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Old 29th August 2012
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Post ढीला कैरेक्टर (कहानियाँ) **COMPLETED**

प्रिय पाठको
आप पढ़ रहे हैं सच्ची यौन घटनाओं पर आधारित कहानियाँ, कपोल कल्पित सेक्स कहानियाँ, प्रकाशित सभी सामग्री हमारे द्वारा भेजी ही जाती है। कथा-प्रेषकों से आग्रह है

अब हम प्रतिदिन ला रहे हैं आपके लिये और ज़्यादा मनोरंजन !

धन्यवाद !
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Old 29th August 2012
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Khan, Mohammed Parvez

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Old 29th August 2012
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Post फूलों की खेती UPDATE 1

फूलों की खेती



सुबह की स्वच्छ ताजी हवा में गुलाब के ताजा फूलों की खुशबू फैल रही थी। शहर के कोलाहल से दूर प्रदूषणमुक्त शांत वातावरण में फूलों की सुगंधभरी ताजी हवा में घूमते हुए मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। हर तरफ गुलाब फैले थे भाँति भाँति के- लाल, गुलाबी, काले, बैंगनी, उजले... !
मैं उनके कलेक्शन की मन हीमन तारीफ करता क्यारियों के बीच काँटों से सावधानी से बचता घूम रहा था। पुष्पा थोड़ी दूर पर बाड़ केपास फूल तोड़ रही थी।

पुष्पा के पिताजी का बड़ा सा फूलों का बाग था, शहर के नजदीक ही एक गाँव में। वे फूलों की खेती करते थे। मैं छुट्टियों में वहाँ घूमने आया था। पुष्पा ने मुझे बुलाया था, ''आकर कभी मेरा बाग देखो। बहुत अच्छा लगेगा।''
उसने गलत नहीं कहा था। मुझे बहुत ही अच्छा लग रहाथा। और फूलों की क्यारियो के बीच स्वयं फूल-सी खिली पुष्पा भी मुझे कम अच्छी नहीं लग रही थी। मैं भौंरे-सा उसके आकर्षण मेंघूम रहा था।
मैं घूमता घूमता उसके पास पहुँचा। वह कुशलता से काँटों से बचती हुई फूलों को डंठल से नीचे पकड़कर कैंची से काट लेती। मुझे पास आता देखकर उसके चेहरे पर एक गर्व और खुशी का भाव चला आया।

"बड़ी कुशलता से तोड़ती हो। काँटे नहीं चुभते?"

वह कुछ नहीं बोली। बस गर्वसे मुस्कुराई।

मुझे उसका घमण्ड अच्छा लगा। काश, मैं इसे ही तोड़ लेता।

"मैं भी तोडूँ?"

"काँटे चुभेंगे !" उसकी आवाज में गर्व था।

"मुझे परवाह नहीं !"

"अच्छा!" उसने मुझे देखकर भौंहें उठाई,"लेट मी सी?" उसने अंग्रेजी में कहा। कैंची नहीं दी।

मैंने हाथ बढ़ाया और बहुत बचाकर एक डंठल को तोड़ने कीकोशिश की। डंठल टूटकर टेढ़ी हो गई मगर डाल से अलग नहीं हुई। उसे अलग करने केलिए टूटी डंठल को घुमाया।

"जानते हो !" उसने कहा।

थोड़ी कोशिश से डंठल टूट गईमगर हाथ में काँटों की खरोंच लग ही गई। एक-दो पंखुड़ियाँ भी झटकने में टूट गईं। मैंने फूल उसके हाथ में दे दिया।

"देखा?" उसने खरोंच में जमा होते खून की बूंद को देखते हुए कहा।

उसने टोकरी में से छोटे-से डिब्बे से डेटाल भीगा रूई का फाहा निकाला और उससे खरोंच का लहू पोंछते हुए दबा दिया। वह डेटाल भीगा फाहा छोटी सी
शीशी में साथ रखती थी। मैंउसके झुके सिर को, एक से मेरा हाथ पकड़े दूसरे से जख्म पर रुई घुमाते उसके गोरे नाजुक हाथों को देखता रहा।

"मगर ..." मैंने बात आधी छोड़ दी। उसने उत्सुकता से मेरी ओर देखा।

"मैं तो एक खास फूल तोड़ना चाहता हूँ।" मैंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुएपूरा किया।

उसके चेहरे पर क्षणमात्र के लिए एक अजब-सा भाव आया। बात को कुछ ताड़ती हुई-सी प्रतीत हुई। मैंने उसके प्रश्नवाचक चेहरे पर से दृष्टि हटाकर सर से पाँव तक नजर दौड़ाई और उसकी आँखों में देखते हुए आगे कहा,"अगर वह इजाजत दे तो !"

वह समझ गई। मगर लजाकर या घबराकर दृष्टि नहीं हटाई। वह निडर थी। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगती थी।

"कितने फूल तोड़े हैं अब तक?" उसने कुछ ठहर कर पूछा।

"झूठ नहीं बोलूँगा ! सिर्फ एक ! मगर यह फूल बहुत खास है।"

उसे झूठ से नफरत थी। सच सुनना पसंद करती थी। कड़वा हो तो भी। फिर उसी कॉलेज में तो पढ़ती थी।

"उससे भी यही कहा होगा, "यह फूल बहुत खास है।" वह कुछ मजा लेती, कुछ मजाक उड़ाती बोली,"फुसलाने का पुराना तरीका है।"

"नहीं पुष्पा, यह सच नहीं। मैं पहले भी झूठ बोल सकता था मगर ऐसा नहीं किया। सचमुच यह फूल बेहद खास है।औरों से अलग ! दुर्लभ है।"

प्रशंसा से वह प्रसन्न हुई। कुछ मूड में आ गई।

"क्या खास है इसमें?" कुछ मजा लेते हुए बोली।

वह गर्व भरी नजरों से फूल को देखते हुए उसे अपनी चुटकी में घुमा रही थी, अपनी तारीफ सुनना चाह रही थी। मैंने अपना दाँव खेला।

"यह अगर उसकी इजाजत मिले तभी बताऊँगा।"

"इजाजत है !" उसने बात को हँसी में उड़ाते हुए कहा।

"सच? क्या मुझे फूल तोड़ने की इजाजत है?" मैंने भी उसी अंदाज में उसके टालने की कोशिश को व्यर्थ करते हुए कहा।

अब वह मुश्किल में थी। इस बात को हँसी में उड़ाना कठिन था। वह गंभीर हो गई।

यही सही समय था अगला वार करने का, मुझे उसके मजबूत स्वभाव का भरोसा था, मैंनेउसके हाथ के फूल पर अपनी हथेली रखकर दूसरे हाथ से उसकी हथेली को नीचे से सहारा देते हुए कहा,"सच पुष्पा। यकीन मानो। यह साधारण नहीं। इसका सौंदर्य, इसका रूप, इसकी महक, इसका सब कुछ अतुलनीय है। यह बहुत भाग्य से पानेलायक है।"

उस पर प्रशंसा का असर हो रहा था। उसे तारीफ अच्छी लगती थी। मुस्कुराने की कोशिश की।

"क्या करोगे इसका? तुम इसेसूंघकर छोड़ दोगे। मैं ऐसी... " बोलते बोलते रुक गई।

अनजाने में ही वह फूलों केबहाने को छोड़कर सीधे अपने बारे में बोलने लगी थी।

मैंने अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा,"भगवान कसम, दिल में बसा कर रखूँगा।"

"यह काफी नहीं।"

मैंने उसके हाथ से गुलाब का फूल लेकर अपनी कमीज के बटन में टाँक लिया।

"इसे सदा के लिए अपनी जिन्दगी में जगह दूँगा।"

थोड़ी देर के लिए चुप्पी छाई रही।

"इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं। वह सम्भलती हुई बोली।

मैं जानता था वह मुझे पसंदकरती थी। और लड़कों को उतनाभाव नहीं देती थी जितना मुझे।मगर उसे प्यार कह सकना मुश्किल था। शादी के निर्णय के
लिए सिर्फ प्यार जरूरी होता है ऐसा नतो मैं मानता था न वह। मगर मैं उसे पाने के लालच में काफी आगे का वादा कर गया था। वह मुझे अच्छी लगती थी, बल्कि बहुत अच्छी लगतीथी। तेज थी। सुंदर भी बहुतथी। गोरा रंग, खड़ी लम्बी नाक, लाल भरे होंठ, छरहरी। चुस्त जींस शर्ट में उसकी गठन खुलकर बिखरती। लम्बी, सीधी चलने वाली। सक्रिय रहती। कई लड़कियाँ जिन संकोचों में खुद को बांधे रखती हैं उनसे वह अलग थी। उसके साथ बात करने में मजाआता था। लगता था ऐसी उत्साही साथी मिले तो क्या बात है। कभी रात की तनहाई में अपने हाथ से करता तो उसकी कल्पना करता हुआ।

"थोड़ी दूर की इजाजत है?" मैंने फिर पूछा।

वह सिर झुकाकर हँसी,"तुम बुद्धू हो। कुछ समझते नहीं !"

मुझे गुदगुदी हुई। आखिरकार यह भी लड़की ही है, खुद कैसे कहेगी।

उसकी स्वीकृति मुझे विभोर कर गई। उम्मीद थी, मगर विश्वास नहीं था। लगा जन्नत मिल गई।

"तुम और लड़कियों की तरह नहीं हो, तुमसे सुनना अच्छा लगता है।"

"ओके ! मगर इसका मतलब संकेतसमझने में नासमझी तो नहीं होती है।"

यह थी वो ! बोल सकती थी। मैंउसकी इसी खूबी पर तो मरता था।

"ठीक है।" मैंने सिर झुकाते हुए कहा, "मैं नतमस्तक हुआ।"

"खूब !" उसने मेरी उस अदा काआनन्द लिया,"मेरे सामने बार बार होना पड़ेगा। सोच लो?"

