खास वाला फोल्*डर खोला और उसमें गिनना शुरू किया कुल मिलाकर 80 फाइल उसके अन्*दर पड़ी थी। मैंने बीच में से ही एक फाइल पर क्*लिक कर दिया। क्लिक करते ही एक मैसेज आया। उसको ओ.के. किया तो फिल्*म चालू हो गई। पहला दृश्*य देखकर ही मैं चौंक गई। यह कल रात वाली मूवी नहीं थी। इसमें दो लड़कियाँ एक दूसरे को बिल्*कुल नंगी लिपटी हुई थी।

यह देखकर तो एकदम जैसे मुझे सन्निपात हो गया !
ऐसा मैंने पतिदेव के मुँह से कई बार सुना तो था.... पर देखा तो कभी नहीं था। तभी मैंने देखा दोनों एक दूसरे से लिपटी हुई प्रणय क्रिया में लिप्*त थी।

एक लड़की नीचे लेटी हुई थी.... और दूसरी उसके बिल्*कुल ऊपर उल्*टी दिशा में। दोनों एक दूसरे की योनि का रसपान कर रही थी...

मैं आँखें गड़ाये काफी देर तक उन दोनों को इस क्रिया को देखती रही। स्*पीकर से लगातार आहहह... उहह... हम्मम... सीईईईई.... की आवाजें आ रही थी। मध्*यम मध्*यम संगीत की ध्*वनि माहौल को और अधिक मादक बना रही थी। मुझे भी अपने अन्दर कुछ कुछ उत्*तेजना महसूस होने लगी थी। परन्*तु संस्*कारों की शर्म कहूँ या खुद पर कन्*ट्रोल... पर मैंने उस उत्*तेजना को अभी तक अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। परन्*तु मेरी निगाहें उन दोनों लड़कियों की भावभंगिमा को अपने लगातार अंदर संजो रही थी।

अचानक ऊपर वाली लड़की ने पहलू बदला नीचे वाली नीचे आकर बैठ गई। उसने नीचे वाली लड़की की टांगों में अपनी टांगें फंसा ली !

"हम्म्मम...!" की आवाज के साथ नीचे वाली लड़की भी उसका साथ दे रही थी....आह.... दोनों लड़कियाँ आपस में एक दूसरे से अपनी योनि रगड़ रही थी।

ऊफ़्फ़....!! मेरी उत्*तेजना भी लगातार बढ़ने लगी। परन्*तु मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्*या करूँ? कैसे खुद को सन्*तुष्*ट करूँ? मुझे बहुत परेशानी होने लगी। वो दोनों लड़कियाँ लगातार योनि मर्दन कर रही थी। मुझे मेरी योनि में बहुत खुजली महसूस हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरी योनि के अन्*दर बहुत सारी चींटियों ने हमला कर दिया हो....योनि के अन्*दर का सारा खून चूस रही हों... मैंने महसूस किया कि मेरे चुचूक बहुत कड़े हो गये हैं। मुझे बहुत ज्*यादा गर्मी लगने लगी। शरीर से पसीना निकलने लगा।

मेरा मन हुआ कि अभी अपने कपड़े निकाल दूं। परन्*तु यह काम मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं किया था इसीलिये शायद हिम्*मत नहीं कर पा रही थी मेरी निगाहें उस स्*क्रीन हटने को तैयार नहीं थी। मेरे बदन की तपिश पर मेरा वश नहीं था। तापमान बहुत तेजी से बढ़ रहा था। जब मुझसे बर्दाश्*त नहीं हुआ। तो मैंने अपनी साड़ी निकाल दी। योनि के अन्*दर इतनी खुजली होने लगी। ऊईईईई....मन ऐसा हो रहा था कि चाकू लेकर पूरी योनि को अन्*दर से खुरच दूं।


