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किस्मत का खेल

हल्लो दोस्तो कैसे हैं आप सब दोस्तो आपके लिए एक ओर मस्त कहानी लेकर हाजिर हूँ कहानी कुछ ज़्यादा ही लंबी है इसलिए इसके काफ़ी पार्ट बनाने पड़ेंगे . अब आप कहानी का मज़ा लीजिए कहानी कुछ इस तरह शुरू होती है ...............
आज उसे नींद नही आ रही थी. वो करवटें बदल रहा था. आज उसकी जैल की आखरी रात थी. कल का सूरज उसके लिए मुक्ति का सूर्योदय लेके आनेवाला था. उसकी आँखे चारो ओर घूमी और मन ही मन मे आजूबाजू की खोली का निरीक्षण किया. उसने महसूस किया उसके अलावा सब खर्राटे भर रहे है. मानो किसिको किसीकि पड़ी ही नही. बास्केट मे पड़े हुवे सादे फल की तरह सब को एक कोठरी मे लगाया हुवा था. वो अकेला ही था अपनी अकेली कोठरी के साथ. वो अकेला था जिसकी आँखो से आज कई साल के बाद नींद गायब थी. उसे याद आया जैल यात्रा के पहले पाँच साल. बहुत यातना सही थी उसने शुरुआत के सालो मे. बहुत मार खाई थी, गालिया सुनी थी, लाते खाई थी. थर्ड डिग्री का भी प्रयोग उस पर किया गया था. लेकिन जिगर था ना, सही मे उसकी 36 की छाती थी जो उसे सबकुच्छ सहन करने पर मुस्ताक़ थी. पहले तो उसको सब क़ैदी के साथ रखा गया था. रात, रात भर अलग अलग क़ैदी के खर्राटे की आवाज़े, पसीने की गंध, कोई कोई तो वोही कोने पे दीवार पर मूत देता था, वो सहन ना होने वाली बदबू, मैली चादर, मैली चटाई. पहले 7 दिन उसे नींद नही आई थी. तब तो उस पर थर्ड डिग्री का प्रयोग भी शुरू नही हुवा था. लेकिन महॉल नया था और वो भी अलग समाज, अलग आदमी, अलग अंदाज़.

लेकिन 7 दिन बाद वो थका भी था और उसकी 6थ सेन्स ने जवाब दे दिया था कि यहा वो लंबी यात्रा करनेवाला है तभी थकान से, मजबूरी से, भरपूर नींद मे डूब गया था. धीरे धीरे उसे आदत हो चली थी क़ैदी ओ की, गंध की, बदबू की, खर्राटे की..

अचानक उसके सामने कई सालो के बाद अंधेरा च्छा गया. जैसे चक्कर से आने लगे. वो सिर दोनो हथेली से कस के दबाकर अपने दोनो पैर के घुटनो के बीच सिर लेगया याने सिकुड़कर सो गया. थोड़ी देर यू ही पड़ा रहा, तभी धीरे धीरे उसकी आँखो के सामने सूर्योदय का प्रकाश होने लगा और एक संत महात्मा दिखाई दिए, और थोड़ी देर के बाद एक औरत के नंगे स्तन, छाती दिखाई दी. और फिर सबकुच्छ ठीक हो गया. खुली आँख से ही ये नज़ारा वो हमेशा देखता था लेकिन अंत मे मानो जैसे नींद से उसकी आँख खुल रही हो ऐसा एहसास होता था.

ये उसके साथ पहलिबार नही हुवा था. अक्सर हुवा करता था. लेकिन आज करीब 5 साल के बाद फिर उसके साथ ऐसा हुवा था. करीब बचपन से उसके साथ ये हुवा करता था.

1. पहले आँखो के सामने गहरा अंधेरा छा जाता था.
2. फिर एक लंबे संत, साधु महात्मा दिखते थे, लंबे बाल, लंबी दाढ़ी, मुस्कुराता हुवा चेहरा.
3. और अंत मे एक औरत की खुली छाती, स्तन दिखाई देता था.

उस औरत का नही तो चेहरा दिखता था नही तो पेट से नीचे का हिस्सा. सिर्फ़ स्तन दिखाई देते थे. वो भी कोई औरत सोई हुई हो और उसके स्तन के निपल्स तनकर खड़े हो ऐसी मुद्रा मे वो हरदम देखता था. बचपन मे तो उसे खास पता नही चलता था. लेकिन 12 साल के बाद उसे मालूम हुवा के अंत मे जो वो देखता है उसे स्तन कहते है.

वो खड़ा हुवा, चलकर दो कदम आगे आया, उसकी खोली मानो एक छोटा सा कॉटेज था. एक आम आदमी आराम से रह सके ऐसी सुविधा उसे पिछछले 5 सालो मे दी गयी थी. 20/22 फीट की चौड़ाई वाली खोली, एकदम धूलि हुई और रोज बदलने वाली बिस्तर, चदडार, ठंडा पानी, पंखा, एक बड़ा सा विंडो जो अंदर के बगीचे मे खुलता था ताकि ताजी हवा और बगीचे के फुलो की खुसबूदार हवा आती जाती रहे. अच्छा खाना उसे मिलता था. इसके अलावा आने जाने वाला हर कोई आदमी उसकी ज़रूरत पुछता था, लेकिन उसने कभी कुच्छ ख्वाहिश बताई ही नही. क्यो कि वो जानता था की सुविधा देनेवाला स्टाफ कही से पैसा ख़ाता था और कोई तो था उसका दोस्त या दुश्मन जो पैसे देकर उसे ये सुविधा पहुचाता था. उसका पहला 5 साल जिस यातना मे गुजरा था उसकी बिल्कुल उल्टा लास्ट 5 सालो मे उसे VईP ट्रीटमेंट दी गयी थी. उसे कुच्छ अजीब बिल्कुल लगा था लेकिन उसकी 6थ सेन्स उसे आगाज़ कर रही थी कि शायद उसके साथ यही होनेवाला था. जैसे सूर्योदय के बाद सूर्यास्त निस्चित है. वैसे पहले 5 साल अंधेरे के बाद आखरी 5 साल सूर्योदय था और ना जाने कल से फिर उसके साथ क्या होने वाला तय था. उसकी दो हाथो से खोली के सलाखे पकड़ी और चेहरा सलाखो के बीच सटाया और दाहिनी ओर नज़र घुमा के दीवार की घड़ी को देखा, अभी तो रात के 3 बजे थे. यानी की सुबह मे 3 घंटा बाकी थे. उसने चक्कर काटना शुरू किया, नींद आँखो से कोसो दूर थी. कल मुक्ति का दिन था या फिर कोई नयी कहानी शुरू होने वाली थी, ये वो नही जानता था. हा उसका मन ज़रूर कहता था की ज़िंदगी मे आनेवाला या तो कल से शुरू होनेवाला समय कुच्छ समय के लिए काँटे की टक्कर होनेवाला था. शायद इसीलिए किसीने ने उनको आखरी 5 साल VईP ट्रीटमेंट दिलाई थी. उसने कई बार जानने की कोशिश की थी की वो कौन है जो उस पर इतना मेहरबान हो रहा है. लेकिन कुच्छ जान नही पाया था. फिर उसने कोशिश छ्चोड़ दी थी. आराम से वो ट्रीटमेंट सहता रहा और मुक्ति का इंतेज़ार कर रहा था. कल करीबन 12 साल के बाद उसकी ज़िंदगी का सूर्योदय होना था.

.जी हा अपनी ज़िंदगी, जवानी के 12 साल उसने यहा काटे थे, बिताए थे. जब जैल मे उसको लाया गया था तब उसे पता था उसकी उम्र 22 साल की थी. बाद मे तो साल का, महीने का, तारीख का तो उसे पता ही नही चलता था, लेकिन उसे 15 साल की जैल हुई थी. बाद मे गुड कॅरक्टर की बदौलत उसकी सज़ा 3 साल कम कर दी गयी थी. वैसे तो आजीवन कारावास ही सज़ा तय थी. लेकिन याद आई उसे नीशी, जिसकी वजह से उसकी सज़ा कम करके 15 साल और बाद मे 12 साल की हो गयी.

उसे याद आई नीशी, उनकी दोस्त, बेंगाली टाइग्रेस थी वो. पूरा नाम था नीशी सेन, उसके पिताजी एक बड़े आड्वोकेट थे. नीशी के कहने पर ही आड्वोकेट मिस्टर. सेन ने उसका केस लड़ा था और सज़ा कम करवाई थी. उसे कई बार नीशी याद आई थी कि वोही है जो उसको VईP ट्रीटमेंट दिला रही थी. लेकिन फिर उसे लगता था कि अगर देनी ही थी तो पहले से VईP ट्रीटमेंट देती, आखरी पाँच सालो मे ही क्यो ? वैसे भी केस का फ़ैसला होने के बाद न नीशी कभी मिलने नही आई, उसे बात पता चली थी की उसके पिताजी ने उसको मिलने से मना कर दिया था. वो ये बात समझता भी था की एक अकेली लड़की उसे मिलने आए वो ठीक भी नही. इसीलिए उसकी 6थ सेन्स उसे ये मान ने पर मजबूर कर रही थी की वो नीशी नही हो सकती जो उसे VईP ट्रीटमेंट दिला रहा था या थी.

उसके दूसरे दोस्त भी कोई मिलने नही आए क्यो कि कोई इस मिशन मे मारा गया था, कोई पागल हो गया था और कोई दगाबाज़ हो चला था.

उसकी आँखो मे खून उतर आया जब उसे साजन की याद आई, उसकी मूह से गाली निकल पड़ी, एक साजन के मामले मे उसकी 6थ सेन्स दोखा दे गयी थी. उसे समझने मे सब ने बड़ा धोखा खाया था. कोर्ट मे साजन ने रंग बदला था और सब कुच्छ पलट गया था. उसकी जैलयत्रा का सूत्रधार ही साजन था. साजन ने उसे फसाया था. और वो आबाद उसकी जाल मे आ गया था. फिर भी आड्वोकेट सेन ने मोस्ट ऑफ गुनाह उसके मरे हुवे दोस्तो के नाम लगा दिए थे. ता कि उसे कम से कम सज़ा हो. लेकिन फिर भी उसे लगता था के अगर साजन चुप रहता तो शायद किसी को मुसीबत नही होती.

उसका गला सूखा, उसने पानी पिया और गले की खर्राहट मिताई, आँखो मे दो बूँद आँसू आए थे. वो फिर जा के बिस्तर पर लेट गया. थोड़ी देर मे उसे नींद आने लगी. लेकिन आधे घंटे मे फिर उसकी आँखे खुल गयी. आज उसी जैलयत्रा जिस वजह से हुई थी वो पूरा कांड जैसे हिन्दी चित्रपाट की तरह उसकी आँखो के सामने चल रहा था..

जैसे को हिन्दी फिल्म मे पहले नंबर आते है, उसी तरह उसे कॉलेज, कॉलेज कॉंपाउंड, कॉलेज कॅंटीन, क्रिकेट ग्राउंड, खुद की धुआधार बॅटिंग, कॉलेज का जितना, सचिन तेंदुलकर की बॅटिंग, इंडिया का जितना, समाज सेवक का मिलना, समाज के लिए कुच्छ करने की तमन्ना, पॉलिटिक्स मे योगदान देने की भूख, हिन्दुस्तान के लिए कुच्छ कर मिटने की चाह, एक एनर्जेटिक प्लान, रेवोल्यूशन की आग उठना, उनका मिलना जुलना, बॅंक, बॅंक के लॉकर्स, लॉकर्स मे पड़े हुवे आटम बॉम्ब से भी ज़्यादा ख़तरनाक डॉक्युमेंट्स, स्वामी का आश्रम, आश्रम मे संगीत पे झूमते हुए जेंट्स आंड लॅडीस, स्वामी के पर्सनल कमरे मे झूमती लड़किया, कपड़े उतारती लड़किया, निर्वश्त्र अवस्था मे लड़किया, उनके सब दोस्तो का बारी बारी चेहरा, भागते हुवे लड़के लड़किया, पोलीस की गाड़ी, पिच्छा करती पोलीस, अपने गाव मे आराम की ज़िंदगी, फिर पकड़े जाना, इंपॉर्टेंट डॉक्युमेंट्स के साथ उसका भागना, अपने दोस्त साजन को देना, वो चिठ्ठी, पोलीस कस्टडी, कोर्ट, केस का चलना, सरकारी वकील की दलीले, साजन का रंग बदलना, साजन की ज़ुबानी और उनका खेल समाप्त, थर्ड डिग्री का प्रयोग और जैलर की गंदी गंदी गलिया, सख़्त मजूरी, और फिर आराम की कंफर्टबल जैल वास. फिल्म आगे चलती ही जा रही थी चलती ही जा रही थी और वो गहरी नींद की आगोश मे चला गया. उसे क्या पता था कल से उसकी ज़िंदगी किस मोड़ पे गुजर ने वाली है..जाने कहा ???