तो क्या वह भी कहीं अवचेतनमें मुझसे स्थायी रूप से जुड़ने के लिए सोच रही है? बार बार झुकने से क्या मतलब है?

"मैं तो सदा से हूँ।" मैंने कहा।

"मस्का मत लगाओ।" अब वह ऊपर हो रही थी।

झुके झुके मेरे दिमाग में एक खयाल आया। पुष्पा के लायक जवाब होगा।

"बताऊँ, और कितना झुकने की तमन्ना है?"

"कितना?" वह मेरे गंतव्य को समझ नहीं पाई थी मैं उसे कहाँ ले जाना चाहता था।

मैं और झुका। उसके गले के नस की एक नीली सी छाया नीचे जाकर खो रही थी। उठानों के नीचे कुछ धड़क रहा था। दुपट्टा नहीं ओढ़ती थी।

"बस?" वह इसे खेल समझ रही थी।

मैं और झुका। इस बार उसके स्तन मेरे सामने थे। फ्रॉक में उभरे हुए। उनकी नोकों के बहुत हल्के उभार का पता चल रहा था।

"बस?" मुझे पूरा झुकाने के चक्कर में वह बेखबर चुग्गा खाती कबूतरी की तरह जाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।
मैं और झुका। उरोजों के नीचे की ढलान, समतल पेट और उससे नीचे उसकी संकरी कमर। फ्रॉक के कपड़े में लिपटी हुई। नीचे दोनों तरफ फैलते कूल्हे।
"गो ऑन।" वह जीत के नशे में गाफिल थी।

अब मैं बैठ गया, घुटनों पर। मेरा गंतव्य आ गया था जिसके सपने मैं बार बार देखता था। मैंने घुटनों पर बैठे सिर झुकाया। वह समझी कि अब मैं नमाज की मुद्रा में दोजानूँ होऊँगा। सोच रही थी मैं अंतत: साष्टांग बिछ जाउंगा। मैंने उसके नितम्बों को बाँहों में घेरा और कमर के नीचे उस स्थान पर जहाँ भीतर जांघों का संधिस्थल था उसमें मुँह घुसाकर जोर से चूम लिया। मेरे होटों पर और नाक पर कपड़ों की सलवटोंके नीचे मुलायम गद्देदार मांसल उभार महसूस हुआ।

वह ठगी-सी खड़ी रही गई। उसके मुँह से बस आश्चर्य में निकला,"अरे !"
मैंने जहाँ चुम्बन की मुहर लगाई थी उस स्थान को देखते हुए कहा, "यह फूल सबसे अनूठा है। कुदरत का सबसे बेहतरीन करिश्मा। इसके सामने सब फूल बेकार हैं।"
वह चुप थी। एक आघात में। इतने बड़े दुस्साहस की उम्मीद नहीं की थी। मुझे लगा वह डाँटेगी और चल देगी। मगर मुझे उसके मेरे प्रति आकर्षण का भरोसा भी था। तभी मैं इतनी हिम्मत कर गया था। उसके चेहरे का भाव थोड़ा नरम पड़ा। उसमें सम्हलने की क्षमता बेशुमार थी। हाथों से मेरा सिर दूर हटाते हुए बोली,"यह क्या कर रहे हो?"
"वही जो मैं बाद में बहुत अच्छे से करूँगा।" उसे हराने के बाद अब मैं हावी होने की स्थिति में था। वहअभी तक अपनी तेज तर्रारी और तेज दिमाग को ही बहुत भाव देती आई थी।
वह कुछ देर चुप रह गई।

"छी: ! तुम्हें गंदा नहीं लगता?"
मैं उठा। उसके हाथ से गूलाब का फूल ले लिया। उसेचुटकियों में घुमाते हुए धीरे धीरे बोला,"मैं उस सबसे बेशकीमती फूल से सबसे खास व्यव्हार करूँगा। उसमें डूबकर प्यार करूंगा। उसकी पंखुड़ियाँ खोलूंगा- ऐसे।"
मैंने उंगलियों से गुलाब की धीरे धीरे उसकी पंखुड़ियाँ फैलाईं,"फिर उसे चूमूंगा, ऐसे, यहाँ।"
मैंने फैली पंखुड़ियों के बीच मुँह घुसाकर उसके भीतर गर्भस्थल को चूमा, चूमने की चुसकारी की जोर की आवाज की।
"बड़ी हिम्मत है !"
"और बताऊँ, क्या करूँगा?" पता नहीं कहाँ से आज मेरी हिम्मत और अक्ल दोनों काम कर रहे थे। आज मैं उसे आश्चर्य पर आश्चर्य दे रहा था। मैंने बाड़ से बबूलका एक सूखा काँटा तोड़ा और उसे फूल के गर्भ में चुभो दिया।
वह शर्म से लाल हो गई।
"अब बताओ।" मैंने कहा। जैसे पूछ रहा होऊँ,"कैसा रहा?"
मगर जो शर्म से सिकुड़ जाए वह पुष्पा क्या। वह तो बराबर का जवाब देने में यकीन रखती थी। उसे अपनी जवाब देने की क्षमता का यकीन था। उसने काँटे को फूल से निकाला जिसका नुकीला सिरा फूल के रस मेंभीगा हुआ था। उसने उसे धीरे धीरे उठाया और मुँह में लेकर चूस लिया।
मैं उसे देखता रह गया।


कहानी जारी रहेगी।
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Old 29th August 2012
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"pushpa ka pushp "

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Originally Posted by kamlabhati View Post
"pushpa ka pushp "
sahi pehchana.
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Post फूलों की खेती UPDATE 2