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दिल का क्*या कुसूर 5



तभी स्*क्रीन पर कुछ परिवर्तन हुआ, पहली वाली लड़की अलग हुई, उसने पास रखी मेज की दराज खोलकर पता नहीं प्*लास्टिक या किसी और पदार्थ का बना लचीला कृत्रिम लिंग जैसा बड़ा सा सम्*भोग यन्*त्र निकाला और पास ही रखी क्रीम लगाकर उसको चिकना करने लगी।

"ओह...!" सम्भोग के लिए ऐसी चीज मैंने पहले कभी नहीं देखी थी... पर मुझे वो नकली लिंग बहुत ही अच्*छा लग रहा था। जब तक वो लड़की उसको चिकना कर रही थी तब तक मैं भी अपना ब्*लाउज और ब्रा उतार कर फेंक चुकी थी। मुझे पता था कि घर में इस समय मेरे अलावा कोई और नहीं है इसीलिये शायद मेरी शर्म भी कुछ कम होने लगी थी।

तभी मैंने देखा कि पहली लड़की से उस सम्*भोग यन्*त्र का अग्र भाग बहुत प्*यार से दूसरी लड़की की योनि में सरकाना शुरू कर दिया। आधे से कुछ कम परन्*तु वास्*तविक लिंग के अनुपात में कहीं अधिक वह सम्*भोग यन्*त्र पहली वाली लड़की के सम्*भोग द्वार में प्रवेश कर चुका था। मैंने इधर उधर झांककर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा... और खुद ही अपने बायें हाथ से अपनी योनि को दबा दिया। "आह...." मेरे मुँह से सीत्*कार निकली।

मेरी निगाह कम्*प्*यूटर की स्*क्रीन पर गई, 'उफफफफ...' मेरी तो हालत ही खराब होने लगी। पहली लड़की दूसरी लड़की के सम्*भोग द्वार में वो सम्*भोग यन्*त्र बहुत प्*यार से आगे पीछे सरका रही थी... दूसरी लड़की भी चूतड़ उछाल-उछाल कर अपने कामोन्*माद का परिचय दे रही थी, वह उस यन्*त्र को पूरा अपने अन्*दर लेने को आतुर थी। परन्*तु पहले वाले लड़की भी पूरी शरारती थी, अब वो भी दूसरी के ऊपर आ गई और उस यन्*त्र का दूसरी सिरा अपनी योनि में सरका लिया। "ऊफफफफफ...." क्*या नजारा था। दोनों एक दूसरे के साथ सम्*भोगरत थी। अब दोनों अपने अपने चूतड़ उचका उचका कर अपना अपना योगदान दे रही थी।

सीईईई....शायद कोई भी लड़की दूसरी से कम नहीं रहना चा*हती थी...

इधर मेरी योनि के अन्*दर कीड़े चलते महसूस हो रहे थे। मैंने मजबूर होकर अपना पेटीकोट और पैंटी भी अपने बदन से अलग कर दी। अब मैं अपनी स्*क्रीन के सामने आदमजात नंगी थी। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे जीवन में पहली बार मैं ऐसे नंगी हुई हूँ। पर मेरी वासना, मेरी शर्म पर हावी होने लगी थी। मुझे इस समय अपनी योनि में लगी कामाग्नि को ठण्*डा करने का कोई साधन चाहिए था बस....और कुछ नहीं....

काश... उन लड़कियों वाला सम्*भोग यन्*त्र मेरे पास भी होता तो मैं उसको अपनी योनि में सरकाकर जोर जोर से धक्*के मारती जब तक कि मेरी कामज्*वाला शान्*त नहीं हो जाती पर ऐसा कुछ नहीं हो सकता था। मैंने अपने दायें हाथ की दो उंगलियों से अपने भगोष्*ठ तेजी से रगड़ने शुरू कर दिए। मेरी मदनमणि अपनी उपस्थिति का अहसास कराती हुई कड़ी होने लगी। जीवन में पहली बार था कि मुझे ये सब करना पड़ रहा था। पर मैं परिस्थिति के हाथों मजबूर थी।

अब मेरे लिये कम्*प्*यूटर पर चलने वाली फिल्*म का कोई मायने नहीं रह गया, मुझे तो बस अपनी आग को ठण्*डा करना था। मुझे लग रहा था कि कहीं आज इस आग में मैं जल ही ना जाऊँ !