फिल्मी रील चल रही थी. समाज क़ैदी को सन्मान की नज़ारो से कभी नही देख पाता. समाज कहता है गुनेहगर हमेशा गुनेहगार ही रहता है. लेकिन जैल मे आकर उसने महसूस किया था की जितने गुनेहगार क़ैदी है उसमे से ज़्यादा लोगो को समाज ने ही गुनेहगार बनाया है. पहले तो उसको भी क़ैदी से नफ़रत होती थी, क्योकि वो खुद अपने आप को गुनेहगार नही समझता था. उसने जो गुनाह किया था वो तो सोच समझकर किया गया आंदोलन था. समाज मे चल रहा पॉलिटिक्स के खिलाफ जंग थी. एक ऐसा रेवोल्यूशन शुरू किया था जिसमे नवभारत का संचार होने वाला था. हाला कि उन्हे पता था की कुच्छ दोस्तो के रेवोल्यूशन से कभी कोई समाज मे परिवर्तन नही आता, कोई देश, समाज का नवसिंचन नही होता, लेकिन फिर भी हालत ऐसे थे कि उनको अपनी आत्मा इस रेवोल्यूशन पर कम करने पर मजबूर कर गयी. एक तरह से उसको या उनके दोस्तो को मानसिक आनंद था कि कम से कम वो लोग तो उस समाज से परे थे जो लोग केवल सहन करना जानते थे, खुद मरना जानते थे. सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत बहोत कम लोग ही जुटा पाते है. वो और उनके दोस्त ने वो काम किया था कि पूरे समाज, स्टेट और देश को हिला दिया था. पॉलिटिक्स के नाम पर राज करने वाले हेवान, या धर्म के मध्यम से अत्याचार करनेवाले कामात्मा से भरे इस समाज को नयी दिशा दिखाने की कोशिश उन्होने की थी. और वो भी सोच समझ कर किया गया एक फूलप्रूफ प्लान, जिसमे ग़लती संभव ही नही थी. और वैसे भी सबकुच्छ हो जाने पर भी पोलीस उन तक 5 महीने तक नही पहुच पाई थी. अख़बार मे भी यही लिखा जाता था की पोलीस हाथ मलकर रह गयी है और क्रांतिकारी हवा मे ओज़ल हो चुके है. बस एक साजन ने ग़लती की और सारा भंडा फुट गया जिसकी सब से बड़ी सज़ा शायद जय किशोरीलाल पुरोहित को मिली थी.


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जय गुजरात के सौराष्ट्रा मे पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बॉर्डर के बीच खड़ा हुवा और सौराष्ट्रा गौरव गिर्नार स्थित जूनागढ़ का रहने वाला एक ब्रामिन था. उसके बाप दादा बरसो पहले रजवाड़े मे राजपुरोहित थे. लेकिन जूनागढ़ के नवाब ने हिन्दुस्तान की जगह पाकिस्तान मे जूनागढ़ स्टेट मर्ज करने की सोची थी. उसकी एक ना चली और सरदार वल्लभभाई पटेल की सतर्कता से आज जूनागढ़ हिन्दुस्तान का हिस्सा है. जय के पिताजी किशोरीलाल तक जयदाद पहुचि तब तक तिजोरी खाली हो चुकी थी. किशोरीलाल ने ब्रामिन का काम शुरू किया और बचपन से ख्वाहिश थी की उसका बेटा एक होनहार साइंटिस्ट बने. क्योकि वो खुद एक अच्छे साइंटिस्ट थे और उनकी पढ़ाई यात्रा अधूरी रह गयी थी. उसकी खास वजह ग़रीबी तो थी ही लेकिन और एक वजह थी. किशोरीलाल के पिताजी यानी जय के दादा श्री नारायण प्रसाद पुरोहित और राजस्थान के जोधपुर के राजघरानेरजपुरोहित श्री गंगाधर साहनी की गहरी दोस्ती थी. लेकिन गंगाधर का जल्द ही स्वरगवास हो जाने से सारी रेस्पॉन्सिबिलिटी नारायण प्रसाद ने उठाई थी. स्टेट के विलिनीकरण के बाद जोधपुर के राजघराने यानी राजपुरोहित की मिल्कत उसके बेटे विक्रम साहनी के पास आई जो इकलौता वारिस था साहनी परिवार का. विक्रम और किशोरीलाल की दोस्ती भी गहरी हुई थी क्योकि दादा परदादा से दोनो परिवार की दोस्ती चली आ रही थी. दोनो परिवार का कार्य समान था और पूरे हिन्दुस्तान मे उसके जैसा पुरोहित कार्य कोई नही कर सकता था. विक्रम साहनी पहले से ही क्षत्रिया के साथ बड़ा हुवा था और खुद का नेचर भी एक सैनिक जैसा था. तो महाराजा ऑफ जोधपुर की मेहरबानी से नारायण प्रसाद की राय लेकर एक राजपुरोहित का बेटा आर्मी मे भरती किया गया. दूसरी वजह ये भी थी की विक्रम मे रजवाड़े की कयि गंदी आदते पहले से पड़ चुकी थी. सुरा, शराब और सुंदरी यानी ट्रिपल स का शौक लग चुक्का था. आप जानते ही होंगे की गुजरात मे दारू बंद है इसलिए और पुराने संस्कार खून मे होने की वजह और जूनागढ़ एक संस्कार नगरी भी है उसकी वजह से किशोरीलाल को कभी ये गंदी आदते नही लगी. तो कुच्छ और काम ना आए लेकिन कम से कम हिन्दुस्तान के काम तो आए यही वजह थी विक्रम की आर्मी जॉइंट करने मे.

जूनागढ़ के पुरोहित परिवार और जोधपुर के साहनी परिवार की दोस्ती गहरी थी. आक्च्युयली किशोरीलाल की एकलौती बहन सुनंदा को विक्रम पसंद भी करता था. लेकिन नारायण प्रसाद को विक्रम के बारे मे थोड़ी बहुत जानकारी थी इसलिए वो कभी इस बात के लिए राज़ी नही होंगे ये विक्रम अच्छी तरह जानता था. उसने भी कभी इस बात को ना तो नारायण प्रसाद को कही, ना तो सुनंदा को या ना तो किशोरीलाल तक पहुचने दी. बस अपना प्रेम मन मे ही रखा.
यहा किशोरीलाल ने साइन्स मे दिलचशपी दिखाई और वाहा विक्रम सुरा शराब और सुंदरी का शौखिन हो गया. लेकिन फिर भी दोस्ती मे कुच्छ दरार नही आई. किशोरीलाल पहले से ही धर्म और साइन्स को साथ मे रखकर चलता था. कोई भी धार्मिक कार्यक्रम का महत्व साइन्स से समझता भी था और लोगो को समझाता भी था.
किशोरीलाल के बारे मे एक ऐसा भी बाते समाज मे चल रही थी की उसने कुच्छ ऐसे साइन्स के इन्स्ट्रुमेंट्स बनाए है की इंडिया का नाम पूरे वर्ल्ड मे छा जाए. लेकिन ये भी कहा जाता था की वो सब इन्स्ट्रुमेंट्स अधूरे है क्योकि किशोरीलाल को पैसे और सरकार की मदद नही मिली और उसने कार्य आधा छ्चोड़ दिया था. सच्चाई सिर्फ़ किशोरीलाल और विक्रम ही जानते थे.
**********
दोनो परिवारो के बीच एकदुसरे के घर अनजाना स्वाभाविक था. जब भी विक्रम जूनागढ़ आता था तब किशोरीलाल उसे अपनी अजीब अजीब सांसोधन की बाते बताता रहता था. गिर्नार की तलेटी के आसपास घाना जंगल है और तलेटी सिटी से 5 कि.मी. दूरी पे है. रास्ता भी उस वक़्त मे खराब हुवा करता था. आजकल तो कई धरामशाला, होटेल्स गिर्नार तलेटी के आसपास हो चुके हे. लेकिन ये बात है 60 और 70 दशक के बीच की. तब रास्ते बिस्मर हालत मे रहते थे. तलेटी के आसपास घाना जंगल यूवा करता था. आजूबाजू कोई वस्ति नही थी. उस तालेटी के आसपास के जंगल मे शहर से दूर किशोरीलाल ने अपनी प्रयोगशाला जमाई थी. छ्होटा सा कॉटेज बनाया था. जूनागढ़ की स्पाज़ एरिया मे येल्लो कलर के बड़े बड़े चूने के पत्थर होते है. वाहा मकान ऐसे पत्थरो से बनाए जाते है. जैसे मकान मे हम लाल कलर की ईत का उपयोग करते है वैसे वाहा ऐसे पत्थर का इस्तेमाल किया जाता है. ये कॉटेज भी ऐसे पत्थरो से बनाया गया था. उपर हरी घास बिच्छाई गयी थी और घास के उपर एक बैठक जैसा बनाया था, ता कि देखने वालो को ये लगे कि ये कोई जानवर का शिकार करने के लिए बनाया गया है. उस कॉटेज मे सिर्फ़ दो कमरे थे. एक सीधा सादा सा बैठने का छ्होटा सा कमरा जिसमे पानी का मटका, एक आराम चेर, एक लिखने के लिए टेबल, छ्होटा सा लॅंप. अंदर के बड़े कमरे मे एक छ्होटी सी प्रयोगशाला खड़ी की हुई थी. जहा तरह तरह के साधन होते थे. किशोरीलाल यहा शाम को 7 बजे तक काम किया करते थे. क्योकि लाइट उस जमाने मे जंगल तक नही पहुचि थी, तो अगर रात को काम करना होता तो बड़ा लॅंप वो साथ मे ले जाता था.

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क्रमशः................


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सच्चाई ये थी की अगर कुच्छ इन्स्ट्रुमेंट पूरे बन जाते तो इंडिया का फ़ायदा कम नुकसान ज़्यादा होता था. खास कर के जब जब विक्रम जूनागढ़ आता था तब किशोरीलाल कुच्छ खास खास बाते उनसे च्छूपाता था. क्यूकी वो जानता था एक शराबी या ऐयाशी ज़िंदगी कभी भी भरोसे लायक नही होती. वैसे वो सब बाते विक्रम से शेर करता था, कुच्छ प्राइवेट बाते भी. लेकिन साइन्स इन्स्ट्रुमेंट्स के बारे मे जब विक्रम कुच्छ अजीब अजीब सवाल पूछता था तब से उसने ऐसी बाते करना कम कर दिया था.
आक्च्युयली विक्रम भी कुच्छ इन्स्ट्रुमेंट्स का फ़ायदा अपने खास मक़सद के लिए करना चाहता था, इसलिए कई बार उसके मूह से उस इन्स्ट्रुमेंट्स के बारे मे जिज्ञासा निकल गयी थी. और शायद विक्रम को भी पता लग गया था कि अब किशोरीलाल सब बाते नही बताता जो की खास हुआ करती हो.
और एक दुर्घटना ने दोनो की ज़िंदगी ही पलट दी

किशोरीलाल की शादी जूनागढ़ की ही लड़की राजेश्वरिदेवी के साथ तय हुई. विक्रम भी शादी अटेंड करने आया. बड़ी सादगी से ये शादी सम्पन्न हुई. शादी के दो दिन बाद नारायनप्रासाद ने तीर्थयात्रा पे जाने का अपना फ़ैसला बताया. लेकिन सवाल ये उठा की अगर किशोरीलाल साथ मे जाता है तो ब्रामिन कार्य करने के लिए एक को वाहा होना ज़रूरी होता है. वैसे भी फॅमिली का गुज़ारा उन्ही पैसो से हुवा करता था. एक महीने की खोट मतलब एक साल की खोट. अंत मे तय हुवा की त्योहार का महीना सावन के महीने मे च्छुट्*टी लेकर विक्रम सब को तीर्थयात्रा पे ले जाएगा. साथ मे विक्रम ने ये भी प्लान बनाया कि रास्ते मे वो सुनंदा से अपने मन की बात करेगा इसीलिए उसने अंकल नारायनप्रासाद को सुनंदा को साथ मे लेने के लिए राज़ी कर लिया. सावन के महीने मे विक्रम जूनागढ़ आया और विक्रम, नारायनप्रासाद, श्रीलेका (नारायनप्रासाद की बीवी), सुनंदा ने तीर्थयात्रा सौराष्ट्रा के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग से प्रारंभ की.