उसकी पनीली आँखों में, जिनमें एक अजब-सा मर्म को छूता भाव उमड़ रहा था। शर्मसे लाल गालों पर झूलती लट, बालों के बीच सफेद मांग ! खाली।
मेरे भीतर कुछ उमड़ आया। उसतमाम निर्भयता और तेजी के पीछे एक अदद औरत उमड़ रही थी, वह औरत जो खुद उसे तीर से भेदने वाले शिकारी को ही खुद को समर्पित कर देतीहै।
मैंने सिर घुमाया। आसपास कोई नहीं था। फूलों की झाड़लम्बी थी। हम उसकी ओट में थे। मैंने सिर झुकाया और उसके होठों पर हल्का सा चुम्बन लिया।
"तुम अद्भुत हो। मुझे तुम जैसी साथ देने वाली कोई औरनहीं मिलेगी।"
उसने सिर झुका लिया।
"मुझसे शादी करोगी?" मुझे हैरानी हुई मेरे मुँह से क्या निकल गया।
मैं शादी के लिए गम्भीर नहीं था और वह भी मुझसे शादी करना पसंद करेगी कि नहीं मालूम नहीं था मगर अपने जोड़ का साथी के रूप में पत्नी के रूप में उसकीकल्पना मुझे बड़ी अच्छी लगती थी।
वातावरण बोझिल हो गया था। मुझे लगा इस बोझ में मेरा उसे पाने का लक्ष्य दब न जाए। हालांकि घूमती हवा और चिड़ियों की चहचहाहट स्फूर्तिदायी थे।
अच्छा बताओ, पुष्पा के पुष्प का रंग कैसा है?" मैंने मजाक करना चाहा था मगर मुझे अफसोस हुआ मुँह से क्या निकल गया।
इतनी गंभीर बातों के बाद इतनी सस्ती, इतनी छिछोरी बात ! मगर आज का दिन ही लगताहै अप्रत्याशित बातों के लिए था।
उसने कुछ न समझते हुए मुझेदेखा। मैंने उसी फूल को, जिसमें काँटा चुभाया था, उसके सामने कर दिया।
"तुम भी कैसी बातें करते हो।"
"सचमुच बताओ न?"
"अजीब हो!"
"तुम्हारे बाग में तरह तरह के रंग के गुलाब है लाल, कत्थई, गुलाबी, बैगनी, काला भी, सफेद भी। तुम्हारे होंठ लाल गुलाब के रंग के हैं। वह भी लाल है या...?" मैंने हिम्मत करके कहा।
"छी: तुम बेहद गंदे हो।"
"बताओ ना ! गंदा कहकर उस फूल को अपमानित न करो।"
वह मेरी ओर कुछ देर तक देखती रही। फिर कुछ जैसे सबल हुई,"मगर ... छी: ... ओके, वह फूल तुम देखोगे कैसे?"
"क्यों? क्या परेशानी है?"
"आज अमावस्या है।"
अबकी बारी मेरे हैरान होने की थी। वह भी चकित कर देने में कम न थी।
"इसका मतलब आज ही....!!" आज सचमुच आश्चर्यों का दिन था।
इच्छा हुई कि नाचूँ। मैं जिस खजाने को दूर समझकर पाने के लिए इतना दाएँ बाएँ कर रहा था वह उम्मीद से पहले अचानक सामने आ गयाथा। आज का दिन मुरादों के पूरे होने का दिन था।
"कब? कैसे? कहाँ?"
"इन्तजार करना।"
मैं कुछ और कहना चाहता था।मगर उसने कहा,"जाओ।"
अतिथियों के लिए कमरा छत पर था। मुझे उसी में ठहराया गया था। ऊपर अकेला कमरा। सामने खुली सहन थी। किनारे फूलों के गमले सजे थे। पुष्पा के पिता शौकीन थे, फूलों से उन्हें अच्छीआय होती थी।
कमरे को खूबसूरती से सजाया था। एक बड़ा-सा पलंग, खिड़कियों पर सुन्दर पर्दे, खिड़की खोलते ही बागके फूलों का सुन्दर दृश्य दिखता था। अटैच्ड बाथरूम, टॉयलेट, नहाने का टब भी।
कहते थे यह कमरा शादी के बाद बेटे को दूंगा, ऊपर एकांत में आजादी से आनंद मना सकेंगे। खुले विचारों के थे। फूलों के प्रेमी का रोमाण्टिक होना स्वाभाविक था। शायद पुष्पा पर उनके खुलेपन का असर था। वरना पुष्पा एक 'ब्वायफ्रेंड' को अपने घर कैसे बुलाती।
'ब्वायफ्रेंड'...' मैं मुस्कुराया।
मैंने खुद को कभी इस रूप में देखा नहीं था। आज उस खूबसूरत कमरे में उनकी खूबसूरत बेटी के साथ जो मैं करने वाला था वह किस श्रेणी में आता था?
मुझे एक मजेदार खयाल आया- जिस तरह पूजा के बाद मिट्टी की मूर्ति में देवता की प्राणप्रतिष्ठाहोती है उसी तरह आज इस कमरे में भी अक्षत कौमार्य की पूजा के बाद स्त्रीत्व की प्राणप्रतिष्ठा होगी। क्या उन्हें इतनी महत्वपूर्ण बात का गुमान भी है।
अक्षत कौमार्य ! मैं इस ख्याल पर ठहरा। मुझे मालूम नहीं था वह अक्षत हैकि नहीं। खुले विचारों की लड़की है, नहीं भी हो सकती है।
पूछना चाहा था, मगर हिम्मतनहीं हुई।
जब उसने मुझसे पूछा था कि कितने फूल तोड़े हैं तब भी मैं हिम्मत नहीं कर पाया था। लगता था यह बात पूछने से उसकी बेइज्जती होगी। एक औरत से यह पूछना ही उसकी गरिमा के खिलाफ है। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।
मुझे एहसास हुआ मैं आमोद-प्रमोद के भाव से आगे जाकर उसे महत्व देने लगा हूँ। वह सुन्दर है बुध्दिमान है, शिक्षित, एनर्जेटिक और सलीकेवाली।उतने खुलेपन के बावजूद मैंने उसमें छिछोरापन नहीं देखा था। आज तो मैंनेउसे 'प्रोपोज' भी कर दिया था।
जाड़ों की शुरुआत हो रही थी। सुबह हवा में ठंडक होती थी। सहन पर फैली धूप अच्छी लगती थी। मुझे फैली धूप देखकर चांदनी रात का खयाल आया। आज अगर पूर्णिमा की रात होती तो खुली चांदनी में छत पर उसके संग प्रणय में कितना मजा आता।
चांद की बरसती सफेदी में नहाता हुआ देखता पुष्पा का पुष्प।
पुष्पा का पुष्प ... पुष्पा का पुष्प ... बार बार दिमाग में घूमने लगा।
जब भी कोई आहट होती, मेरी उत्सुकता और उत्तेजना बढ़ जाती। सीमा पर बंकर में बैठे सिपाही की तरह छोटी से छोटी आहट पर कान लगे थे।
तीसरा पहर, रात भीग रही थी। मेरी आँखों में नींद का पता नहीं। उत्कण्ठा में रोम रोम कान हुए जा रहे थे। खिड़की के बाहर अंधेरे में सारा जग जैसे घुलकर खो गया था। झींगुरों की आवाज और बहती हवा में ताड़ के पत्तों की सरसराहट के सिवा और कोई आवाज नहीं। कभी कभी पहरेदार का स्वर दूर से आता।
दुनिया सो रही थी। मेरी बेसब्री का ठिकाना नहीं था। एक तो बज रहा है, अब और कितनी देर लगाएगी।
कहीं मैंने गलत तो नहीं समझा। उसने जगह समय वगैरह तो कुछ बताया नहीं था, सिर्फ कहा था इंतजार करना। अब अमावस्या की रात में अपने कमरे को छोड़कर उसका इंतजार और कहाँ किया जा सकता है !
बाहर तारों की रोशनी में सीढ़ीघर की ओर देखने की कोशिश कर रहा था, आ रही है या नहीं।
इंतजार में बहुत कष्ट होता है। सिर पर हाथ रखकर लेटे कुछ से कुछ सोचता नाउम्मीदी को टालने की कोशिश कर रहा था।
पता नहीं कब आँख लग गई और जब नींद खुली तो देखा खिड़की के बाहर सुबह की धूपफैली थी। वह नहीं आई। उसनेमुझे झूठी उम्मीद दिलाई थी। मुझे गुस्सा आया।
वह बगीचे में फूलों के पौधों में पानी दे रही थी, मुझे देखकर मुस्कुराई।
मुझे लगा, वह मुझ पर हँस रही है, मेरा मजाक उड़ा रही है।
"कैसे हो?"
इस सवाल से गुस्सा और बढ़ गया। एक तो खुद वादा करके नहीं आई और अब पूछती है कैसे हो ! मैं गुस्से को दबाते हुए चुप रहा।