11 साल से संजय मेरे साथ सम्*भोग कर रहे थे... पर ऐसी आग मुझे कभी नहीं लगी थी... या यूँ कहूँ कि आग लगने से पहले ही संजय उसको बुझा देते थे। इसलिये मुझे कभी इसका एहसास ही नहीं हुआ। मैंने कम्*प्*यूटर बन्*द कर दिया और घर में पागलों की तरह ऐसा कुछ खोजने लगी जिसको अपनी योनि के अन्*दर डालकर योनि की खुजली खत्*म कर सकूँ। मन्दिर के किनारे पर एक पुरानी मोमबत्*ती मुझे दिखाई और तो मेरे लिये वही मेरा हथियार या कहिये कि मेरी मर्ज का इलाज बन गई।

मैं मोमबत्*ती को लेकर अपने बैडरूम में गई। मैंने देखा कि मेरे चुचूक बिल्*कुल कड़े और लाल हो चुके थे।

आह... कितना अच्*छा लग रहा था इस समय अपने ही निप्*पल को प्*यार सहलाना !

हम्म... मैंने अपने बिस्*तर पर लेटकर मोमबत्*ती का पीछे वाला हिस्*सा अपने दायें हाथ में पकड़ा और अपने बायें हाथ से योनि के दोनों मोटे भगोष्*ठों को अलग करके मोमबत्*ती का अगला धागे वाला हिस्*सा धीरे से अपनी योनि में सरकाना शुरू किया।

उई मांऽऽऽऽऽ... क्*या आनन्*द था।

मुझे यह असीम आनन्*द जीवन में पहली बार अनुभव हो रहा था। मैं उन आनन्*दमयी पलों का पूरा सुख भोगने लगी। मैंने मोमबत्*ती का पीछे की सिरा पकड़ कर पूरी मोमबत्*ती अपनी योनि में सरका दी थी.... आहह हह हह... अपने जीवन में इतना अधिक उत्*तेजित मैंने खुद को कभी भी महसूस नहीं किया था।

मैं कौन हूँ...? क्*या हूँ...? कहाँ हूँ...? कैसे हूँ...? ये सब बातें मैं भूल चुकी थी। बस याद था तो यह कि किसी तरह अपने बदन में लगी इस कामाग्नि को बुझाऊँ बस... हम्म अम्म... आहह... क्*या नैसर्गिक आनन्*द था।

बायें हाथ से एक एक मैं अपने दोनों निप्*पल को सहला रही थी.... आईई ई... एकदम स्*वर्गानुभव... और दायें हाथ में मोमबत्*ती मेरे लिये लिंग का काम कर रही थी।

मुझे पुरूष देह की आवश्*यकता महसूस होने लगी थी। काश: इस समय कोई पुरूष मेरे पास होता जो आकर मुझे निचोड़ देता.... मेरा रोम रोम आनन्दित कर देता.... मैं तो सच्*ची धन्*य ही हो जाती।

मेरा दायें हाथ अब खुद-ब-खुद तेजी से चलने लगा था। आहह हह... उफ़्फ़फ... उईई ई... की मिश्रित ध्*वनि मेरे कंठ से निकल रही थी। मैं नितम्*बों को ऊपर उठा-उठा कर दायें हाथ के साथ...ऽऽऽ... ताल...ऽऽऽ.... मिलाने....का....प्रयास...ऽऽऽऽ.... करने लगी।