ये बात किशोरीलाल के शादी के 6 महीने के बाद की बात थी. ऑगस्ट 1977 का महीना था. तीर्थ यात्रा शुरू होने से पहले शायद नारायनप्रासाद और श्रीलेखा को उसका प्रसाद जैसे मिला था ये समाचार सुनके की वो अब दादा, दादी बनने वाले है. बहू राजेश्वरिदेवी को 4थ महीना चल रहा था, शायद इसीलिए भी किशोरीलाल साथ मे नही जा पाया. विक्रम साथ था, अपने दोस्त पर पूरा भरोसा था क्योकि किशोरीलाल जानता था की विक्रम के मन मे नारायनप्रासाद के लिए कितना आदर था. एक बात ऐसी नही की नारायनप्रासाद ने बोली और विक्रम ने ना मानी हो. सिर्फ़ सुरा, शराब और सुंदरी के बारे मे नारायनप्रासाद ने ज़यादा ज़ोर नही डाला इसीलिए विक्रम बेफ़िक़रा होकर आगे बढ़ता ही चला गया था. और दोस्ती के नाते किशोरीलाल भी कुछ हद तक चुप रहता था. वैसे भी उनका मिलना साल मे दो तीन बार ही होता था. क्योकि किशोरीलाल अपने काम और साइन्स मे ज़्यादा डूबा रहता था और विक्रम अपने काम मे

एकदिन टेलीग्राम से समाचार आया की कन्याकुमारी मे नारायनप्रासाद और बीवी श्रीलेखा और बेहन सुनंदा का आक्सीडेंट हो गया और उनको बचाते हुवे दोस्त विक्रम बुरी तरह ज़ख़्मी होकर हॉस्पिटल मे अड्मिट है. दो दिन के प्रवास के बाद किशोरीलाल कन्याकुमारी की हॉस्पिटल मे पहुचा, विक्रम की पूरी बॉडी ज़ख़्मी थी, किशोरीलाल को देखते ही विक्रम बहुत रो पड़ा. 10 मिनट के बाद स्वस्थ होकर पूरी कहानी बताई. बातो से पता चला की सुबह के 5.00 बजे कन्याकुमारी के समुंदर किनारे सूर्योदय देखने के लिए वो सबसे पहले पहुचे थे. किसी ने बताया की अच्छी तरह से सूर्योदय देखना हो तो आसपास बिखरी पड़ी चट्टान के उपर से देखो तो अच्छा होगा. इसीलिए वो लोग एक उची चट्टान पर पहुचे. कन्याकुमारी अगर आप लोग मे सेकोई गया हो तो आप को पता होगा की वाहा का समुंदर तूफ़ानी है. अगर आप समुंदर किनारे से स्वामी विवेकानंद राक देखने के लिए बोट मे जाओगे तो बोट ऐसे छलकती है मानो कोई आप को एक मकान के ग्राउंड फ्लोर से अचानक दूसरी मंज़िल पर फेक रहा हो और फिर दोसरि मंज़िल से ग्राउंड फ्लोर पे फेक रहा हो. मतलब समुंदर की लहरे बहुत तूफ़ानी है वाहा. चट्टान पर खड़े हुवे चारो को ऐसी लहरे बार बार च्छू रही थी. अर्ली मॉर्निंग और सावन का महीना, धीमी धीमी बारिश की वजह से चट्टान गीली थी. अचानक नारायनप्रासाद का पैर फिसला और उसका हाथ अचानक श्रीलेखा को पकड़ मे आया, दोनो फिसले और करीब 30 फीट की हाइट से पटके, चिल्लाकर सुनंदा आगे झुकी की उसका भी पैर फिसला उसका कंधा जोरो से विक्रम को टकराया. दो सेकेंड मे हुई इस घटना को कुच्छ समझे इसके पहले सुनंदा का कंधा ज़ोर से टकराने की वजह से विक्रम का संतुलन गिरा और वो दूसरी साइड पे गिरने वाला था. लेकिन केवल दो सेकेंड मे उसने अपने माइंड को संभाला और एक हाथ से सुनंदा को पकड़ना चाहा, सुनंदा अब जो 30 फीट की उचाई से गिरने वाली थी वो और फिसले और सुनंदा मूह के बल 30 फीट नीचे गिरी उसके उपर विक्रम गिरा. जिसकी वजह से सुनंदा की तत्काल मृत्यु हो गयी और चेहरा भी पहचान मे ना आए ऐसा हो गया और विक्रम बुरी तरह से ज़ख़्मी हो गया. क्यूकी किशोरीलाल को पहुचने मे देर होने वाली थी इसीलिए ज़ख़्मी हालत मे भी विक्रम ने तीनो का अग्निसंस्कार किया.

किशोरीलाल पूरा सदमे मे था. उसको ये बात का रंज तो ज़रूर था की वो अपने माबाप और बेहन का अंतिम दर्शन भी नही कर पाया लेकिन उस से भी ज़्यादा ये सदमा पहुचा की एकलौता बेटा होने के बावजूद वो अपने माबाप का अंतिम संस्कार भी नही कर पाया.दूसरे दिन दोनो जूनागढ़ वापस आए और विक्रम अपने अंकल आंटी और प्यारी सुनंदा की बारहवी तक रुका, फिर चला गया.

इस घटना के ठीक 4 महीने बाद 25थ डिसेंबर 1977, नटाल के दिन राजेश्वरी देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया. ये बालक हस्ता हुवा पैदा हुवा था, ठीक सुबह 6.05 मिनट पर जब गिर्नार के पर्वत पर सुबह की गुरु दत्तात्रेय की आरती शुरू हुई, घंटराव के साथ बच्चे का जन्म हुवा. छटी के दिन बड़े हसरत से बच्चे का नाम जय रखा गया. जब जय दो महीने का हुआ दोनो माता पिता ने मन्नत रखी थी कि वो गिर्नार पर्वत पे जाएँगे और मन्नत पूरी करेंगे. क्योकि राजेश्वरिदेवी बचपन से धार्मिक स्वाभाव की थी और उसको ये संस्कार मिले थे की


गुरु और गोविंद दोनो खड़े किसको लागू पाय,
बलिहारी गुरुदेव ने गोविंद दियो दिखाय

यानी बचपन से गुरु की ख़ौज थी. गुरु दत्तात्रेय तो गुरुओ के गुरु है, तो उन दोनो की मन्नत थी की बच्चे के जन्म के बाद गिर्नार ज़रूर जाएँगे. मार्च के पहले वीक मे दोनो गिर्नार चढ़ने के लिए सुबह 4.30 बजे निकले.

अगर कोई गिर्नार के उपर गया हो तो पता होगा गिर्नार पर्वत को टोटल 9,999 स्टेप्स है. अगर आप किसी लॅडीस के साथ सुबह 4 से 5 बजे शुरू करेंगा तो 12 से 1 बजे तक पहुच पाएँगे. इसीलिए किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी ने सुबज 5 बजे चढ़ना शुरू किया.

सबसे पहले वो अंबाजी पहुचे वाहा दर्शन किया. थोड़ी देर आराम के बाद और चढ़ाई शुरू की. ज़्यादा ठंड भी नही थी और ज़्यादा गर्मी भी नही थी. फिर भी थकान से थोड़े पसीने से तरबतर थे. वैसे भी केवल 2 महीने के बच्चे को साथ मे लेकर गिर्नार जाना तो संभव ही नही होता, क्योकि उपर तो ऑक्सिजन भी थोड़ी कम हो जाती है तो सास लेने मे भी तकलीफ़ होती है. फिर भी इन दोनो ने ईश्वर पे भरोसा रखा था की तूने औलाद दी है तो तू ही इसका रखवाल बनेगा और दोनो आगे बढ़ते बढ़ते आधी उचाई तक डातार तक पहुचे. थोड़ी देर विश्राम लेने का दोनो ने सोचा. दोनो स्टेप्स पर बैठ गये.

इतने मे एक आवाज़ आई, बेटा इधर अजाओ. आसपास तो घना जंगल हुवा करता है वाहा डाटार मे. दोनो ने आसपास नज़र दौड़ाई, लेकिन कुच्छ नही दिखाई दिया. फिर से आवाज़ आई, तेरी दाई और देख और सीधा अंदर चला आ. किशोरीलाल ने दाई और देखा तो 50 कदम दूर एक छोटी सी गुफा थी, थोड़ा सा डर भी लगा, लेकिन वाइब्रेशन इतने गहरे थे की दोनो के पैर मानो हिप्नटिज़्ड होकर उस गुफा की और चलने लगे. पास आकर देखा तो दोनो को झुक कर अंदर जाना पड़ा इतना छ्होटा सा द्वार था. दोनो ने अंदर प्रवेश किया तो अंदर 60 से 70 कदम दूर एक छ्होटे से पत्थर पर कोई संत ध्यानमगन अवस्था मे बैठे थे. चेहरे पर बड़ा तेजस था, गौर मुख छ्होटी सी दाढ़ी और भिखरे काले बॉल, उम्र होगी कोई 30 या 32 साल की. लेकिन उसको देखते ही दोनो को डर नही लगा और पास जाने के बाद दोनो ने प्रणाम किया और बैठ गये उनके चर्नो मे. संत ने धीरे से आँखे खोली और दो मिनट. तक मुस्कुरकर देखते रहे और धीरे से बोले, हम साधु को अच्छी आत्मा की वाइब्रेशन की बड़ी अच्छी पहचान होती है. तुम दोनो के साथ तुम्हारे बेटे कीआत्मा की सुवास मुझे तुम दोनो को यहा पर खिचाने पर मजबूर कर गयी.

किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी को तो बड़ा आश्चर्या हुवा की उसने ना तो कभी इस साधु को देखा था और 70 फीट आगे और अपनी बाई और गुफा से 50 कदम दूर उनको यहा बैठे बैठे देखने वाले ये महात्मा कौन है. खास करके जिज्नशा ये हुई की उनके बेटे जय के बारे मे उस संत ने अच्छि आत्मा बोला था. इसका मतलब वो महात्मा जो भी है उन सब के बारे मे कुच्छ ना कुच्छ ज़रूर जानते है. उन दोनो को बड़ी जिगयाशा हुई की ये संत आख़िर कौन है ?? कहा से आए है ?? क्यो उसको ही मिले ?? और इनका मकसद क्या है ??

गिर्नार के खुशनुमा वातावरण मे किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी दोनो थके हुवे थे और आवाज़ सुनकर जैसे हिप्नटिज़्ड की तरह आवाज़ की और खिचते चले गये और उस संत को देखकर उसके सामने बैठे हुवे थे. बड़े आश्चर्या से किशोरीलाल ने विनम्रता से पुचछा, बाबा आप कौन है, और हमे कैसे जानते है और आप को कैसे पता की हम यहा है और आप इस बच्चे के बारे मे क्या जानते है. संत थोड़ी देर मुस्कुराए और फिर बोले, बेटे इस ब्रह्मांड की कई पुण्या आत्माए इस पृथ्वी पर जन्म लेना चाहती है, क्यूकी जब वो तपसचर्या कर रहे थे तब उसकी पूरी आयु ख़तम हो गयी और उनको इस दुनिया से अवकाश लेना पड़ा. अब समय आ गया है कि उसके पास जो है वो इस समाज मे बाँटे और इस समाज के लोग जो तापश्चर्या के लिए एकांत मे नही जा सकते वो यही इसी समाज मे बैठे बैठे वो सबकुच्छ पा सके जो की आज तक संभव नही था. दूसरा कभी मा बाप संतान की पसंदगी नही कर सकता. वे सिर्फ़ परमात्मा से अच्छी संतान की प्रार्थना कर सकते है. लेकिन एक आत्मा हमेशा उसको जो कार्य या मनोकामना पूर्णा करनी हो तो वो अपने लिए ऐसे उपयुक्त मा बाप की पसंदगी करता हो जहा उसे अपने अनुकूल वातावरण पर्याप्त हो सके.

बाबा की वाणी असखलित बह रही थी. दोनो भावविभोर होकर एक्चित सुन रहे थे. जैसे एक दारू पीनेवाला मर जाता है और उनकी ये इच्छा अधूरी रह जाती है तो उसकी आत्मा ऐसा घर और मा बाप ढूँढती है जहा उसे दारू की कोई बंदिश ना कर सके वैसे ही एक पवितरा आत्मा हमेशा ऐसा वातावरण और मा बाप ढूँढती है जहा उसकी तापश्चर्या का लाभ पूरे समाज को मिल सके. तुम्हारी आत्मा एक पवितरा आत्मा है और तुम्हारी पत्नी की आत्मा तुमसे भी पवितरा है, तुम दोनो के कई जन्मो के अच्छे करमो के फल स्वरूप ये आत्मा तुम्हारे बच्चे के स्वरूप मे आई है. इस पवितरा आत्मा को सामानया समझने की भूल कभी मत करना. इस आत्मा ने इस बेटी की कोख को स्वीकार किया इसी से तुम दोनो का जन्म सफल हो चुका है. लेकिन अभी उपयुक्त समय नही आया है. ये बच्चा तो सिर्फ़ मध्यम है इसे बड़े जतन से तुम्हे वो वातावरण देना है जिस से उसकी आत्मा तुम लोगो से भी पवितरा होनी है. क्यूकी आने वाला समय कलियुग का बड़ा ख़तरनाक समय आनेवाला है. इस समय मे एक बच्चे को अच्छे संस्कार देना बहुत कठिन कार्य होना है. खास करके बेटी तुम्हे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, क्यूकी अगर ये साथ नही दे सका तो तुम्हे अकेले इस सफ़र को तय करना है.