"तुम्हारी आँखें लाल हैं।रात सोए नहीं?"
अब तो हद हो गई। इतना खुलकर कटाक्ष कर रही है। ऐसा जवाब देने का मन हुआ कि तिलमिला जाए।
"तुम ऐसा करोगी, मुझे उम्मीद नहीं थी।" गुस्सा बढ़कर खीझ में बदल गया था।
"तुम नहीं समझ सकते।"
"क्या नहीं समझ सकता? तुमने खुद कहा था इन्तजार करने को। मैं तो .... "
'इन्तजार कर रहा था...' बोला नहीं गया। बोलकर स्वीकार करना अपने गर्व के विरुद्ध था।
"क्या तुम लड़कियों के बारे में कुछ भी कल्पना नहीं कर सकते?" उसने एक क्षण को जैसे रोष में मुझको देखा और दूसरी ओर मुड़ गई।
मैं उसे देखता रह गया। लड़कियों के बारे में क्या? क्या माँ बाप के कारण आने का मौका नहीं निकाल पाई? लेकिन यह तो पहले से ही था, फिर कल के लिए वादा कैसे कर गई?
समझ में नहीं आ रहा था, कहीं वो अभी....!
मैं जितना ही सोचने लगा उतनी ही उसकी सम्भावना अधिक लगने लगी। यही बात है। लड़कियों के बारे में और क्या कल्पना करने की बात हो सकती है? मैंने उसे गौर से देखा। मुझे उसकी चाल में एक ढीलेपन का एहसास हुआ। कल ही शुरु हुआहोगा।
मैंने क्या क्या सोच लिया था। खुद पर अफसोस हुआ। लेकिन भला मुझे इसका अनुमान कैसे हो सकता था।
वह झुकी हुई, जड़ के चारों ओर क्यारी चौड़ी करके उसमें पानी दे रही थी। मुझे लग रहा था उसकी हरकतों में एक सुस्ती है। हो सकता है यह मेरा भ्रम हो, वह एनर्जेटिक लड़की थी।फिर भी इस स्थिति में भी काम कर रही है।
मुझे उस पर दया आई। उसने अपनी उस हालत के बावजूद मुझसे पूछा था कि कैसे हो।वह धोखेबाज हरगिज नहीं हैं। अगर मेरे प्रति कुछ जवाबदेही नहीं महसूस करती तो क्या अपनी उस स्थिति का भी संकेत देती? बेहद भली लड़की है। मेरा मनउमड़ने लगा।
मगर पुष्पा का पुष्प ! अब कैसे देखूंगा। अभी उसका खयाल भी मुझे गंदा लगा। कहाँ तो सोचा था उसे चूम लूँगा। छी: ! तीन चार दिन तोऐसे ही गए। उसके बाद भी तुरंत तो नहीं ही। मुझे वापस भी लौटना था। किस्मत ने बीच में ही आकर डंडा चला दिया था। यह मौका तो गया !
मैं उसके पास पहुँचा। उसके हाथ से पानी का बरतन लेने की कोशिश की। बिना किसी आनाकानी से मुझे उसने दे दिया। मुझे लगा किबोलने के बाद से वह आहत महसूस कर रही है। लगा, वह भी वादा नहीं निभा पाने कीमजबूरी महसूस कर रही है। इच्छा हुई कि कहूँ कोई बातनहीं, बाद में देखेंगे। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लगा कि बिना बोले ही मेरा आश्वासन उस तक पहुँच गया है।
वह उठी और आगे बढ़ गई। मैंने देखा, उसके पिताजी आरहे थे। मेरे हाथ में बरतनदेखकर हँसे,"पुष्पा आपको भी उलझा रही है?"
पूरा दिन सुस्ती भरा ही गुजरा। खाने और सोने के सिवा कोई काम नहीं था। पुष्पा कटी-कटी-सी रही। उस राज के जानने के बाद उसे मेरे सामने आना लज्जाजनक लगता होगा। मैं अब लौटने का कार्यक्रम बदलने की सोच रहा था। अब तो कुछ होगा नहीं।
पुष्पा का पुष्प ! अफसोस !
ऐसा नहीं कि मैं उसी के लिए आया था। चलते वक्त इसकी कोई कल्पना भी नहीं थी। यहाँ आकर परिस्थितियों के मोड़ से इतनी बड़ी बात की सम्भावना के बनने के बाद अब वही लक्ष्य बन गया था। उसके बिगड़ जाने के बाद खाली लग रहा था। कल सुबह ही लौट जाऊँगा। खिड़की के बाहर अंधेरी रात में आकाश में तारे दिख रहे थे और मैं सिर पर हाथ रखे लेटा सोच रहा था कि अभी मेरे तारे अनुकूल नहीं हैं।
बाहर कल की तरह सन्नाटा था, रात अधिक हो रही थी, नींद आज भी नहीं आ रही थी। यद्यपि आज किसी का इंतजार नहीं था। खिड़की से आती हवामें हल्की ठण्ड का एहसास हुआ लेकिन गुलाबों की आती खुशबू अच्छी लग रही थी। घड़ी में देखा- ग्यारह बज रहे थे...
कहानी जारी रहेगी।
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बाहर कल की तरह सन्नाटा था, रात अधिक हो रही थी, नींद आज भी नहीं आ रही थी। यद्यपि आज किसी का इंतजार नहीं था। खिड़की से आती हवामें हल्की ठण्ड का एहसास हुआ लेकिन गुलाबों की आती खुशबू अच्छी लग रही थी। घड़ी में देखा- ग्यारह बज रहे थे...
किवाड़ के कब्जों की बहुत धीमी चरमराहट से मैं चौंका।
"कौन है?" मन में प्रश्न उठा और मैं तुरंत आवेग मेंआकर उठने को हुआ।
मगर भीतर उठे किसी खयाल नेमुझे रोक दिया। कहीं वो तोनहीं !
मगर वो कैसे हो सकती है ? उठूँ या न उठूँ की दुविधा में वैसे ही पड़ा रहा।
अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था।
परफ्यूम की हल्की सी महक पास आई। मेरे दिल की धड़कन बढ़ने लगी।
वही है ! मेरी लहकती कामनाओं की मूर्ति !
मगर इस हालत में किसलिए आईहै?
"सो गए?" फुसफुसाहट की आवाज आई।
मैं वैसे ही स्थिर रहा। कुछ देर चुप्पी रही।
मेरे होठों पर कुछ ठंडा, धातु का टकराया। उसके कान का टॉप्स। वह कान नजदीक लाकर मेरी सांसें सुनने की कोशिश कर रही थी।
मैं खुद को रोके रहा।
"जानती हूँ, नाटक कर रहे हो।" वह बुदबुदाई।
अब रुक पाना मुश्किल था। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे अपने ऊपर खींच लिया। वह फूलों से लदी डाली की तरह मेरे ऊपर गिर पड़ी।
मैंने उसे बाँहों में समेटते हुए चूम लिया। वह छूटने की कोशिश करने लगी। उसे छोड़ते हुए मेरे मन मेंसवाल कुलबुला रहा था आज तोमासिक में है, फिर कैसे आई?पूछना चाहा।
'आज क्यों आई' मगर मुँह से निकला,"कल क्यों नहीं आई?"
वह कुछ नहीं बोली।
एक लड़की से कल क्यों नहीं आई का कारण बताने की उम्मीद करना बेमानी था।
"मैंने तो समझा था कि तुम शायद....."
"क्या?" उसकी बेहद सकुचातीफुसफुसाहट भी कमरे में रात की नीरवता में साफ सुनाई दी।
चलो बोली तो। डर रहा था कहीं चुप न रह जाए।
होंठों पर शब्द लाने में बेहद हिचक हो रही थी। फिर भी थोड़ा जी कड़ा करके कहा,"वो क्या कहते हैं पीरियड वगैरह....?"
अंधेरे में उसकी हल्की हँसी कानों में गूंजी।
हँसी क्यों? मुझे शंका हुई, कहीं मैं गलत तो नहीं था?
"तो क्या तुम...?"
"."
उसके चुप रहने से मैं और परेशान हो गया।
"बोलो ना पुष्पा.....?"
"मुझसे ज्यादा तेज बनने की कोशिश करोगे तो यही होगा।"
"तो तुम मुझे छका रही थी?" मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला।
मुझे फिर उसकी हँसी सुनाई दी।