थोड़े से संघर्ष के बाद ही मेरी धारा बह निकली, मुझे विजय का अहसास दिलाने लगी।

मैंने मोमबत्*ती योनि से बाहर निकाली, देखा पूरी मोमबत्*ती मेरे कामरस गीली हो चुकी थी। मोमबत्*ती को किनारे रखकर मैं वहीं बिस्*तर पर लेट गई। मुझे तो पता भी नहीं चला कब निद्रा रानी ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया।

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दिल का क्*या कुसूर 6



दरवाजे पर घंटी की आवाज से मेरी निद्रा भंग की। घंटी की आवाज के साथ मेरी आँख झटके से खुली। मैं नग्*नावस्*था में अपने बिस्*तर पर पड़ी थी। खुद को इस अवस्*था में देखकर मुझे बहुत लज्*जा महसूस हो रही थी। धीरे धीरे सुबह की पूरी घटना मेरे सामने फिल्*म की तरह चलने लगी। मैं खुद पर बहुत शर्मिन्*दा थी। दरवाजे पर घंटी लगातार बज रही थी। मैं समझ गई कि बच्*चे स्*कूल से आ गये हैं।

मैं सब कुछ भूल कर बिस्*तर से उठी, कपड़े पहनकर तेजी से दरवाजे की ओर भागी।

दरवाजा खोला तो बच्*चे मुझ पर चिल्*लाने लगे। मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। आज तो लंच भी नहीं बनाया अभी तक घर की सफाई भी नहीं की।

मैं बच्*चों के कपड़े बदलकर तेजी से रसोई में जाकर कुछ खाने के लिये बनाने लगी। घर में काम इतना ज्*यादा था कि सुबह वाली सारी बात मैं भूल चुकी थी।

शाम को संजय ने आते ही पूछा- आज शादी वाली सीडी देखी थी क्*या?

तो मैंने जवाब दिया, "हाँ, पर पूरी नहीं देख पाई।"

समय कैसे बीत रहा था पता ही नहीं चला। रात को बच्*चों को सुलाने के बाद मैं अपने बैडरूम में पहुँची तो संजय मेरा इंतजार कर रहे थे। वही रोज वाला खेल शुरू हुआ।

संजय ने मुझे दो-चार चुम्*बन किये और अपना लिंग मेरी योनि में डालकर धक्*के लगाने शुरू कर दिये। मैं भी आदर्श भारतीय पत्नी की तरह वो सब करवाकर दूसरी तरफ मुँह करके सोने का नाटक करने लगी। नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी। आज मैं संजय से कुछ बातें करना चाह रही थी पर शायद मेरी हिम्*मत नहीं थी, मेरी सभ्*यता और लज्*जा इसके आड़े आ रही थी। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

थोड़ी देर बाद मैंने संजय की तरफ मुँह किया तो पाया कि संजय सो चुके थे। मैं भी अब सोने की कोशिश करने लगी। पता नहीं कब मुझे नींद आई।

अगले दिन सुबह फिर से वही रोज वाली दिनचर्या शुरू हो गई। परन्*तु अब मेरी दिनचर्या में थोड़ा सा परिवर्तन आ चुका था। संजय के जाने के बाद मैं रोज कोई एक फिल्*म जरूर देखती... अपने हाथों से ही अपने निप्*पल और योनि को सहलाती निचोड़ती। धीरे धीरे मैं इसकी आदी हो गई थी। हाँ, अब मैं कम्*प्*यूटर भी अच्*छे से चलाना सीख गई थी।

एक दिन संजय ने मुझसे कहा कि मैं इंटरनैट चलाना सीख लूँ तो वो मुझे आई डी बना देंगे जिससे मैं चैट कर सकूँ और अपने नये नये दोस्*त बना सकूँगी। फिर भविष्*य में बच्*चों को भी कम्*प्*यूटर सीखने में आसानी होगी।