दोनो एकदुसरे को देखते रहे. राजेश्वरिदेवी ने मौन तोड़ते हुवे पुचछा, बाबा आप कह रहे है की मुझे अकेले सफ़र तय करना होगा तो क्या संत ने बीच मे रोक कर जवाब दिया, नही बेटी कोई शंका नही है की तुम्हारे पति की आयुष्या कम होगी, दीर्घायुष्या है उसकी लेकिन कुच्छ अपने पूर्व जन्म के दोष भी तो भोगतने होते है. मे कोई भविष्यावेता नही हू. मे यहा सिर्फ़ अपने गुरुओ के आदेश से आया हू. फिर आँखे बाँध कर के और बोले, मेरे गुरुओ ने बताया था के इसी दिन इसी समय तुम लोग मुझे यहा मिलोगे और मे तुम्हे कुच्छ बाते बताउ. बेटी मैने तुम्हे जो कहा है उसे याद रखो क्यूकी तुम्हारा बेटा अगर जैसा हम साधुलगो ने सोचा है वैसी आत्मा हुई तो उनकी शादी एक इस से भी पवित्र आत्मा से होनेवाली है और उन्दोनो के संयोग से जो संतान भविष्या मे आनेवाली है वो मेरे गुरुओ मे से ही कोई एक होगा. क्यूकी समय अभी बहुत है लेकिन अभी से आप को आगाज़ करना हम साधुओ का कर्तव्य है.

राजेश्वरिदेवी ने बड़े प्यार से अपने गोद मे बैठे हुवे जय की ओर देखा और बाबा को पुचछा, बाबा, आपका आदेश हमारे सर आँखो पर, लेकिन इसकी लायक बच्ची कौन है वो तो आप को पता ही होगा, उसके बारे मे हमे कृपया कुच्छ जानकारी दीजिए.
बाबा ने 2 मिनट के बाद मौन तोड़ा, वैसे ये भविष्या की बाते है लेकिन मे आप को थोड़ी जानकारी देता हू. इनके लायक बच्ची तुम्हारे किसी निकट स्वजन, दोस्त के यहा जन्म लेनेवाली है. किशोरीलाल एकदम खुश हो गया, बाबा आप कही मेरे दोस्त विक्रम की बात तो नही कर रहे है.
बाबा फिर आँखे बाँध करके 2 मिनट के बाद बोले,बेटे मेरे गुरुओ की कोई संकेत नही मिल रही है, लेकिन हा इस दोस्त से हमेशा सावधान रहने की सूचना मे तुम्हे दू ऐसी आग्या मुझे मेरे गुरु दे रहे है.
दोनो एकदुसरे को देखते रहे. बाबा ने आँखे खोली और फिर बोले, बेटे हम साधुओ को सिर्फ़ उस पवित्र आत्मा जो हमारे गुरुओ मे से कोई है उसके जन्म के लिए उपयुक्त मा बाप और वातावरण मिले उसकी ही फिक़्र है. बाकी इस समाज की घटना की कोई सूचना हमे नही है, क्यूकी तुमने तुम्हारे दोस्त की बात बताई तो कुच्छ जवाब नही आया लेकिन सावधान रहने की सूचना मिल रही है.
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किशोरीलाल बड़े आश्चर्या से देखता रहा और पुचछा, लेकिन बाबा अगर विक्रम की ही बेटी से मेरेबेटे की शादी होनी है तो मुझे उसके साथ संबंध तो रखना ही पड़ेगा ना. बाबा मुस्कुरकर बोले, बेटे हम संबंध जोड़ने और तोड़नेवाले कौन होते है. और मैं कहा संबंध तोड़ने की बात कर रहा हू. अगर उसकी बेटी के साथ ही इस बच्चे की शादी होनी है तो उसे कोई नही रोक पाएगा.
फिर ध्यान मे बैठ कर 2 मिनट के बाद बोले, बेट एक और सूचना मुझे मिल रही है की अपने बेटे को कभी ग़लत नही समझना, उसे भी अपने पिछछले जन्मो के करमो को भोगतान है. याद रखो तुम चाहो की ना चाहो जो होना है वो तो होना ही है. लेकिन हमे सिर्फ़ कर्म करना है और तुम दोनो को कर्म करते हुवे सिर्फ़ एक अच्छा माध्यम होना है. दूसरा इस बच्चे की शादी जिसके साथ होनी है वो जल्द ही इस पृथ्वी पर जन्म लेनेवाली है.

दोनो ने प्रणाम किया और बोले,और कोई आदेश बाबा.
बाबा बोले, बस और कुच्छ नही अब प्रस्थान कीजिए मुझे भी जाना होगा,
दोनो ने बहुत विनती को वे उनके घर आए, लेकिन बाबा बोले,मेरी साधना अभी अधूरी है. मैं हिमालय जा रहा हू.जब मेरे गुरु आदेश देंगे तो मैं फिर आप को मिलूँगा. मेरा आशीर्वाद तुम दोनो पर हमेशा रहेगा,लेकिन याद रखना करमो के फल तो भुगतने ही होते है चाहे भगवान हो या इंसान.
इसके बाद बाबा ने जय को गोदी मे उठाया और थोड़ी देर आँखे बाँध करके उसके मस्तिष्क पर हाथ रखा और 2 मिनट बाद फिर उसकी मा को वापिस कर दिया. दोनो खड़े हुवे और प्रणाम करके गुफा के बाहर चले आए और आगे चढ़ना शुरू किया. करीब 12 बजे के वक़्त वे गुरु दत्तात्रेय पहुचे और बड़ी आदर और आस्था से मन्नत पूरी की और वापिस उतरना शुरू किया. रास्ते मे फिर डाटार रुके और उस गुफा मे गये तो कोई नही दिखा और ईश्वर का प्रसाद समजकर दोनो वापिस अपने संसार मे खो गये.

इसके बाद किशोरीलाल और राजेश्वरी देवी की अलग लाइफ शुरू हुई और वाहा जोधपुर मे विक्रम कई राज़ अपने दिल मे च्छुपाकर मस्त ज़िंदगी जी रहा था. ऐसे ही 2 साल बीत गये. जब विक्रम को छुट्टी की तकलीफ़ थी तो किशोरीलाल ने सोचा क्यू ना वे दोनो जोधपुर चले जाए और विक्रम से मिले. दोनो ने टेलिग्रॅम किया और ट्रेन पकड़ ली. विक्रमकी सच्ची ज़िंदगी अब सामने आनेवाली थी जिसका कोई अंदाज़ा इन दोनो को नही था.

जब किशोरीलाल विथ फॅमिली जोधपुर पहुचे तो रेलवे स्टेशन पर विक्रम का खास नौकर बंसीबाबू खड़े थे उन्होने स्वागत किया. जब किशोरीलाल ने विक्रम के लिए पुचछा तो बंसी ने बताया की वो तो शिकार पर गये है और रात को देर से लौटेंगे, क्यूकी टेलिग्रॅम आज सुबह देर से आया था इसीलिए विक्रम को तो पता ही नही था. और ये ही वजह उसके लिए घातक सिद्ध हो गयी. थके हुए किशोरीलाल विथ फॅमिली जोधपुर के आलीशान बंग्लॉ पर पहुचे. नारायनप्रासाद के समय से ही किशोरीलाल का पूरा फॅमिली ग़रीबी मे आ चुक्का था, लेकिन राजेश्वरिदेवी तो पहली बार जोधपुर आई थी, उसने देखा की यहा पैसे की, अमीरी की कोई कमी नही थी. एक बड़ी हवेली के पास तांगा रुका और बंसी सब को अंदर ले गया. पूरी हवेली 3 मजलो पे फैली हुई थी. हर मजले पर 10 से 12 रूम्स थे. इस पूरी हवेली मे विक्रम अकेला रहता था. फ्रेश होकर सब दीवानखाना मे आए और बंसी गरम गरम चाय लेके आया. बंसी 40 साल का था और सेवा के लिए अभी शादी नही की थी. उसका एक ही मकसद था विक्रम की देखरेख करना. दोनो दोस्तो के पिताजी ने यही ज़ोर लगाया था की विक्रम को संभाले. लेकिन आज बंसी कुच्छ गंभीर दिख रहा था. वैसे तो किशोरीलाल को देखते ही उसकी आँखो मे आनंद दिखाई देता था. क्योकि किशोरीलाल उसे दोस्त की तरह रखता था और विक्रम सिर्फ़ बंसी का इस्तेमाल करता था. विक्रम जानता था कि बंसी पुराने ख़यालात का है इसीलिए अपने कुकर्म कभी किसी से शेर नही करता था, यहा तक की किशोरीलाल को भी कुच्छ कुच्छ बाते ही पता थी. किशोरीलाल ने बंसी को जब पुचछा,क्यो बंसी हम लोग आए ये तुझे पसंद नही, तेरी भाभी पहली बार आई तो क्या कुच्छ बाते ही नही करेगा मुझसे ?, मेरा बच्चा पहली बार आया है यहा, क्या तुझे अच्छा नही लगता ?
बंसी के आँख मे आँसू आ गये और भारी स्वर मे बोला,भैया (किशोरीलाल ने उसे भैया कहने को ही बोल रखा था) ये कैसी बाते करते है आप, मेरी बीबीजी पहली बार आया है, छ्होटे बाबा पहली बार यहा पधारे है तो क्या मुझे खुशी नही होगी ?, इतना गिरा हुवा हू क्या मैं ? ये तो हमारे सदभाग्य है की कोई संस्कारी औरत के पाव कई साल के बाद इस हवेली मे उतरे है . और आप ने भाभी बोल दिया ये ही बहुत है मेरे लिए वरना मेरी क्या औकात भला.
किशोरीलाल ने फिर पुचछा,वो सब छ्चोड़ लेकिन तेरी सूरत पे क्यू बारह बजे है ये तो बता ?
क्या बताउ भैया, बंसी बोला,साहब की मृत्यु के बाद आप के पिताजी ही थे जिसके काबू मे बाबा रहते थे (बाबा यानी विक्रम), लेकिन उसकी भी मृत्यु के बाद उसकी शराब पीने की आदत और भी ज्याद हो चुकी है. और अब तो कंट्रोल से भी बाहर है. किशोरीलाल ने कहा,हा ये तो मैं जानता हू की शराब की बुरी लत लगी है इसको, लेकिन तू कुच्छ क्यू नही कहता. अरे बाबा मे क्या बोलू, मेरी थोड़ी ही सुनते है बाबा ? बंसी ने बताया.
किशोरीलाल ने थोड़ी देर बाद बताया, मैं आज बात करूँगा उस से, शायद पिताजी के मरने का गम लगा हो उसको.
हा ये हो सकता है कि अंकल की मृत्यु के बाद जब बाबा वापस आए तो तीन दिन तक तो घर मे ही बैठे रहे थे और पूरी तरह नशे मे डूबे हुवे थे. लेकिन बाद मे तो मानो लत ही लग गयी हो.
लेकिन ये बात तो साफ ही थी कि मेरे पिताजी की मृत्यु का सदमा तो लगनेवाला ही था उसे. किशोरीलाल ने बताया.
बंसी ने जवाब दिया,भैया, सिर्फ़ सदमा होता तो थोड़े दीनो मे ख़तम भी हो जाता, लेकिन आजकल तो यहा शराब और मुज़रा की महफ़िल भी जमती है. ऐसे महॉल को सदमा नही ऐयाशी कहते है. आप घरवाले है इसीलिए मैं ज़ुबान खोलता हू वरना ना तो मेरी औकात है और नही मुझे घर की बाते बाहर निकालने का इरादा है.
क्या बात करते हो, विक्रम को ये शौक कब लगा ? किशोरीलाल ने पुचछा.
बंसी घबराता हुवा बोला उठा,भैया मेरा नाम नही आना चाहिए वरना बाबा मेरी खाल उधेड़ देंगे. लेकिन यहा की मशहूर कोठे वाली बाई रंगीली ने ये लत लगाई है. दूसरा बाबा रंगीली बाई से शायद डरते भी है.
क्यू ? किशोरीलाल ने पुचछा तो बंसी ने जवाब दिया, वो तो मुझे पता नही लेकिन उसके इशारे से बहुत कुच्छ होता है यहा.
चलो में बात करूँगा विक्रम से. कहकर चाय पीकर किशोरीलाल विक्रम के कमरे मे गया और राजेश्वरिदेवी बंसी के साथ रसोईघर मे गयी. बंसी के लाख मना करने पर भी राजेश्वरिदेवी ने खाने मे उसका हाथ बटाया. यहा विक्रम के कमरे मे सोच मे डूबा हुवा किशोरीलाल बैठा था की वो विक्रम से कैसे बात करे. तभी खाने की आवाज़ आई और दोनो ने खाना खाया और फिर राजेश्वरिदेवी आराम करने चली गयी और किशोरीलाल फिर विक्रम के कमरे मे आया. बंसी सफ़साफाई करने मे लग गया था. अचानक आधे घंटे के बाद बंसी की आवाज़ आई,भैया भाभिजी आप को बुला रही है. किशोरीलाल राजेश्वरिदेवी के पास पहुचा तो उसके हाथ मे एक पोस्ट का जला हुवा कवर था जिसमे कुच्छ फोटोग्रॅफ्स थे और एक कोई मेडिकल रिपोर्ट थी. सब को जलाने की किसीने कोशिश की थी. किशोरीलाल ने फोटोग्रॅफ्स देखने की कोशिश की. फोटोस कोई समुंदर किनारे की उँचे पत्थरो की थी और बहुत दूर से खींची गयी थी और ब्लॅक & वाइट का जमाना था तो स्पष्ट स्वरूप से कुच्छ नही दिखाई देता था. आधी जैल हुई तस्वीर को देखना भी मुश्किल था. लेकिन आँखो मे आँसू लिए खड़ी हुई राजेश्वरिदेवी ने उसके हाथ मे जो मेडिकल रिपोर्ट थी वो किशोरीलाल को दिखाई तो गुस्से से उसकी आँखे फटी रह गयी.