"तुमने मुझे बेवकूफ बनाया! अब देखो मैं तुम्हारा क्या हाल करता हूँ।" मैंने उसे बिना कुछ सोचने का मौका दिए एक जोर का झटका दिया। वह बेसाख्ता मेरे ऊपर आ गिरी। न जाने कैसे अंधेरे में मेरे होंठ सीधे उसके होठों से जा लगे और मैं उसे जोर से चूमने लगा।
वह साँस की कमी से अकुलानेलगी।
मैंने उसके दोनों हाथों को उसकी पीठ के पीछे लाकर एक हाथ में कस लिया और एक क्षण के लिए साँस लेने का मौका देकर दूसरे हाथ से पीछे से उसका सिर अपने मुँह पर दबा लिया।
वह तीर लगी चिड़िया की तरह छटपटाने लगी, लेकिन उसके हाथ पीछे जकड़े हुए थे और वह बेबस थी।
मैं बेतहाशा उसके मुँह पर मुँह दबाए चूस रहा था। उसके कोमल होंठ मेरे होंठों के दबाव के नीचे पिसे जा रहे थे और मुझे डर लग रहा था कहीं छिल न जाएँ। हर 'पुच' की आवाज के साथ उसके मुँह का रस मेरे मुँह में चला आता और मैं उसकी सुगंधित मिठास में खो जाता। मैं अब सचमुच उसेपी ही रहा था और वह उम.. उम.. कर रही थी।
धीरे धीरे उसकी छटपटाहट शांत पड़ने लगी।
जब हमारे होंठ अलग हुए तो दोनों हाँफ रहे थे। मेरे सीने पर दबे उसके स्तन ऊपरनीचे हो रहे थे। चिकनी साटिन नाइटी के भीतर उसका बदन धड़क रहा था।
कहीं मैं सपना तो नहीं देखरहा ! उसकी पीठ के पीछे बंधे अपने एक हाथ में चिकोटी काटी। चुभन महसूस हुई।
नहीं, यह सपना नहीं है। होटों पर टंगी उसके चुम्बन की गरमाहट, साँसों में आती उसकी साँसों की सुगंध और मेरे चेहरे पर गिरते उसके बालों की रेशमी सरसराहट ने मुझे उन स्वर्गिक क्षणों के वास्तविक होने का यकीन दिला दिया।
मैंने धीरे धीरे उसे एक करवट की तरफ लिटा लिया। वहहाँफ रही थी।
किवाड़ बंद करते हुए एक ठंडी हवा का झोंका जैसे कोई होश दिला गया। चारों तरफ चुप सूना संसार। गहरी रात। नीचे उसके माँ बाप गहरी नींद में सो रहे होंगे। यहाँ बिस्तर पर उनकी बेटी। यौवन की उमड़ती धारा, उत्तेजित, गर्म सांसें छोड़ती, कुछ कर चुकने को आतुर। चुप्पी को बढ़ाती पेड़ों की सरसराहट, गुलाबों की खुशबू और हवा का मध्धम झोंका।
खिड़की खुली थी। कोई बात नहीं। गहरी रात के सुरक्षित अंधेरे में दुमंजिले पर कमरे में किसी के देखने का डर नहीं था।
बिस्तर पर वह मुश्किल से छाया-सी नजर आ रही थी। पास आकर मैंने टटोला। वह सिमट गई।
"पुष्पा ...ऽ...ऽ....!" मैंने प्यार से बुलाया।
उसकी तेज साँसें गूंज रही थीं। मैं उसके बगल में लेटगया। स्त्री के शरीर का मुलायम गुदगुदा एहसास। उसे अपने में कसते हुए मैंघमंड से भर गया। वह मेरी थी। मेरी बाँहों के घेरे में, मेरी कैद में। उसकी गर्म सांसें मेरे कंधे पर,छाती पर जल रही थी। मैं खोजते हुए ही उसे चूम रहा था- गालों को, होंठों को, उनके गीले किनारों को, अधरके नीचे... ठुड्डी, जबड़े की लकीर, गले की बगल, जूडें के भीतर की मुलायम सोंधी त्वचा।
मैंने बालों की सोंधी जड़ों में नथुने घुसाकर साँस भरी। वह मेरे कंधे परकुछ चूम कुछ मुँह रगड़ रही थी।
उसकी पीठ पर घूमते मेरे हाथ नाइटी के नीचे ब्रा केफीते से टकराए। उसे मैंने उंगलियों से कुरेदा। नितम्बों पर तिरछे काटती पैंटी के किनारों की लाइन थी। कॉलेज में टाइट जींस में आती थी तो उन पर नीचे से अंग्रेजी के वी की तरह निकलती पैंटीलाइन उभरती थी। मुझे अंधेरे का अफसोस हुआ। अभी उन्हें असल में देखता।
मैंने उन नितम्बों को हथेलियों में भरकर सहलाया और फिर उसके बदन कोअपने में भींच लिया। वह कसमसा उठी। एक हुंकार सी उसके मुँह से निकल गई।
मैं उत्साह से भर गया- हाँ! यह बात है। उसकी पीठ पर नाइटी को हाथों में बटोरते हुए मैंने उसे चित्त कर दिया और सामने सेनाइटी को ऊपर खींचा। उसने नितम्ब उठाकर नीचे से नाइटी निकालने में सहयोग किया। मैंने उसकी गर्दन के नीचे हाथ डालकर उसे बिठाया और नाइटी को सिर केऊपर खींच लिया।
अब छिलकों की तरह सिर्फ ब्रा और पैंटी ही उसके बदनपर बच रही थी। मैंने अपनी बनियान उतार दी।
उस अंधेरे में भी वह मेरी निगाह से बचने के लिए मुझमें जकड़ गई और अपनी कोमल बाँहो में मुझे कस लिया।
शायद यह उसके लिए पहला मौका था। पता नहीं.....? मुझेयाद आया मैंने पूछा नहीं था कि वह अछूती है या नहीं। हो सकता है शर्म के बावजूद अपने बोल्ड स्वभाव के कारण ही पहली बार में इतना सहयोग कर रहीहो। ऋचा, मेरी पहली लड़की, जब मैंने उसके साथ संसर्ग किया था तो वह तो निष्क्रिय ही रही थी। उसे बहुत खून भी निकला था। वह रो रही थी। यह दूसरी ही लड़की है, सहयोग कर रही है। सचमुच की साथी। अपनी जिन्दगी भर की साथी हो जाएतो क्या बात है।
मेरे हाथ उसकी पीठ पर ब्राके हुक से संघर्ष कर रहे थे, जो खुल नहीं रहा था। मुझे लगा वह मुझ पर हँसी है। वह अपने हाथ पीछे ले जाकर हुक खोलने को हुई मगरमैंने अधीर होकर दोनों तरफ फीते को पकड़कर झटक दिया। हुक टूट गया।
वह सिहर गई,"बड़े बेकरार हो रहे हो !"
मुझे खुशी हुई। अभी मर्द की ताकत को उसने देखा कहाँहै।उसने सिमट कर स्तनों को बाँहों के नीचे दबा लिया। उसकी साफ हो गई पीठ पर मैंने हाथ फिराए और कंधों पर से फीते को सरकाते हुए झुककर गर्दन को बगल से चूम लिया। वह बाँहों में स्तनों को छिपाए सिमटी हुई झुकी थी। मैंने एक तरफ से उसकी कुहनी उठाकर ब्रा के फंदे को कलाई तक खिसकाने की कोशिश की।
उसने हिचकते-हिचकते ही अपना वह हाथ स्तन पर से उठाया और मुझे ब्रा का फंदा बाहर निकालने दिया। उसे प्यार से सहलाते हुए मैंने ब्रा को धीरे धीरे खींचते हुए उसके दूसरे हाथ से भी बाहर निकाल दिया।
अब उसके स्तन आजाद थे। मैंने धीरे धीरे उसे लिटा दिया।
"जागते रहो....." दूर से आई आवाज ने हम दोनों को चौंकादिया।
उसका हाथ मेरी पीठ पर ठहर गया। गाँव में पहरा पड़ रहाथा। मैंने अंधेरे में ही एक बार आँखें खोलकर देखा। कोई डर की बात तो नहीं ! जागते रहो का आमंत्रण, किसके लिए? आज जागने का जश्न तो हम मना रहे थे। उसके माँ बाप को तो खबर भी नहीं। वे निश्चिंत सो रहे हैं। पहरे की आवाज से कहींवे जाग गए, उन्हें पता चल गया तो? डर की एक लहर दौड़ गई। नीचे देखा, पुष्पा भी निश्चल थी। शायद वह भी यहीसोच रही थी।
मैंने उसे अपने से सटाकर ढांढस देने की कोशिश की। डरो नहीं, कुछ नहीं होगा....... मैंने उसके गले केनीचे अपना गाल रख दिया, खुद भी आश्वस्ति की तलाश में। उभार के ऊपरी हिस्से के नीचे उसका दिल जोर जोर धड़क रहा था। मैंने मुँह उठाकर उसकी ठुड्डी को चूमा और दाएँ स्तन को हाथ से ढक लिया। चुचूक की नोक खड़ी थी। मैंने उसे हथेली में दबाकर स्तन को हौले हौले मसला। उसकी नोक गुदगुदी कर रही थी। मेरे कान के पास उसकी हल्की कराह गूंजी।