उन्*होंने मुझे पास के एक कम्*प्*यूटर इंस्*टीट्यूट में इंटरनैट की क्*लास चालू करा दी। आठ-दस दिन में ही मैंने गूगल पर बहुत सी चीजें सर्च करना और आई डी बनाना भी सीख लिया। मैंने जीमेल और फेसबुक पर में अपनी तीन-चार अलग अलग नाम से आई डी भी बना ली। एक महीने में तो मुझे फेक आई डी बनाकर मस्*त चैट करना भी आ गया।

परन्*तु मैंने अपनी सीमाओं का हमेशा ध्*यान रखा। अपनी पर्सनल आई डी के अलावा संजय को कुछ भी नहीं बताया। उसमें फ्रैन्*डस भी बस मेरी सहेलियाँ ही थीं। मैं उस आई डी को खोलती तो रोज थी पर ज्*यादा लोगों को नहीं जोड़ती थी। अपनी सभ्*यता हमेशा कायम रखने की कोशिश करती थी। इंटरनेट प्रयोग करते करते मुझे कम से कम इतना हो पता चल ही गया था कि फेक आई डी बना कर मस्*ती करने में कोई भी परेशानी नहीं है, बस कुछ खास बातों का ध्*यान रखना चाहिए। ऐसे ही चैट करते करते एक दिन मेरी आई डी पर अरूण की रिक्*वेस्*ट आई। मैंने उनका प्रोफाइल देखा कही भी कुछ गंदा नहीं था। बिल्*कुल साफ सुथरा प्रोफाइल। मैंने उनको एैड कर लिया।

2 दिन बाद जब मैं चैट कर रही थी। तो अरूण भी आनलाइन आये। बातचीत शुरू हुई। उन्*होंने बिना लाग-लपेट के बता दिया कि वो पुरूष हैं, शादीशुदा है और 38 साल के हैं। ज्*यादातर पुरूष अपने बारे में पूरी और सही जानकारी नहीं देते थे इसीलिये उनकी सच्*चाई जानकर अच्*छा लगा। मैंने भी उनको अपने बारे में नाम, पता छोड़कर सब कुछ सही सही बता दिया।

धीरे धीरे हमारी चैट रोज ही होने लगी। मुझे उनसे चैट करना अच्*छा लगता था। क्*योंकि एक तो वो कभी कोई व्*यक्तिगत बात नहीं पूछते... दूसरे वो कभी भी कोई गन्*दी चैट नहीं करते क्*योंकि वो भी विवाहित थे और मैं भी। तो हमारी सभी बातें भी धीरे-धीरे उसी दायरे में सिमटने लगी। मैंने उनको कैम पर देखने का आग्रह किया तो झट ने उन्*होंने ने भी मुझसे कैम पर आने को बोल दिया।

मैंने उनको पहले आने का अनुरोध किया तो वो मान गये, उन्*होंने अपना कैम ऑन किया। मैंने देखा उनकी आयु 35 के आसपास थी। मतलब वो मुझसे 2-3 साल ही बड़े थे। उनको कैम पर देखकर सन्*तुष्*ट होने के बाद मैंने भी अपना कैम ऑन कर दिया। वो मुझे देखते ही बोले, "तुम तो बिल्*कुल मेरे ही एज ग्रुप की हो। चलो अच्*छा है हमारी दोस्*ती अच्छी निभेगी।"

धीरे धीरे मेरी उनके अलावा लगभग सभी फालतू की चैट करने वालों से चैट बन्*द हो गई। हम दोनों निश्चित समय पर एक दूसरे के इंतजार करने लगे। वो कभी कभी हल्*का-फुल्*का सैक्*सी हंसी मजाक करते.... जो मुझे भी अच्*छा लगता। हाँ उन्*होंने कभी भी मेरा शोषण करने का प्रयास नहीं किया। अगर कभी किसी बात पर मैं नाराज भी हो जाती तो वो बहुत प्*यार से मुझे मनाते। हाँ वो कोई हीरो नहीं थे। परन्*तु एक सर्वगुण सम्*पन्*न पुरूष थे।

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