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वो मेडिकल रिपोर्ट कन्याकुमारी के किसी हॉस्पिटल की थी जिसमे लिखा था की नारायनप्रासाद की फॅमिली के तीनो सदस्यो की मौत सिर पे गहरी चौत लगने से हुई थी. इसमे तो कोई हैरत की बात नही थी लेकिन आगे जो लिखा था वो पढ़कर मानो बिजली गिर पड़ी थी. सुनंदा के गुप्तांग मे इजा पाई गयी थी. इसका स्पष्ट मतलब था की किसी ने उसपर बलात्कार किया था या बलात्कार की कोशिश की थी. चिल्लाकर किशोरीलाल ने बंसी को आवाज़ लगाई. बंसी दौड़ता हाजिर हुवा. किशोरीलाल को गुस्से मे और आँखो मे खून के आँसू देखे और राजेश्वरिदेवी की आँख मे आँसू देखकर वो समझ गया की मामला गंभीर है. उसने पुचछा,क्या हुवा भैया ? किशोरीलाल ने कवर दिखाकर पुचछा,ये क्या है ? बंसी ने कवर हाथ मे लेकर, देखकर बोला,ये तो वो कवर है जो एकदिन बाबा के हाथो से नशे की हालत मे आग की भट्टी मे चला गया था. मैने सोचा कि ये कोई ज़रूरी काग़ज़ है इसीलिए मैने आग से निकाल लिया और यहा इस कमरे मे रख दिया. बाद मे बाबा से कभी बात नही हो पाई क्यूकी बाबा घर कम और बाहर ज़्यादा रहते थे. लेकिन इसमे है क्या ?
किशोरीलाल कुच्छ नही बोल पाया लेकिन राजेश्वरी देवी ने बताया, बंसी भैया ये पिताज़े, माताजी और सुनंदा बहन की मेडिकल रिपोर्ट है और इसमे लिखा है की सुनंदा बहन की लाज लूटी गयी है या किसी ने लाज लूटने की कोशिश की है.
इतना सुनते ही बंसी की आँखे फटी रह गयी. कुच्छ देर तक कोई नही बोल पाया. ज़ाहिर था जो तीनो सोच रहे तो वो बोलना भारी पड़ रहा था. आख़िर बंसी ने मौन तोड़ा,भैया क्या हमारे बाबा.? उसका ये वाक़या अधूरा रह गया, उसकी आँखो मे आँसू बह उठे, गले मे खराश पड़ गयी, मानो गले पर बड़ा सा बोझ पड़ गया हो. किशोरीलाल ने घूमकर आँसुभरी आँखो से बंसी को देखा और बोला, बंसी दिल तो नही मान रहा लेकिन संजोग यही बता रहे है कि हमारा विक्रम कहकर बात अधूरी छ्चोड़ दी. काफ़ी देर तक वे लोग मौन रहे. अंत मे किशोरीलाल ने खामोशी तोड़ी,देखो मैं इस मामले मे जड़ तक पहुचना चाहता हू. तब तक कोई भी विक्रम से इसका ज़िकरा नही करेगा, बंसी तुम भी नही. बंसी ने हा मे सिर हिलाया और बोला,ठीक है भैया लेकिन मेरे बाबा देखो बंसी अभी तो किसी पे शक करना बेकार है, लेकिन विक्रम की चिंता करना तुम्हारा धर्म है तो मेरी बेहन के बारे मे सोचना भी मेरा धर्म है. विक्रम तुम्हारा बाबा ही नही मेरे भी दोस्त है. चिंता मत करो जब तक सच्चाई हमारे सामने नही आती मैं कुच्छ नही करूँगा विक्रम को ये मेरा वादा रहा. किशोरीलाल की आँखो से आसू निकल आए. बंसी भी रोता हुवा बाहर चला गया और किशोरीलाल फिर विक्रम के कमरे मे आकर एक चेर मे बैठ गया.
वो सोचता रहा, क्या विक्रम ने ही ऐसा किया होगा. उसको दुख ये बात का हो रहा था की ये बात आज उसे मालूम हो रही है. उसने आजतक विक्रम की गहरी दोस्ती पर अँधा विश्वास क्यू किया ? उसे आज शर्म आ रही थी कि वो एकलौता भाई होकर भी उसकी बहन को इस हादसे से नही बचा पाया.
कुच्छ देर सोचने के बाद उसने विक्रम के रूम की तलाशी शुरू की. वैसे विक्रम के रूम मे आने की किसी की भी हिम्मत नही होती थी,. लेकिन किशोरीलाल उसका गहरा दोस्त था इसीलिए उसका यहा आना स्वाभाविक था. उसने सब खास खास जगह ढूंढी. लेकिन कुच्छ नही मिला. ड्रॉयर, कपबोर्ड, बेड, टेबल के ड्रॉयर्स, शोकेस, दीवार जो भी वाहा था सबकुच्छ देख लिया लेकिन कुच्छ नही हाथ आया. आख़िर वो हाथ पे हाथ रखकर चेर मे बैठ गया. सामने अंकल की बड़ी तस्वीर थी. उसे देखकर उसे थोड़ा विचित्र लगा क्यूकी वो तस्वीर कुछ तिर्छि थी. उसे याद आया कि वो तस्वीर तो हमेशा सीधी होती थी आज उसे क्यो थोड़ी तिर्छि लग रही है. मानो किसी ने अभी अभी लगाई हो. वो नज़दीक गया और ध्यान से तस्वीर को देखने लगा. आख़िरकार तस्वीर को हाथ से हटाने की कोशिश की लेकिन तस्वीर वैईसीकि वैसी ही रही और तस्वीर के पिछे से एक बड़ी डाइयरी गिरी. किशोरीलाल ने बड़े ताज्जुब से वो उठाई और चेर पे बैठ गया. डाइयरी मे कुच्छ पेपर्स थे लेकिन उर्दू मे थे. कुच्छ लिखा था वो भी उर्दू मे था. कुच्छ शायरिया लिखी थी. लेकिन डाइयरी के पन्नो के बीच एक तस्वीर गिरी किशोरीलाल के पाव पर. उल्टी तस्वीर का पिछछवाड़ा किशोरीलाल के सामने था. उस पर गुलाब का चित्रा था और लिखा था लव यू और नीचे विक्रम की साइन थी. किशोरीलाल ने तस्वीर पलटी तो वो तस्वीर सुनंदा की थी. इसे देखकर फिर किशोरीलाल सोच मे पड़ गया की क्या विक्रम सुनंदा को चाहता था ? अगर चाहता था तो कम से कम उसे तो बोल ही पाता. क्या सुनंदा भी विक्रम को चाहती थी ? और अगर विक्रम सुनंदा को चाहता है तो सुनंदा पर किसने अत्याचार किए और अगर किए तो विक्रम ने उसके बारे मे आजतक क्यू किशोरीलाल को नही बताया ? उसे याद आया की नारायनप्रासाद की मृत्यु के बाद विक्रम कभी जूनागढ़ नही आया था.हर वक़्त वो छुट्टी नही मिल रही ऐसा बहाना बनाकर टालता रहा था. क्यू यही वजह थी की वो आना नही चाहता था ?.
किशोरीलाल उठाकर डाइयरी लेकर राजेश्वरी के पास आया और उसे सबकुच्छ दिखाया. राजेश्वरिदेवी की भी वोही सोच थी जो किशोरियालाल सोच रहा था.
दोनो सोच रहे थे की आख़िर माजरा क्या है. वो कौन है जिसने ऐसी हरक़त की थी. विक्रम आख़िर क्यू कोई राज़ अपने दिल मे च्छुपाए रखे बैठा था ? वो कौन है जिसने सुनंदा के साथ बलात्कार किया था या बलात्कार की कोशिश की थी ? वो कौन था, कहा था, जाने कहा ???????

किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी को इंतेज़ार था विक्रम का लौटने का. आज के दिन किशोरीलाल का सबसे खराब दिन था. आज उसकी ज़िंदगी को दो झटके लगे थे. एक आज तक वो विक्रम की दोस्ती को अंधे की तरह निभाता रहा और दूसरा अपनी बहन की मौत के बारे मे जिसे आकस्मात या खून ये समझ मे नही आता था. बड़ी बैचेनी से शाम कटी और रात का खाना भी जैसे तैसे बंसी के बहुत ज़ोर पर दोनो ने खाया और अपने रूम मे चले गये.

रात को करीब 11 बजे बस आख लगी ही थी की ज़ोरो से आवाज़ आई. किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी दोनो फ़ौरन खड़े उठे और रूम के बाहर रवेश मे आए नीचे दीवानखाने मे विक्रम लड़खदाता हुवा खड़ा था, बहुत पी रखी थी उसने और साथ मे गन लेके और धोती पहने एक सावला सा आदमी था और बंसी दोनो हाथ जोड़े विक्रम को सम्हाले खड़ा था. किशोरीलाल दौड़ के नीचे आया, तो विक्रम का ध्यान उस पर पड़ा. उसकी आँखो की चमक देखकर किशोरीलाल को लगा की उसके होश उड़े जा रहे है. फिर भी विक्रम किशोरीलाल को देखते ही उसके गले लग गया और बोले,आआररीई डूऊस्त तू ; तू त्त उ उ कब आया वो अच्छी तरह बोल भी नही पाता था. किशोरीलाल ने उसे सम्हाला और पास की चेर पे बिठा दिया और बंसी को इशारा किया. बंसी दौड़ा चला गया और दो मिनट मे नींबू और पानी लेके चला आया. किशोरीलाल ने बहुत नींबू विक्रम को पिलाया. थोड़ी देर मे विक्रम थोड़ा होश मे आया. उसकी नज़र राजेश्वरिदेवी पर पड़ी जो धीरे धीरे सीडिया नीचे उतर रही थी. विक्रम ने उठाने की कोशिश की,अरे भाभी आप, लेकिन फिर वो गिरनेवाला था और किशोरीलाल ने फिर उसको सहारा देके चेर पे बिठा दिया. राजेश्वरिदेवी अब नीचे आ चुकी थी और सामने चेर पे बैठ गयी.

विक्रम चारो और देख रहा था मानो वो किसी से नज़रे नही मिला पा रहा था. उसे अंदाज़ा नही था की उसका जिगरी दोस्त यू अचानक उसे इतनी बुरी हालत मे देख लेगा खामोशी तोड़ते हुवे किशोरीलाल बोला,विकी अभी खाना ख़ाके सो जाओ सुबह बाते करेंगे, तुम्हारी हालत अभी ठीक नही है, वैसे रात भी बहुत हो चुकी है.. विक्रम बोला,नही केपी अब ठीक है. विक्रम किशोरीलाल को केपी बुलाता था और किशोरीलाल उसको विकी.
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क्रमशः................