मुँह उठाकर मैंने उसके गर्म साँस निकालते होठों पर सीधी मुहर लगाई और चूमते हुए नीचे उतरने लगा। कोमल मांस के नीचे कठोर ठुड्डी, ठुड्डी से नीचे उतरकर त्वचा का कोमल पर्दा, कंठ पर मेरे होठों के नीचे उसके गटकने की मीठी हरकत।
आऽह... आऽह की धीमी कराहटें... गला, कॉलर बोन। नीचे... और थोड़ा नीचे.... उभारों की मांसलता की शुरुआत....गुदगुदे मांस पर धँसते होंठ... पसली के नीचे दिल की फक फक .... उसकी तेज होती साँसों की गूंज... होंटों के किनारे पर रबर-सी लचीली स्तन की कली की छुअन.... उत्कण्ठा में उसकी अटक गई सांस ... अब ... अब...
और मैं उसे छकाता हुआ चूचुक के बगल से गुजरकर नीचे की सतह पर आ गया। उसकी ठहरी साँस निकली मगर कुंठित होकर उसने मेरी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। टीसमें मैंने उसके हाथ के नीचे दबे स्तनाग्र को चुटकी में पकड़कर दबा दिया।
ओह ... उसके मुँह से निकला। छटपटाकर उसने मेरे हाथ को वहाँ से खींच दिया। मैंने उसे संभलने का मौका दिए बिना दूसरे स्तन में दांत गड़ा दिए। सी...ऽऽऽऽ... वह सिसकारी भर उठी।
इस खेल में अब वह गर्म हो रही थी। उसने मेरा सिर खींचकर चूची के ऊपर मुँह लगाने की कोशिश की और मैंने कृपा करते हुए उसकी इच्छा का पालन किया।
"हाँ..." उसके मुँह से निकला। चैन के एहसास के साथ उसने मेरा सिर अपने स्तन पर दबा लिया और मेरे सिर पर हाथ फिराने लगी।
मैं उसे बच्चे की तरह चूसने लगा। एक गर्माहट और सांत्वना का अजब एहसास मुझमें जागने लगा। स्तनों की तृप्तिदायी गंध में घिरकर मुझे अपने भीतर कुछ हल्का महसूस होने लगा। इतनी देर से मानो किसी घमंड, किसी बदलेकी भावना, कुछ दिखाने के भाव से संचालित था, अब उसका स्थान किसी निस्वार्थ अपनेपन, किसी कृतज्ञता ने ले लिया।
वह मेरे सिर पर हाथ फेर रही थी और मैं किसी अनजानीक्षुधा को चूचुक को खींच खींचकर चूसकर शांत कर रहा था।
कुछ पलों में उसने मेरा मुँह वहाँ से हँटा दिया औरमैं स्वचालित दूसरे स्तन पर लग गया। कभी अग्र भाग को होठों से दबा देता और कभी उसे मुँह के भीतर लिए लिए उसकी नोक पर जीभ की खुरदरी नोक से गुदगुदी करता।
उसके मुँह से निकलती सिसकारियाँ, आनंद में डूबी हँसी... सिर पर घूमता हाथ मुझे उत्साहित कर रहे थे और बता रहे थे कि मैं ठीक जा रहा था। मुझे अपने पुरुष होने पर गर्व हुआ। मैं उसे संचालित कर रहा था। वह चाहे लाख अकड़ वाली लड़की हो, इस वक्त वह नन्नावस्था में मुझसे अपने स्तन चुसवा रही थी, मेरी हरकतों पर कठपुतली-सी नाच रही थी। मैं उसे चलाए गंतव्य की ओर बढ़ा जा रहा था।
गंतव्य?..... मुझे याद आया... 'पुष्पा का पुष्प'।
मैंने दाएँ स्तन पर से हाथहटाकर नीचे टटोला। उसकी पैंटी गीली हो रही थी। उंगलियों पर उसकी गर्म चिपचिपाहट महसूस हुई।
उत्सुकतावश ही उंगली को नाक के पास लाया। एक अजीब सी गंध... न अच्छी ... न बुरी ... बस एक बुलावे से भरी, कोई पुरानी याद दिलाती-सी...।
मैं उसकी ओर किसी जानवर साखिंचने लगा। पेट पर चुंबन अंकित करता, पेड़ू की ओर बढ़ता..
वह मेरा सिर रोकने लगी... ना... नहीं..... उधर नहीं.....
मगर मैं सुन कहाँ रहा था...! पेड़ू का उभार, खुरदरे बालों की शुरुआत, पैंटी कीइलास्टिक, पतले कपड़े के नीचे शिकार खोजते-से नथुने। मैं मानने वाला नहीं। होंठों पर झीने कपड़े के नीचे बालों की रेशमी सरसराहट महसूस होती है.... नशीली गंध का सैलाब ......। इत्र की खुशबू मिली, शायद पैंटी पर स्प्रे की थी, चुम्बनों काप्रहार।
रुको... रुको... वह रोक रही है, हाथ घुसाकर वस्तिस्थल को ढकने की कोशिश करती है मगर मैं उसके हाथों को दोनों तरफ खींचकर पकड़ लेता हूँ।
पुष्पा का पुष्प। पैंटी के नीचे ढका हुआ .... सुरक्षित, कोमल, सुगंधित, रसभरा ... नथुने फुलाकर उसे जोर से सूंघता हूँ.... फिर बस धीरे से होठों से छूता हूँ।
दो हिस्सों में फटी मांसल स्पंज, जिसके बीच की फाँक को मैं कंधों से उसकी जांघों को फैलाकर चौड़ा करता हूँ, दोनों फूले होंठ, होठों के बीच झिल्ली-सा तना कपड़ा, जिस पर मैं मुँह गड़ा देता हूँ।भीतर से छनकर उसका रस आता है... स्वादहीन सा... तीखा... जीभ नहीं, किसी और इंद्रियपर बरसता... भीतर सोए जानवर की प्यास बढ़ाता।
उफ्फ... उफ्फ... क्या कर रहे हो....!
उसकी लगभग डाँटती-सी आवाजकी अनसुनी करते हुए मैं अपना हमला जारी रखता हूँ। उसका विरोध व्यर्थ है। लगातार उठती आनंद की लहरों के आगे वह कुछ नहीं कर पाएगी। वह वहाँ से मुझेहटाना चाहकर भी नहीं हटा रही है। उसके हाथ हालाँकि मैंने अभी भी पकड़ रखे हैं मगर अब उनमें छुड़ाने की कोशिश नहीं है। मैं साँस लेने के लिए ऊपर आता हूँ। भीगे मुँह पर पर ठंडी हवा महसूस होती है। उसका मधु, मेरे मुँह पर पुता हुआ। एककुआँरी, कोमल, अछूती, बेहद सुंदर, सलीकेदार कन्या का इससे बढ़कर उपहार क्या हो सकता है !
एक खुशी की लहर मेरे अंदर उठती है। पुन: गोता लगाता हूँ। वह नहीं रोकती। अब मैं उसके हाथ छोड़कर स्तनों पर जाता हूँ। चूचियाँ उसी तरह खड़ी हैं। हथेलियों से उन्हें धीरे धीरे मसलते हुए योनि के तिकोन के आजू बाजू नंगी जांघों को चूमता हूँ। उसकी सांसें गूंज रही हैं। उसके हाथ मेरे सिर परआकर स्थिर हो जाते हैं, शायद अभी भी रोकने की दुविधा में हैं। मगर चूचुकों और चूत से लगातार आ रहा करेंट उन्हें ज्यादा देर स्थिर नहीं रहने देते। वे धीरे धीरे मेरे सिर पर घूमने लगते है, एक भरोसे में। आओ, तुम मेरे अपने हो, बेहद अपने और अंतरंग, भीतरी से भीतरीरहस्य के राजदार।
वह हल्के हल्के कमर उचकाकर इसकी स्वीकृति दे रही है। जांघें फैलाकर मुझे पहुँच दे रही है।
कुछ क्षणों पहले हाथ भी नहीं लगाने दे रही थी। अभीमस्ती में सराबोर है। मैं और उत्साहित होकर थूथन घुसा घुसाकर उसके गड्ढे को कुरेदता हूँ। उसके मुँह से कुछ अटपटी ऍं ऑं की सी आवाजें आ रही है। साथी अगर स्वरयुक्त हो तो क्या बात है ! उसकी कमर की हरकत बढ़ती जा रही है।
अब अगला कदम ! मैं अपने हाथों को स्तनों पर से हटाकर कमर के दोनों तरफ लाता हूँ और...
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Last edited by sweta600 : 30th August 2012 at 04:24 PM.