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अचानक विक्रम खड़ा हुवा और किशोरीलाल के पैर के पास बैठ गया और ज़ोर से रोने लगा. वो रोते हुए बोलता जा रहा था,सॉरी दोस्त, मुझे माफ़ कर्दे मैं अंकल को नही बचा पाया, अंकल, आंटी तो ठीक लेकिन कम से कम सुनंदा भी मेरे हाथो से निकल गयी.

पीठ ठप थापा रहे किशोरीलाल ने सहसा एक सवाल किया,सुनंदा तेरे हाथो से निकल गयी या तेरी ज़िंदगी से? रोती हुई आँखोसे झटके के साथ विक्रम ने किशोरीलाल को देखा. थोड़ी देर वो देखता रहा और उसके आँखो से आँसू की धार और तेज़ हो गयी. गले मे आवाज़ बैठ गयी और बोलने लगा,हा दोस्त वो मेरी ज़िंदगी से निकल गयी, मेरा सबकुच्छ लुट गया, मे अनाथ भी हो गया और मेरी ज़िंदगी वीरान भी हो गयी कहकर वो किशोरीलाल के पैर पकड़कर ज़ोरो से रोने लगा. किशोरीलाल ने उसको उठाया और अपने गले से लगा लिया. विक्रम का चेहरा लाल हो चुक्का था और आँसू रुकने का नाम नही ले रहे थे. जब कि किशोरीलाल के आँसू बिल्कुल सुख चुके थे. दोनो खामोश थे. वाहा खड़े हुवे राजेश्वरिदेवी और बंसी की आँखे भी बह रही थी. वो सावला सा आदमी रो तो नही रहा था लेकिन आँखो के कोने मे भीगी भीगी पलके ज़रूर दिखाई दे रही थी.

7 या 8 मिनट रोने के बाद विक्रम एकदम टूटकर बिखर गया. उसको उठाकर फिर से किशोरीलाल ने चेर पे बिठाया. किशोरीलाल ने बड़े प्यार से विक्रम को पुचछा,मुझे क्यू नही बताया सबकुच्छ?. मैं डरता था, कही मुझे कोई मना ना कर्दे और सुनंदा कही ना कहे तो विक्रम बोला. तू दोस्त है या गधा, अगर पहले बोल देता तो अभी तक तेरी शादी भी हो चुकी होती. क्या सुनंदा भी तुझे किशोरीलाल अटक गया. विक्रम खड़ा हुवा और बोला,पहले मुझे नही मालूम था लेकिन रास्ते मे जब मैने एकबार हिम्मत करके पुचछा तो वो भी मान गयी थी. किशोरीलाल ने आगे पूछना ठीक नही समझा क्यूकी अब जो सुनंदा के बारे मे वो सवाल पुछना चाहता था वो सब के सामने नही बल्कि एकांत मे पुछना चाहता था, इसीलिए उसने सब को सोने के लिए कहा और खुद राजेश्वरिदेवी को लेके उपर चला गया.

उसने रूम मे जाकर राजेश्वरिदेवी को चुप रहने का इशारा किया और धीरे से बोला तुम सो जाओ लाइट बंद करके, मैं 10 मिनट मे आता हू. अगर देर हो जाए तो चिंता मत करना मे जल्द ही आ जाउन्गा. राजेश्वरिदेवी ने पुचछा,क्यू, आप अब कहा जा रहे हो ? विक्रम भैया को सोने दो, वैसे भी वो थके हुवे है. किशोरीलाल बोला,ऐसी थकान तो उसे रोज लगती है, मैं जानता हू अपने दोस्त को, लेकिन कुच्छ सवाल बाकी है जो मुझे अकेले मे विकी को पुछने है, प्लीज़ तुम सो जाओ. राजेश्वरिदेवी ने कहा,ठीक है लेकिन क्या मैं जाउ तो कोई खराबी है ?. अरे बाबा मैं जाउ या तुम दोनो एक ही है लेकिन विकी तेरी हाजरी मे ज़्यादा नही खुलेगा, प्लीज़ मुझे जाने दो अभी. फिर राजेश्वरिदेवी ने कुच्छ आगे नही पुचछा और सो गयी.

किशोरीलाल चुपके से रवेश मे आया और सीडी उतरकर दिवानखना मे आया. और किचन की और जाने लगा, लेकिन वाहा उसके सामने ही लाइट्स ऑफ किए गये और बंसी बाहर निकला. बंसी ने किशोरीलाल को आवाज़ देनी चाही, लेकिन किशोरीलाल ने उसे चुप रहने का इशारा किया. जब बंसी नज़दीक आया तो उसकी आँखो मे आँसू थे और मूह लाल था. देखते ही समझ गया किशोरीलाल और उसने धीरी आवाज़ मे पुचछा,विक्रम ने हाथ उठाया क्या ?.बंसी कुच्छ ना बोला और नज़रे झुका दी.

किशोरीलाल उसका हाथ पकड़ के बाहर खिच ले गया और सर्वेंट क्वॉर्टर्स मे गया और बंसी के क्वॉर्टर मे जाकर बोला,बंसी लाइट मत जलाना और बता क्या हुवा ? बंसी रो पड़ा, कुच्छ देर तक किशोरीलाल ने उसे रोने दिया और फिर जब वो संभलने लगा तो उसके आँसू पोछ दिए और फिर वो बोला,भैया बाबा ने मुझ पर पहली बार हाथ उठाया है, आज तक वो सिर्फ़ चिल्लाते है लेकिन आज मुझे भी नही पता की मुझसे क्या बड़ी ग़लती हो गयी और मुझे एक तमाचा लगा दिया. किशोरीलाल बोला,बंसी तुझसे भूल ये हो गयी है कि तूने वो काग़ज़ और तस्वीरे नही जलने दी. बंसी बोला,लेकिन वो तो बहना की रिपोर्ट है ना तो वो तो और भी ज़रूरी है ना इसीलिए मैने जलने नही दी थी. किशोरीलाल एकदम देखता रहा और बोला,बंसी मैं जानता हू तू यहा का नौकर नही बल्कि क्या तेरी हसियत है, ये तो विक्रम ने तुझे नौकर बना दिया है वरना मैं जानता हू की तू अकाउंटेंट का बेटा है और तुझे ज़्यादा पढ़ाई नही करनी थी इसीलिए मेरे पिताजी ने तुझे इस हवेली को संभालने के लिए और ध्यान रखने के लिए रखा है. थोड़ी देर चुप रहने के बाद किशोरीलाल फिर बोला,देख बंसी ये तो हो ही नही सकता कि हम आनेवाले हो और विक्रम को पता ना हो, दूसरा अगर हम आनेवाले है और वो काग़ज़ और तस्वीरे जिनके बारे मे हमे आज तक कुच्छ पता नही था वो तस्वीरे और मेडिकल रिपोर्ट एक ऐसे रूम मे बिखरे पड़े थे जहा हमे ठहराया गया. ये तो साफ है कि विक्रम इस राज़ को राज़ ही रखना चाहता था तो ये काग़ज़ और तस्वीरे किसने उस रूम मे रखी की आसानी से वो राज़ हमारे सामने आ जाए ?

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बंसी अवचक देखता ही रह गया और मानो गले मे आवाज़ अटक गयी हो. किशोरी लाल घुमा और बंसी की आँखो मे आँखे डालकर बोला,देखो बंसी हमारे पास वक़्त बहुत कम है, अगर आज तू कुच्छ नही बोला तो तेरा बाबा तो जाएगा ही लेकिन किसी और की जान भी जा सकती है, मुझे कुच्छ अजीब सा महॉल यहा देखने को मिला है, मैं यहा पहली बार नही आया हू, लेकिन आज देख रहा हू की बहुत कुच्छ चीज़े यहा बदल चुकी है जैसे पैसे की बौछार लग गयी हो, बंसी कुच्छ अजीब सा महसूस तो पहले से ही मैं कर रहा हू. मेरा मन कहता है तू भी कुच्छ च्छूपा रहा है, और अगर ऐसा है और तू कुच्छ नही बोलना चाहता तो ठीक है मेरी बहन तो वापस नही आनेवाली लेकिन मैं हमेशा के लिए तुझे और विक्रम को अकेला छ्चोड़ के वापस मूड़ के कभी नही देखूँगा. लेकिन मैं ये भी जानता हू की अगर मुझे यहा किसी ने बुलाया है तो कुच्छ खास वजह तो होगी ही.

और फिर बंसी आधे घंटे तक बोलता गया और किशोरीलाल सुनता गया. जिसे सुनकर किशोरीलाल चौक उठा, उसे गहरा सदमा भी पहुचा और सिर पे हाथ रखकर बैठ गया, बंसी पानी ले आया. किशोरीलाल ने पानी पिया और पुचछा,वो सावला सा आदमी कौन है जो विक्रम के साथ था ? बंसी ने जवाब दिया,उसका नाम रामेश्वर है, वो और उनकी बेहन बिजली दोनो यूपी से यहा आए थे और रामेश्वर जंगल खाते मे वाहा नौकरी करता था. हाला कि क्लास-आइव की नौकरी थी लेकिन वो जंगल के बारे मे अच्छा ख़ासा जानकार आदमी है, केच्छ वजह से उसको नौकरी से निकाल दिया गया था इसीलिए जब बाबा और काकाजी (यानी नारायनप्रासाद) सब तीर्थयात्रा पे थे तो काकाजी ने ही उसे साथ ले लिया और अब तो बाबा का खास आदमी है जो 24 घंटे उसके साथ रहता है.
किशोरीलाल ने फिर पुचछा,और उसकी बेहन बिजली, वो कहा है ?. जी वो तो आजकल नही दिखाई देती, लेकिन हा शायद अपने गाव गयी होगी बंसी ने जवाब दिया. अकेली गयी है ? किशोरीलाल ने पुचछा. हा, शायद, मैने शायद यही सुना है, पक्का तो नही लेकिन आज कल दिखाई तो नही ही देती बंसी बोला.

फिर किशोरीलाल ने बंसी को जूनागढ़ के गिर्नार के संत की बात बताई और अंत मे बोला,अगर किस्मेत का यही कनेक्षन है तो मुझे विक्रम की शादी करनी ही होगी और शायद कुदरत ने मुझे इसीलिए तेरे मध्यम से यहा बुलाया है. अब मे कुच्छ अच्छा कर के ही यहा से जाउन्गा लेकिन अगर हो सके तो राजेश्वरी को यहा से वापस भेजना पड़ेगा, जिस मे तुझे मुझे मेहनत करनी होगी बंसी

बंसी एकदम खुश हो गया और बोला,भैया अगर कुदरत ने इस दोनो कुटुम्ब को मिलने के लिए और मेरे बाबा के लिए आप को यहा भेजा है तो आप के लिए मेरी जान भी हाजिर है, मैं हर तरह से आप को मदद करूँगा

फिर किशोरीलाल ने बंसी को कुच्छ ज़रूरी सूचनाए दी और दोनो वापस चल दिए. किशोरीलाल अपने रूम मे वापस आया तो राजेश्वरी इतमीनान से सो रही थी. वो भय बेड पे गिरा और पूरे घटनाक्रम को सहलाता रहा. वो कुदरत की करामात को सोचता रहा और परमात्मा का शुक्रिया अदा किया कि कुच्छ तो वो किसी के काम आएगा और खास तो अपने बच्चे के लिए ही कुच्छ करना बाकी रह गया था अब ज़िंदगी मे.