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Post फूलों की खेती UPDATE 4

कुछ क्षणों पहले हाथ भी नहीं लगाने दे रही थी। अभीमस्ती में सराबोर है। मैं और उत्साहित होकर थूथन घुसा घुसाकर उसके गड्ढे को कुरेदता हूँ। उसके मुँह से कुछ अटपटी ऍं ऑं की सी आवाजें आ रही है। साथी अगर स्वरयुक्त हो तो क्या बात है ! उसकी कमर की हरकत बढ़ती जा रही है।
अब अगला कदम ! मैं अपने हाथों को स्तनों पर से हटाकर कमर के दोनों तरफ लाता हूँ और पैंटी की इलास्टिक में उंगलियाँ फँसाकर नीचे खींचता हूँ। वह धीरे से कमर उठाती है। उसकी सहमति गुदगुदाती है। मैं नीचे हाथ घुसाकर चूतड़ों पर से पैंटी सरकाता हूँ। हाथ पर चूतड़ों का मांसल गुदगुदा भार बेहद अच्छा लगता है। उसकी हाँफती साँसों की ताल पर चूत थिरक रही है। मैं रोमांच में डूबा धीरे धीरे चूत की वेदी पर से पैंटी खिसकाता हूँ। यह एक बेहद गोपनीय, बेहद महत्वपूर्ण क्षण है। सर्जन के आपरेशन के बीच काक्षण। कोई बेहद गहरी बात, उसकी और मेरी भी जिन्दगी की।
दोनों उत्सुकता के साथ साथ एक पता नहीं कैसी चिन्ता में भी हैं। मैं जैसे उसके मन की हर बात किताब की तरह पढ़ ले रहा हूँ। मैं झुककर पैंटी सरकने से खाली हुई जगह पर हल्के से दाँत गड़ाता हूँ। वह सीत्कार भरकर कमर उचकाती है। मैं उसके दोनों पाँवों के बीच से निकलकर एक तरफ आ जाता हूँ और फैले पैरों को दोनों तरफ से उठाकर समेटने की कोशिश करता हूँ। मस्ती में डूबी होने के बावजूद वह हिचक रही है। मगर ज्यादा नहीं।
मैं पैंटी को खिसकाकर घुटनों पर ले आता हूँ। चूतपर ढोलकी की चमड़ी की तरह तनी पैंटी घुटनों पर आकर ढीली पड़ गई है। उसकी लुचपुच कोमलता को महसूस कर मेरा लिंग बेचैन होकर पेट पर सिर के पीछे से धक्के मारता है। मैं पैंटी की बीच की भींगी पट्टी को मुट्ठी में कस लेता हूँ। छककर इस रस का पान करुंगा। पुष्पा के पुष्प का शहद!
मैं पैंटी सरकाकर टखनों पर लाता हूँ और उसके छेदोंसे पाँव बाहर निकालता हूँ। वह विरोध नहीं करती। वह बेकरार है। मगर अभी मैंउसे तड़पाऊँगा।
मैं नीचे पैरों की तरफ बढ़ जाता हूँ। बारी बारी से उसकी एड़ियाँ चूमता हूँ। उसके पाँव खिंचे हैं। वह मुझे ऊपर मुख्य केन्द्र पर देखना चाहती है। मगर मुझे हट गया देखकर उसके पैरों का तनाव घटता है। मैं धीरे धीरे पिण्डलियों की ओर आता हूँ। उसके त्चचा की एक अलगही गंध है। जीभ से उसे चाटता हूँ। हल्का-सा नमकीन स्वाद, हवा में खुश्की के बावजूद गर्म बदन से निकला पसीना।
मैं चूमते हुए उसके पैरों को एक दूसरे से अलगाता जा रहा हूँ। उसके घुटने की भीतरी सतह पर गंध और स्वाददोनों तीव्र हैं। मैं धड़कते हुए ऊपर भीतरी जांघों की ओर बढ़ता हूँ। उसके पाँव उम्मीद में थरथरा रहे हैं। 'उस जगह' पर मुँह लगाते ही मानों उछल पड़ेगी। मुझे सावधानी से आगे बढ़ना है। अभी झड़ने नहीं देना है।
मैं हाथ बढ़ाकर उसके स्तनों पर फिराता हूँ। फुनगियाँ उसी तरह खड़ी हैं। हथेलियों से उन्हें उनके मांस में दबाते हुए हल्के हल्के सहलाता हूँ। भीतरी जांघों पर से मेरे होंठ ऊपर सँकरे होते कोण की ओर सफर कर रहे हैं, वह जांघें फैलाकर मुझे पहुँच दे रही है। वही गंध, किसी उम्दा सेंट की भीनी खुशबू।
मैं कुत्ते की तरह सूंघता उसकी ओर बढ़ा जा रहा हूँ। ऊपर मेरे दोनों हाथ उसके स्तनों को लगातार मीठे मीठे मसल रहे हैं। कोण के शिखर के नीचे चूतड़ों के दबने से उभरे मांस की गद्दी को चूमता हूँ। उनके ऊपर चूत का फूल रखा है जिसकी डंठल नीचे गुदा की छेद की ओर जाती है।
पुष्पा वहाँ झुके मेरे चेहरे को टटोल रही है- रोकती हुई, और नहीं रोकती हुई।
मैं उसकी संकोच मिली संकोचहीनता पर उस क्षण भी रीझता हूँ।
मैं उसके पैर घुटनों से मोड़कर आखिरी सीमा तक फैला देता हूँ।
उत्कण्ठा से उसकी साँस रुक गई है।
मेरा सिर गंतव्*य के सामने है- पुष्पा का पुष्प : अंधेरे में सूरजमुखी के फूल की तरह खिला हुआ। जांघों के फैले पत्तों के बीच रखा मधु का दोना!
मैं दोने में मुँह लगाने से पहले उसके किनारों को होंठों से टटोलता हूँ। मधु डबडबा रहा है। मैं दोनों तरफ से अंगूठे से खींचकर दोने को चौड़ा करता हूँ। जीभ बढ़ाकर उसकी दीवारों को टोहता हूँ। पहले एक तरफ, फिर दूसरी तरफ। बेहद फिसलनदार, मधु से चिकनी चिपचिपी...
थोड़ा सा स्वाद जैसे मेरी भूख बढ़ा देता है। जीभ चौड़ीकरके उस पूरे दोने ढँकते हुए अंदर उतर जाता हूँ। भीतर की बेहद कोमल जेली जैसी सतह पर जीभ फिसलती है। मैं रिसते मधु को जीभ पर एकत्र करता हूँ और ऊपर ले जाकर चूत के बालों में फैला देता हूँ। रास्ते में नन्हीं कली खुरदरी जीभ की रगड़ से गनगना उठती है। उसके गले से हँक हँक जैसी मोटी आवाज निकलती है। दोनों तरफ के होंठ रक्त से भरकर फूलकर गए हैं।
पूरी चूत जैसे अपनी ही चाशनी में रसगुल्ले की तरह फूली है। मैं उसे रसगुल्ले की ही तरह मुँह फाड़कर अंदर लेते हुए चूसता हूँ। मोटे भगोष्ठों को बारी से मुँह में खींचकर संतरे की फांक की तरह चूसता हूँ। उनमें हल्के हल्के दांत गड़ाता हूँ। दांत का गड़ाव से दर्दऔर दर्द पर उमड़ती आनंद की लहर में वह पछाड़ खा रही है। उसका रस बह बह कर निकल रहा है जिसे मैं प्यासे कीतरह चूसे जा रहा हूँ।
जीभ की नोक नुकीली करके कटाव में घुसकर ऊपर से नीचे तक लम्बाई में जुताई कर रहा हूँ। भीतर की जेली जैसी सतह को जीभ की खुरदरीसतह से दबा दबा कर सरेस की तरह रगड़ रहा हूँ। इस कोशिशमें जीभ योनि की छेद में घुस घुस जा रही है। वह पागल हो रही है... आह.... ओऽऽऽऽ.ह... जोर जोर कमर उचकारही है।
मैंने उसकी हरकत को नियंत्रित करने के लिए उसकी जांघों को अपनी बाहों में जकड़ लिया है। वहशिखर के करीब पहुँच रही है। मैं उसे जकड़े रखकर उसकी योनि के छेद पर मुँह जमाता हूँ और जीभ नुकीली करके एकदम घुसा देता हूँ।
"अरे ... "अरे... वह हक्की बक्की सी रह गई है।
जीभ की खुरदरी सतह योनि केअंदर की दीवारों को खुरच खुरचकर उसका रस निकाल रही हैं। मैं उसे और चकित कर देता हूँ...
उंगली से उसके गुदा का उत्तप्त छेद टटोलता हूँ और उसको गुदगुदाता हूँ। साथ ही नाक की नोक से कटाव के शिखर पर थरथराती नन्हीं कली को कुचल रहा हूँ।
उसका ओह ओह ओह ओह का लगातार मूर्ख-सा उच्चारण....
वह झड़ने के एकदम करीब है।
मैं हमला और तेज करता हूँ।योनि पर से मुँह हँटाकर उसकी भगनासा को होंठों में कस लेता हूँ और योनि में उंगली गड़ा देता हँ और छुरे की तरह बार बार घुसाकर वार करता हूँ। दूसरे हाथ की उंगली उसकी गुदा के छेद में चुभोए हूँ। एक साथ इतने सारे हमले से वह हड़बड़ा-सी गई है। तेज उठे आनंद का झोंकाउसे शिखर के पार फेंक देताहै। उसे जैसे कोई दौरा पड़ गया है। वह जोर जोर कमर उचका रही है। उसके हाथ मेरे सिर को जोर से दबा रहे हैं..... पेडू की हड्डी पर मेरे होंठ कुचल रहे हैं।
मैं आखिरी वार करता हूँ.... उसकी भग्नासा को होंठों में उठाकर हल्के से चबा लेता हूँ, और वह यह जा वह जा.... ओऽऽह... ओऽऽऽह... आऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽह... मानों उसका बांध टूट पड़ा है, उसे एक दौरा-सा आता है और वह कमर एकदम धनुष की तरह उठा देती है। .... रस की बरसात।
मैं पागल-सा चूसे जा रहा हूँ, मेरा मुँह, मेरी नाक, मेरी बंद पलकें सभी उसके हाथों के दबाव के नीचे चूतपर मसल रहे हैं। मेरा दम घुट रहा है।
एक जोर की थरथराहट के बाद वह गिर जाती है और उसका हाथ मेरे सिर पर ढीला हो जाता है। मैं साँस लेने केलिए ऊपर उठता हूँ। वह झड़ रही है।
किसी खून पिए शेर की तरह सिर उठाकर चमकती ऑंखों से इधर उधर देखता हूँ, वह निश्चल पड़ी है।
आनन्द का सैलाब उसे बहाकर दूर ले गया है। वापस आने में देर लगेगी।
मुझे एक जीत की सी खुशी होती है। ऐसे आनंद की उसनेकल्पना भी नहीं की होगी। किसी और से सेक्स करने पर भी। मुझे पक्का लगता है इतना तीव्र आनंद और किसी ने दिया नहीं होगा।
मैं चुप लेटा इंतजार कर रहा हूँ। फिर अजीब तरह से एक फालतू होने का भी एहसासहोता है। पुरुष इससे आगे नहीं जा सकता। वह डूबी है, मैं किनारे ऊपर बैठा, व्यर्थ। मैं धीरे धीरे उसके एक तरफ आ जाता हूँ।
यही लड़की है, मैं उसे अंधेरे में देखता हूँ। मेरी कामनाओं की ज्वाला, कितनी लंबी और गहरी आकांक्षों का लक्ष्य। मैं कितनी तीव्रता से इसे भोगने के सपने देखता रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ वह मेरे लिए चाय बनाकर लाई है, वह दिनभर के काम के बाद थककर आई है और मैंने उसे छककर चोदकर सुला दिया है..... वह नीचे से एक तरफ से ब्लाउज उठाती है और फूले फूले भूरे काले चुचूक को बच्चे के मुँह में देकर ऑंचल से ढक देती है..... मेरी बहन से ननद-भाभी की फुसफुस बातें कर रही है .....
मैं क्या क्या सोच रहा हूँ! ऐसे समय में ?
विचित्र है। मुझे आश्चर्य हुआ, कब वह मेरी पत्नी संबंधी कल्पनाओं के केन्द्र में आकर बैठ गईथी?
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THIS IS ONE OF COPY STORY . SO PLZ DONT COMMENT ANY "CHAPLUSI" OR "BICH ME UNGLI" THAT "YE COPY HE". story ka origional writer RIJAWANA he.