फिर वो और सोच मे पड़ गया की कौन जाने कल से क्या होनेवाला है और कुदरत कैसे कैसे मोड़ लेनेवाली है उसके साथ कही भी कुच्छा भी जाने कहा ??? और वो नींद की आगोश मे समा गया

दूसरे दिन सुबह राजेश्वरिदेवी जल्दी सुबह उठी और फ्रेश होकर पूजा कर रही थी तभी किशोरीलाल उठा और उसने भी फ्रेश होकर दोनो ने प्रार्थना की तभी सुबह के 7.30 बजे थे. राजेश्वरिदेवी ने जब किशोरीलाल को पुचछा कि क्या विक्रम से कुच्छ बात हुई, तभी किशोरीलाल ने राजेश्वरिदेवी को उनकी और बंसी की सारी बाते बताई जो कुच्छ इस तरह थी और चौका देने वाली थी

गंगाधर (विक्रम के पिता) का ज़्यादातर समय जोधपुर के महाराजा इंदरजीत दीवान के साथ गुजरता था. हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद सब स्टेट का विलिनीकरण किया गया उसमे जो भी शर्त इंडियन गवरमेंट ने रखी थी उसमे किस राजा को कितना सालियाना मिलेगा (सालियाना मीन्स अब महाराजा स्टेट की गवरमेंट मे कोई उँचे ओहदे पर रहेंगे और बदले मे कुच्छ सॅलरी जैसा मिलेगा उसे सालियाना कहते है), वो कितना होना चाहिए और उस अमाउंट से गुज़ारा कैसे होगा, खास करके क्षत्रियो के शौक कम करने पड़ेंगे, ये सब तय करने की रेस्पॉन्सिबिलिटी महाराजा ने गंगाधर को दी थी. गंगाधर की पत्नी का तो जब विक्रम बहुत छ्होटा था तब ही देहांत हो गया था. गंगाधर अब महाराजा को संभालता की अपने बेटे विक्रम को. जब बहुत कुच्छ अच्छा अमाउंट महाराजा के लिए पास हो कर आ गया तो बदले मे महाराजा ने गंगाधर को भी हर महीने अच्छी अमाउंट तय कर दी थी. ये बिल्कुल उल्टा हुवा था की गंगाधर की सॅलरी अच्छी थी और यहा जूनागढ़ मे उसके दोस्त नारायनप्रासाद की सॅलरी बिल्कुल नही जैसे थी, इसीलिए यहा गंगधार अमीर होता गया और वाहा नारायनप्रासाद ग़रीब होता गया. लेकिन नारायनप्रासाद का बेटा किशोरीलाल साइंटिस्ट बन ने पर तुला हुवा था, बल्कि गंगाधर का बेटा विक्रम की दोस्ती राजघराना के क्षत्रियो के साथ मोज मस्ती मे बीत रही थी. किशोरीलाल के पास मा के संस्कार थे, और विक्रम के पास मा भी नही थी और रोकनेवाला बाप भी फ्री नही होता था. शराब, सुरा की आदत से गंगाधर जल्द ही वाकेफ़ हो गया था.

लेकिन एक दिन जब वो राजघराने पर पहुचा तो महाराज उद्यान मे थे और जब वो उद्यान की तरफ जा ही रहा था और कोई शाम के 7 बजे होंगे, तो वो सर्वेंट क्वॉर्टर के पास से गुजर रहा था की उसने प्रिन्स की और विक्रम की आवाज़ आई. वैसे वो कभी किसी कार्य मे दखल नही देता लेकिन जब ज़ोर ज़ोर से हस्ने की आवाज़ आई तो उसके पैर अपने आप ही सेवेंट्स क्वॉर्टर्स की और चले गये. पूरे महल की राइट साइड पर कोने मे ये क्वॉर्टर्स बनाए गये थे. गंगाधर लेफ्ट साइड चला और क्वॉर्टर्स का पिछे का हिस्सा दिखाई दे रहा था. उसने उद्यान की ओर देखा तो महाराजा भी दिखाई नही दे रहे थे तो उसको सेरवेंट्स क्वॉर्टर्स मे झाँकने का मन हुवा. जहा से आवाज़ आ रही थी वाहा जाकर वे खड़े हो गये. वैसे टोटल 12 क्वॉर्टर्स थे, लेकिन ये जो आवाज़ आ रही थी वो क़्वार्टर नंबर. 5 था यानी अकाउंटेंट मानिकलाल का क़्वार्टर था. दीवार से होते हुए वो वाहा पूछे और झुक कर विंडो के नीचे बैठ गये. आवाज़ दूसरे रूम से आ रही थी. उसको बड़ा अजीब लगा की अकाउंटेंट के क़्वार्ताए मे प्रिन्स और विक्रम क्या कर रहे है. आवाज़ स्पष्ट सुनाई देनी लगी. प्रिन्स बोल रहे थे, देखो मानिकलाल इसमे क्या है जैसे मैं प्रिन्स हू और मुझे कोई हिसाब महाराजा को नही देना होता वैसे ही विकी को भी कोई हिसाब अपने बाप को देना नही पड़ेगा. विक्रम सिर्फ़ पुरोहित का बेटा ही नही हमारा दोस्त है . एक प्रिन्स की वॅल्यू को कम ना समझो. अरे भाई प्रिन्स के शौख अगर उँचे है तो उसके दोस्तो के शौक भी तो उँचे ही होंगे ना, क्यू विकी ? जवाब मे विक्रम बोला, कुमार यही तो मे मानिकलाल को समझा रहा हू, वैसे भी मेरे अलावा पैसे खर्च करने वाला है ही कौन मेरे घर मे. अब जब देखो तब मुझे आप के पास हाथ लंबे करने पड़ते है अब ये अच्छा नही लगता.
मानिकलाल की आवाज़ आई,छ्होटे सरकार आप की बात सही है लेकिन मुझे गंगाधर बाबू ने जो कहा है उतनी ही रकम दे सकता हू ना, ये राजघराना के नियम है, महाराजा ने आप के लिए कोई पाबंदी नही रखी इसीलिए आप जो भी चाहे अमाउंट उठा सकते है लेकिन विक्रम बाबू के लिए उनके पिताजी ने जो रकम तय की है उतनी ही मैं दे सकता हू. मुझे भी हर महीने हिसाब देना होता है.
अरे मानिकलाल थोड़ा बहुत इधर उधर कर दीजिए ना क्या फ़र्क पड़ता है, आप तो अकाउंटेंट है, आप के हिसाब को कौन चॅलेंज करेगा. अब विकी अपनी मिल्कत को छ्चोड़कर क्या किसी ओर से भीख माँगेगा? ये प्रिन्स के दोस्त के लिए अच्छा है क्या ? प्रिन्स की आवाज़ आई.
मानिकलाल बोला,ठीक है छ्होटे सरकार जैसी आप की मर्ज़ी, लेकिन मैं एक बार पुरोहित जी से तो बात कर लू, ता की उनका विश्वास कायम रहे.
आप को पुछना है तो ज़रूर पुच्छे, लेकिन एक बात सुन लीजिए मानिकलाल अगले महीने से विकी को डबल पैसा मिलना शुरू करा दीजिए, चाहे पढ़ाई के न नाम से ही, आप को जो करना है कर लीजिए, हमे तो पैसे से मतलब है. और हा अब थोड़ी देर तक हमे अकेला छ्चोड़ दीजिए, कम से कम 1 घंटे तक बाद मे आप आईएगा, अब यहा से जाइए, मुझे कुच्छ प्राइवेट बात करनी है विकी से प्रिन्स बोला. जैसा हूकम आपका कहकर मानिकलाल बाहर निकल गया.
********
क्रमशः................

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फिर से प्रिन्स की आवाज़ आई, चल तेरा काम भी हो जाएगा कुच्छ पार्टी का इंतेज़ाम तो कर. विक्रम, वो तो पहले से हाजिर है कुमार कहकर विकी क़्वार्टर से बाहर निकला और एक टार्च निकाली और ग्रीन लाइट तीन बार की. गंगाधर को स्पष्ट दिखाई दे रहा था और उसे उस दिशा मे थोड़ा खुलकर देखा तो एक लड़की भागी सी आ रही थी. लड़की तेज़ी के साथ क़्वार्टर मे दाखिल हो गयी और जब गंगाधर ने थोड़ा उछल उठाकर देखा तो वो मानिकलाल की ही बेटी कृष्णा थी. विक्रम अब बाहर के रूम मे था. और यहा प्रिन्स और कृष्णा अकेले थे. कृष्णा की आवाज़ आई,कुमार अब मुझे डर लग रहा है ऐसे मेरे ही घर मे छुप छुप के आते हुए, कुच्छ ऐसा करो ना कि मैं सब के सामने आप के सामने आ सकु."
प्रिन्स, मुझे ऐसा क्या करना चाहिए ?"
शादी कृष्णा बोली.
प्रिन्स,शादी, क्या बात कर रही है तू, एक अकाउंटेंट की बेटी की हेसियत क्या है जो तू मुजसे शादी करेगी ?
कुमार आप ने ही वादा किया था भूल गये क्या, और इसीलिए मैने अपने आप को पूरी तरह से सौप दिया है, आप को पता है थोड़े ही महीनो मे छ्होटा कुमार आनेवाला है इस कुटिया मे, तब मैं क्या जवाब दूँगी सब को."
चौकन्ना रहकर प्रिन्स ने पुचछा,क्या तू मा बन ने वाली है ?

कुच्छ आवाज़ नही आई, गंगाधर समझ गया की कृष्णा कुच्छ बोलेगी नही लेकिन स्वीकार कर लिया होगा.
तो पहले बोलना था न पगली, मैं तो मज़ाक कर रहा था, ठीक है अगले महीने ही हम शादी कर लेंगे बस प्रिन्स ने वादा किया.
सच कुमार साहिब कृष्णा ने खुश होकर पुछा. ये एक प्रिन्स का वादा है पगली और क्षत्रिया ज़बान के बड़े पक्के होते है. प्रिन्स बोला. चल थोडा जाम पीते है इस खुशी के मौके पर.
नही बाबा लड़किया शराब नही पीती. कृष्णा बोली. अरे लड़किया नही पीती होगी लेकिन रानी तो पीती ही है ना, अब तू मेरी रानी बन ने वाली है तो क्या आदत नही डालेगी ? प्रिन्स बोला.
देखो कुमार आप हर बार कुच्छ ना कुच्छ सरबत या कुच्छ पीला देते हो जिस से हमेशा मुझे नींद आ जाती है, फिर आप ना जाने कहा चले जाते हो और मैं अकेली यू ही पड़ी रहती हू. इसीलिए शायद मेरे बाबूजी को भी पता चल गया है हमारे बारे मैं. कृष्णा बोले.
तेरे बाबूजी को सब पता है पगली इसीलिए तो जो मैं कहता हू वैसा ही उसे करना पड़ता है समझी. प्रिन्स ने हासकर जवाब दिया. चल जल्दी कर पीती है या नही, चल मेरे होंठो से पी. प्रिन्स बोला.
थोड़े देर कृष्णा की दबी दबी आवाज़ आई ओउ, उउउउ. गंगाधर समझ गया की प्रिन्स ने कृष्णा को ज़बरदस्ती शराब पिलाई है.
उसने थोड़ा उठाकर देखा तो प्रिन्स अपने कपड़े उतार रहा था बिल्कुल नंगा होकर अब प्रिन्स ने कृष्णा को खड़ा किया और एकदम जोरो से उसके होंठो को चुंबन करने लगा. कृष्णा के मूह से उउउउउउउउ.एयेए आहे निकल ने लगी. प्रिन्स ने उसका एक हाथ पकड़ कर नीचे अपने लंड पर रखा. कृष्णा फ़ौरन दो कदम हटी. वो बोली, कूम कू एमेम आ र, प्लीज़ अब शादी के बाद प्रिन्स बोला,ये तो सेलेब्रेशन है मेरी जान कहकर उसने कृष्णा को जबर्दाश्ती सुलाया और उसने जो साडी पहनी थी वो शोल्डर से अलग की और ब्लाउस के हुन्क एक के बाद एक खोले, पूरा ब्लाउस निकाल दिया और कृष्णा ने अंदर ब्लॅक ब्रा पहनी थी उसकी अंदर दबे हुए योवन कपोलो को उपर से ही मसलना शुरू कर दिया. गंगाधर से आगे नही देखा गया तो नीचे झुककर बैठ गया लेकिन दूसरे रूम के कीहोल से विक्रम सबकुच्छ देख रहा था. प्रिन्स ने कृष्णा की साडी पूरी उतार दी, अंदर के पेटिकोट के नाडे को ज़ोर से खिंच कर निकाल दिया अब कृष्णा के शरीर पर सिर्फ़ काले रंग के ब्रा और निकर थे. प्रिन्स का लंड एकदम तना हुवा था, करीब 6 से 7 इंच लंबा होगा. एकदम काला था और पूरी चॅम्डी बाहर आ चुकी थी. रोज के उपयोग से चमड़ी बाहर आने से कभी कोई दर्द महसूस होता ही नही था. लेकिन प्रिन्स के हाथ अब कृष्णा के स्तन को इतने जोरो से मसल रहे थे कि शराब के नशे मे भी कृष्णा जोरो से चिल्ला रही थी. प्रिन्स ने चिल्लाटी हुई कृष्णा का मूह अपने होंठो से बाँध किया. और कृष्णा ने धक्का देकर उसे भी बेड पर गिरा दिया. अब कृष्णा के मूह से उउउउ जैसी ही आवाज़ निकलती थी. थोड़ी देर के बाद प्रिन्स को महसूस हुवा कि ऐसे तो कृष्णा का सांस भी लेना मुश्किल है. इसीलिए वो खड़ा हुवा और 5 सेकेंड खड़ा रहा. कृष्णा की साँसे फूली हुई थी. शराब के कारण आँखे लाल थी, होठ पर काटने के निशान पड़ चुके थे और स्तन के निपल्स तनकर बाहर आने को बेताब थे. प्रिन्स के साधन पर अभी भी कृष्णा का हाथ हिल रहा था. जिस से प्रिन्स खल्लास होनेवाला था. ज़्यादा देर ना करते हुवे प्रिन्स जैसे ही ब्रा के हुक खोलने के लिए सोई हुई कृष्णा के पीठ के नीचे हाथ ले गया. और हुक खोलकर ब्रा निकाल दी और ज़ोर से दोनो निपल्स दबाए. हर औरत का कुच्छ ना कुच्छ सेन्सिटिव जगह यानी सेक्स पॉइंट उसके शरीर मे होता है अगर उसे च्छू जाए तो वो सेक्स की चरमसीमा का अनुभव कर सकती है. कृष्णा का वो सेन्सिटिव पॉइंट था स्तन के निपल्स. प्रिन्स ने जैसे दाई ओर का निपल मूह मे