Last edited by sweta600 : 30th August 2012 at 04:27 PM.

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अभी तक तो मेरा उद्देश्य बस मजे लेने तक का था। लेकिन क्या यह मानेगी? मुझसे बेहतर स्टेटस की है। मेरी इच्छा हुई कि आज इसे इतना संतुष्ट कर दूँ कि यह मुझे चाहने ही लगे, पति के रूप में मेरी छवि को ना नहीं कर सके।
मगर क्या यह भी इतनी गम्भीर है? आज सिर्फ मजे के लिए आई है या कोई गहरी इच्छा भी है?
पता नहीं। छोड़ो, ये सब बातें अभी सोचने का समय नहीं।
कुछ पलों में वह चैतन्य होती है। एक लम्बी साँस कीआवाज। सिर घुमाकर मुझे अंधेरे में ही देखती है औरमेरे चेहरे को हाथ में लेकर मेरा मुँह चूम लेती है। कृतज्ञता में। मेरे मुँह पर उसे अपनी योनि के रस का स्वाद मिलता है। वह फिर चूमती है। फिर फिर अपने को मेरे मुँह पर चखतीहै। उसकी कृतज्ञता मुझे गहरा संतोष दे रही है। क्या उसने पहले खुद को चखाहै? हो सकता है, खुद से हाथ से करती हो, की ही होगी। बेहिचक लड़की है, आजादी पाईहुई, अपने से करना कौन बड़ी बात है। मुझे इच्छा हुई उसवक्त उसे देखता। झड़ते वक्त उसका चेहरा कैसा लगता है....
मैं इस वक्त इतना सोच क्यों रहा हूँ?
वह मुझे चूमते हुए ऊपर आ गई है। मेरी छाती पर के नन्हें स्तनाग्रों को मुँह में लेकर जीभ से गुदगुदा रही है। मेरा ही अनुकरण कर रही है। मुझे गुदगुदी हो रही हैं। मैं उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरता हूँ। पेट और नाभि परउसके चुम्बनों से मुझे और गुदगुदी होती है। मैं उसके बालों में हाथ फेरता हूँ। मेरे पेट के नीचे उसकी उंगली का नाखून हल्के से गड़ता है और चङ्ढीनीचे खींचे जाने का एहसास होता है। मैं कमर उठाता हूँ। वह एक एक कर उसे दोनों पैरों से बाहर निकाल देती है।
उसका हाथ सकुचाता हुआ सा लिंग की ओर बढ़ता है। इतनी देर में वह मुलायम पड़ने लगा था। मगर अब उत्सुकता में सिर उठाता है। वह उसे उंगलियों की नोक पर थाम लेती है, घुमाकर मानो अंधेरे में देखती है। उसका हाथ पड़ते ही वह तेजी से जाग रहा है। वह उसकी जड़ के पास के बालों को हल्के हल्के खींच रही है। कुछ क्षणों बाद उन बालों में एक गर्म साँस भर जाती है। आसपास चूमने की सुरसुरी होती है।
क्या यह भी बदला चुकाएगी? मैं उत्सुकता और गुदगुदी से भर जाता हूँ,... शायद अब लिंग को मुँह में लेगी।
कल जब उसने काँटे को मुँह में ले लिया था तब से उसकी कल्पना मन में घूम रही है।मगर वह देर कर रही है, शायद हिचक रही है। मन करता है स्वयं पकड़कर उसके मुँह में घुसा दूँ, मगर उसके लिए इतनी कोमलता का भाव मेरे मन में है कि उस पर किसी तरह की जबरदस्ती करने की हिम्मत और इच्छा नहीं होती।
वह लिंग को मुट्ठी में कसेऊपर नीचे सहला रही है...... हरहरकत के साथ उत्तेजना की तरंग उठती है। वह उसे थपेड़े देती है और वह स्प्रिंग की तरह बार बार तनकर सीधा खड़ा हो जाता है।वह कुछ बुदबुदा रही है ...
पर मैं आनंद की लहरों में कुछ सुन नहीं पाता। बस एक ही आतुरता है- वह उसे मुँह में ले ले।
नीचे उतरकर जांघों को चूमती है।
नहीं करेगी?
इतनी खुली लड़की होने के बावजूद उसे उसको मुँह में लेने मे संकोच है?
मेरा लिंग दहाड़ रहा है। मैं उसे चोदने के लिए लिटाना चाहता हूँ। मगर वह छुड़ाकर उठ जाती है।
''वेट ए लिटिल'' (थोड़ा ठहरो)... पहली बार सुनने की आवाज में बोली।
मैंने गौर किया कि उसकी आरंभिक लज्जा अब जा चुकी है। शायद अपनी योनि को मेरे मुँह के हवाले करने के बाद उसके पास लजाने के लिए कुछ बाकी नहीं रहा। वहमेरे लिंग के मुँह की त्वचा को नीचे खींच रही है। खिंचती हुई चमड़ी दर्द करती है और अंतत: लिंग की गर्दन पर आकर फाँसी की रस्सी की तरह कस जाती है। लिंग जैसे उसकी बंधन में दम घुटकर धड़क रहा है।
मैं उस दर्द और उत्तेजना की लहर को जज्ब करने की कोशिश कर रहा हूँ। तभी लिंग के मुँह पर कुछ कोमल गर्म भींगा हुआ-सा टकराताहै और 'पुच' की आवाज सुनाई पड़ती है। अरे! मेरा लिंग चकित-सा खड़ा रह जाता हूँ। अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा। इस अनुभव को उसने जाना नहीं था। धीरे धीरे कोई गर्म गीली लिहाफ उस परसरकती हुई उसे अंदर ले रहीहै। उसकी तहों के भीतर लिंग जोर जोर धड़क रहा है; मैं उसकी धड़कन साफ सुन रहाहै। हर धड़कन मुझे कहीं और दूर फेंकती हुई असहाय करती जा रही है। लिंग के नन्हे से मुख पर जीभ फिराने की गुदगुदी होती है।
धीरे धीरे वह वे तहें उसे अपने में कस लेती हैं, उसे चूसती हैं। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।
मेरा एक हाथ उसकी जांघों और मुड़े पैरों के बीच दबा है जहाँ मेरी खुशी से उंगलियाँ चपचप भींगी चूत के नए नए परिचित हुए इलाकेमें भटक रही हैं। मैं उसकीयोनि के अंदर उंगली फँसाकर उसे अपनी ओर खींचता हूँ। वह लिंग को मुँह के अंदर लिए लिए कमर मेरी ओर सरकाती है फिर कुहनियों पर भार लेकर एक टांग मेरी छाती पर चढ़ा देती है। मैं उस टांग को खींचकर अपनी दूसरी तरफ रख लेता हूँ और नितम्बों को पकड़कर छाती के बीच में सेटकरता हूँ। उसकी औंधी चूत मेरी छाती चूम रही है।
अंधेरे में उसका पूरा पृष्ठ भाग मेरे सामने है। नहीं देख पाकर भी कल्पना में प्रत्यक्ष देख रहा हूँ- मसनद के तने किनारों जैसे गोल, गोरे और चिकने नितम्ब, उन्हें बाँटती हुई घाटी जो नीचे जाती हुईगहरी हो रही है, फिर और नीचे जाकर चूत के दबे होठों के बीच पतली होकर खोरही है। रहस्यों को दबाए बहती नदी।
मैं दोनों गोलाइयों पर हाथ घुमाता हुआ दबाता हूँ। चिकनेपन और गुदगुदेपन का मांसल पुंज। मैं शरारत से उन पर चपत मारता हूँ। चोट खाते ही वे भिंचकर मेरी छाती परदब जाते हैं। नीचे मेरा लिंग उसके मुँह में ऊभ चूभकर रहा है। अभी मुझमें थमने की क्षमता है।
मैं सिर के नीचे तकिए को दुहराकर लगाता हूँ और उसकी कमर को अपनी तरफ खींचता हूँ। वह धीरे धीरे नीचे सरकती है। एक जांघ मेरा गाल छूती है, फिर दूसरी जांघ। मैं कमर पकड़कर निर्देशित करता हूँ। मेरी नाक गुदा के छेदपर दस्तक देती है। आज तुम मेरी सर्वांग प्रेमिका हो, आज तुम्हारा कोई अंग मुझे अप्रिय नहीं।
लिंग पर बरसते प्यार की कृतज्ञता में मेरा रोम रोम डूबा है। मैं हाथों सेदिशा देता हूँ। चूतड़ों के बीच की दरार मेरी नाक की उठान पर सेट हो जाती है और मेरा मुँह सीधे चूत के मुँह पर आ लगता है, जिसके पल्लों को मैं दोनों तरफ से अंगूठों से खींचकर फैला देता हूँ। भीतरी कोमल चूत से मेरे होंठों का संपर्क होते ही वह चूसना छोड़कर ठहर जाती है। कुछ क्षण रुककर उसके होंठ फिर मेरे लिंग पर कस जाते हैं। मैं उसके कूल्हों को बाँहों में बांधकर अपने पर दबा लेता हूँ।
आनन्द की इस अवाक् घड़ी मेंशब्द नाकाफी हैं। गनगनाती लहक में जलते दो तन। तूफान में पछाड़ खाती नाव में दो सहयात्री।
वह लगभग पूरा भार देकर चूतको मेरे मुँह पर जोत ही रही है और मैं नीचे उसके भार में कुचल ही रहा हूँ। रस की लसलसी छलछलाती फिसलन में दबकर घुटते दम के बीच किसी तरह साँसों काजुगाड़ करता हूँ। मेरे लिंग की गर्दन पर उसके दाँत शेर के जबड़ों में फँसी हिरन की गर्दन की तरहकसे हैं। उसकी छोटी चिरी हुई मुँह पर से रक्त रिसनेलगा है जिसे खुरदरी जीभ कुरेद कुरेदकर चाट रही है। अब उसके बचने की उम्मीद नहीं। मैं भी अब अपनी लगाम छोड़ चुका हूँ। अब खुद को रोकना नहीं।
अब दम टूटता है। हिचकियों में प्राण निकल रहे हैं। चिरी हुई मुँह से रक्त के बलबले छूट रहे हैं। आह.... ऊऽऽह....। गर्म लिहाफ की-सी तहें रक्त गटक रही हैं। चूत मेरे खुले मुँह पर यूँही फिसल रही है, मैं जड़ हूँ। वह जोर जोर से चूसकर और झड़ने के लिए कोंच रही है। वह जैसे उत्साह में आकर और जोर लगाकर रस उगलताहै, मैं चकित होता हूँ, कितनी देर तक! वह खींच खींचकर आखिरी बूंद तक निचोड़ लेना चाहती है।
अंत में लिंग के पूरे टयूबको होठों के दबाव से सिसोहती हुई निकल जाती है।
अद्भुत है यह! कभी जाना नहीं था। स्वर्गिक! ओ पुष्पा, आई लव यू। इतनी गहरी आंतरिकता, इतना आनंद तो मैंने ऋचा के साथ संभोगकरके उसका कौमार्य भंग करके भी नहीं पाया था !
मैं कृतज्ञता से भरकर उसके चूत की खुली कोमल तहों को बार बार चूमता हूँ। यह पुष्प बेमिसाल है। जीभ घुमा घुमाकर उसके दीवारों से रिसते मधु को चाटता हूँ।
मेरी इस हरकत से वह फिर गर्म होती है, मैं फिर सक्रिय होता हूँ। योनि में जीभ घुसाकर गुदगुदी, ठुड्डी की सख्त नोक पर भगनासा की कली की कुचलन, नीचे दोनों हाथ बढ़ाकर उसके स्तनों को मसलना, चूचियों को चुटकियों में दबाना.....। इस बार वह थोड़ी देर बाद चरम सुख प्राप्त करती है, पहली बार की तरह बड़ा नहीं, उससे छोटा, मगर बहा ले जाने लायक काफी। वहजांघें मेरे गाल पर कस लेती है। मैं अपनी हरकतें तेज कर देता हूँ।
नितम्बों के शिथिल होने पर मैं ठहर जाता हूँ। उसकेरस और गंध में डूबा इंतजारकरता हूँ।
वापस लौटने पर वह मुझ पर से खिसक जाती है। मैं गहरीसाँसें लेकर दम लेता हूँ।
काफी देर हो गई है। शायद उसे भी समय का होश हुआ है। वह उठती है। बिस्तर से जाना चाहती है। मैं उसे रोकता हूँ। अभी असली काम तो बाकी है।
पर वह प्यार से ही छुड़ा लेती है,''नहीं, अब जाने दो।''
वह मुझे स्नेह से चूमती है। वीर्य से भींगे होंठों का नमकीन स्वाद और तीखी गंध....
''मगर अभी तो...'' 'संभोग' शब्द मेरी जबान पर अटक जाता है।
"सबकुछ आज ही? उसकी हलकी हँसी जैसे उसके जाने की अनिवार्यता को घोषित कर देती है।
मैं उसे रोक नहीं पाता। वहबाथरूम चली जाती है।
मुझे खाली-सा लगता है। जैसे कहानी बगैर समाप्त हुए ही समाप्त हो गई हो। अब चली जाएगी। मिलने की यहघड़ी समाप्त हो जाएगी। मेरा मन उमड़ता है, 'फिर पता नहीं कब...'
अंधेरे में भी वह जाने कैसे कपड़े पहन रही है। मैंउसे टटोलकर उससे सट जाता हूँ। उसकी हथेली मेरी पीठ पर थपकी देती है। मैं कहनाचाहता हूँ, 'आई लव यू’ पर जैसे यह बात कह देने से छोटी हो जाएगी। पता नहीं यह लव है या सिर्फ वासना! धुंधली छाया में वह मुझे रहस्यमय, बड़ी और इज्जत के लायक लगती है, यह सब होने के बावजूद। लाख रोकने के बावजूद भीतर से खींचकर आँखों में एक बूंद इकट्ठी हो जाती है। मैं अपनी भावुकता को डाँटता हूँ। क्या मैं सचमुच उसे प्यार करने लगा हूँ?
'लेट मी गो।' वह आखिरी चुम्बन लेती है। साँसों में साबुन की ताज़ा गंध है।
दरवाजा खुलता है और उसके फ्रेम में उसकी धुंधली छाया दिखती है फिर गायब होजाती है। मैं उसके पार धुंधले कोरे आकाश को देखता रह जाता हूँ।


THE END
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Last edited by sweta600 : 30th August 2012 at 04:29 PM.

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