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लेकर चूसना शुरू किया की क्रिशना जोरो से कराह उठी,आआआहह उउउउउउउह्ह्ह्ह्ह्ह और उसका हाथ प्रिन्स के साधन को बेरहमी से मसल्ने लगा. खुद प्रिन्स इतना खो गया की अंदर बाहर होते हुवे कृष्णा के हाथ से प्रिन्स खल्लास हो गया. बस वीर्या की तीन या चार बूँद गिरी होगी और प्रिन्स खल्लास हो गया. ज़्यादा सेक्स कर ने से प्रिन्स को कभी ज़्यादा वीर्य टिकता ही नही था और सेक्स भी ज़्यादा देर तक नही कर पाता था. लेकिन आज तो कृष्णा ने उसे कोई मौका ही नही दिया और कुच्छ करने से पहले ही वो खल्लास हो गया. प्रिन्स को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन अब वो क्या कर सकता था. उसको पता था कि दूसरे राउंड मे देर लगेगी और आज तो इतना टाइम भी नही था. हाँफटे हुवे उसने भी अपने हाथ की उंगली कृष्णा की योनि मे डाली और जोरो से अंदर बाहर करके करके कृष्णा के स्तन को जोरो से चूसना शुरू किया. थोड़ी ही देर मे कृष्णा भी खल्लास. फ़ौरन प्रिन्स ने कपड़े पहने और कृष्णा की ओर देखा तो वो शराब के नशे मे बेहोश थी और उसकी साँसे तेज़ चल रही थी, आज पहली बार उसको शराब पिलाई थी वरना अक्सर प्रिन्स उसे नींद की गोलिया पिलाता था ता की उसे ज़्यादा मालूम ना हो कि उसके साथ कैसे कैसे संभोग किया गया है. ऐसे ही वो गर्भवती भी हो चुकी थी. प्रिन्स कृष्णा के शरीर पर साडी डाली और ऐसी ही हालत मे छ्चोड़कर बाहर आया और बोला,विक्रम इसे कपड़े पहना देना और जल्दी ही सब समेटकर मेरे पास आ जाओ कुच्छ इंपॉर्टेंट बाते करनी है.
विक्रम ने प्रिन्स को पुचछा,क्या आप इन से शादी करेंगे ?. प्रिन्स बोला,हा ज़रूर करनी ही पड़ती मुझे, लेकिन अगर ज़िंदा रही तो."
दोनो जोरो से हस्ने लगे और वाहा से चल दिए.

गहरा सदमा पहुचा था गंगाधर को, कि प्रिन्स तो ठीक लेकिन ऐसी साज़िश मे उनका खुद का खून विक्रम भी समिल था. वो फ़ौरन लौटे और रात भर सोचते रहे.
दूसरे दिन सुबह उसने अकाउंटेंट मानिकलाल को बुलाया सब बात की तो मणिकलाल ने बताया कि वो सबकुच्छ जानता है लेकिन अगर उसकी बेटी इस राजघराना की बहू बने तो बुराई क्या है. गंगाधर ने कुच्छ ज़्यादा बताना उचित नही समझा और उसने एक टेलएग्राम नारायनप्रासाद को किया की फ़ौरन जोधपुर आए. नारायनप्रासाद तुरंत जोधपुर पहुचा और दोनो आमने सामने बैठे और नारायनप्रासाद बोले, क्या बात है कि आप ने तार कर के मुझे बुलाया"
मैं जो बोलने जा रहा हू उसे ध्यान से सुनो, आज के बाद इस घर की देखभाल के लिए मैने मानिकलाल के पुत्र बंसी की नौकरी यहा लगा दी है. महाराज ने मेरा प्रस्ताव स्वीकार किया है क्यूकी प्रिन्स के चुंगल से कृष्णा को बचाना ज़रूरी है. गंगाधर ने सब बाते नारायनप्रासाद को बताई और अंत मे बोले,देखो नारायण मुझे अपने बेटे पर कोई भरोसा नही. इसीलिए अगर मेरी मृत्यु हो गयी तो मेरी सारी संपाति का वारिश अकेला विक्रम होनेवाला है. अगर इतनी सारी दौलत उसके हाथ लग गयी तो ना जाने वो आगे क्या कुच्छ नही करेगा. इसीलिए मेरे बाद ये पूरी मिल्कत का तू गार्जियन बनेगा और तेरी जानकारी के बगैर एक पाई भी विक्रम के पास नही जाएगी."
लेकिन ये कैसे हो सकता है गंगाधार्जी नारायनप्रासाद बोले.

बीच मे कुच्छ मत बोलो नारायण सिर्फ़ सुनते रहो अभी मुझे महाराजा के पास जाना होगा और इसके बाद हम दोनो कोर्ट मे जाके वसीयत भी कर आएँगे, जब भी ज़रूरत होगी तुम्हे यहा आना पड़ेगा इसका पूरा आनेजाने का खर्चा तुम्हे अपने आप ही मिल जाएगा ऐसी व्यवस्था मेने कर दी है. तेरे बेटे की पढ़ाई के लिए और उसके प्रयोगो के लिए जो भी खर्चा होगा वो मैं उथाउन्गा अगर मेरी शर्त तू मान लेता है तो. दूसरा मेरी बहुत तमन्ना थी कि तेरी बेटी सुनंदा को अपने घर की बहू के स्वरूप मे देखु, लेकिन अगर तू विक्रम को सुधार पाया और तुझे सही लगे तो मेरा ये सपना पूरा करना वरना कोई ज़रूरत नही उस नादान की ज़िंदगी को बिगाड़ने की. दूसरा मैने ये सारी बात बंसी को बताई है. वो आज से ही यहा काम पर लग गया है. तू जब भी जूनागढ़ से यहा आएगा बंसी तब तक का विक्रम का पूरा रहन सहन तुझे बताएगा इसके आधार पर ही तुझे आगे के निर्णय लेने है."
लेकिन बंसी पर मैं भरोसा कैसे करू, वो भी तो विक्रम से मिला होगा तो नारायनप्रासाद ने पुचछा.

ऐसा कभी नही होगा बाबूजी बंसी चाय लेके आया और बोला,हम पर बहुत बड़ा उपकर किया गंगा बाबू ने कि हमारी बहन कृष्णा को बचा लिया.
वो कैसे ? नारायनप्रासाद ने पुचछा.
महाराजा से कहकर इस स्टेट के खर्चे पर ही मेरी बहन कृष्णा को ज़्यादा पढ़ाई के लिए विदेश भेजा जा रहा है, और इस मे महाराजा की स्वीकृति हमारे गंगा बाबू ने दिलाई है. कृष्णा विदेश चली जाएगी तो प्रिन्स के हाथो से ज़रूर बच जाएगी और मेरी बहन ज़िंदा रह पाएगी. कृष्णा को हालत से वाकेफ़ किया जा चुक्का है और वो राज़ी है विदेश जाने के लिया. तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि हम विक्रम बाबा को सुधारे और साए की तरह उनके पिछे रहे."
लेकिन कृष्णा का बच्चा ?, नारायनप्रासाद ने सवाल पुचछा.

वो मे अकेला जानता हू या मेरे बाद बंसी जान पाएगा की उसके बारे मे क्या किया गया है. गंगाधर ने जवाब दिया.
दोनो दोस्तो की आँखो मे एक द्रढ निश्चय दिखाई दे रहा था.


किशोरीलाल बोलता जा रहा था,इस तरह से विक्रम का पूरा देखभाल गंगाधर के मरने के बाद नारायनप्रासाद के हाथ मे आया और उधर कृष्णा को विदेश भेज दिया गया ता की उसकी जान बच जाए. और तभी से बंसी चौकन्ना होकर विक्रम का साए की तरह पिच्छा कर रहा है. लेकिन विक्रम बहुत चालाक है उसके शौक इतने बढ़ चुके थे कि और पैसो के लिए उधर लेना भी चालू कर दिया. नारायनप्रासाद हर वक़्त तो यहा नही रह सकते और बंसी रोज रोज तो उसे खबर नही पहुचा पाता.

और उस से भी आगे विक्रम पहुच चुका है. महाराजा की मृत्यु और प्रिन्स का भी आक्सिडेंट होने के बाद विक्रम की दोस्ती नामी गुन्दो से होने लगी है और बंसी का मान ना है की अब विक्रम शायद कुच्छ असामाजिक प्रावत्ती भी करने लगा है. हर रोज किसी कोठे पे आना जाना है और कोठे वाली के पास विक्रम का कुच्छ राज च्छूपा है तो वो ब्लॅक मैल भी करती है. शायद इसी वजह से कुच्छ बातचीत करने के लिए विक्रम पिताजी को तीर्थयात्रा पे ले गया था. सुनंदा से शायद वो प्यार तो करता ही था लेकिन बाबूजी की इच्छा नही थी इसीलिए शायद बंसी को और अब तो मुझे भी शक है कि सुनंदा की मृत्यु नही बल्कि खून किया गया हो. अकेली सुनंदा ही नही बल्कि माताजी, और पिताजी की मृत्यु के बारे मे भी कुच्छ तलाश करनी होगी. ये सब बाते बताने के लिए शायद वक़्त बहुत कम था क्यूकी अभी 7 दिन पहले ही एक कवर बाइ पोस्ट आया और जब विक्रम ने पढ़ते ही डाइरेक्ट आग मे झोंक दिया और उठाके चला गया तो बंसी ने उस कवर को आग से निकाला और फोटोग्रॅफ्स देखकर उसे फ़ौरन शक हुवा कि शायद वो कन्याकुमारी के है और सुनंदा की मेडिकल रिपोर्ट पढ़ी, उसे इंग्लीश आती है और इसीलिए ये सबकुच्छ हमे बताने के लिए उसने ही यहा आने पर मुझे ज़ोर दिया. यहा आया तो वो डाइरेक्ट तो मुझे नही बता सकता था क्यूकी विक्रम का डर था लेकिन विक्रम को वो बचाना भी चाहता था और मुझे बताकर वफ़ादारी भी निभाना चाहता था इसीलिए उसने जानबूजकर वो कवर हमारे कमरे मे रखा जिसकी सज़ा उसे एक तमाचे से हुई है कहकर किशोरीलाल बैठ गया.
दोनो की आँखो मे आँसू आए. राजेश्वरिदेवी बोली,अब आप क्या करोगे."

देखो राजेश्वरी, विक्रम ने अगर गुनाह किया है तो कुच्छ सज़ा तो ज़रूर भोगतनी होगी लेकिन मैं चाहता हू बाबूजी और अंकल (गंगाधर) का सपना भी पूरा हो, मेरा मतलब है अगर विक्रम सही रास्ते पर आए तो हमारे लिए और खुशी की बात कोई ना होगी. वैसे भी वो बाबा की अमृतवानी याद है ना शायद विक्रम की बेटी से ही हमारे जय की शादी लिखी हो और आनेवाला युग का कुच्छ कल्याण हो ऐसा अगर है, अगर किस्मेत मुझे इसीलिए यहा खिच लाई है तो मैं कोशिश ज़रूर करूँगा."
लेकिन अब इस कार्य मे ख़तरा है राजेश्वरिदेवी बोली.

ख़तरा है तो हमे वो जोखिम उठाना होगा, इस बेटे के लिए, आनेवाले युग के लिए, और मुझे विश्वास है की महादेव हमे ज़रूर आशीर्वाद देंगे, मुझे विश्वास है तुम भी हिम्मत से कम लोगि और आगे जैसा भी समय आएगा तुम मेरा साथ निभओगि किशोरीलाल द्रढ विश्वास के साथ बोला. बोलो मेरा साथ दोगि ना ?, किशोरीलाल ने पुचछा. राजेश्वरिदेवी आगे आई और अपने पति की आँखो मे आँखे डाल के बोली, मैं आप की पत्नी हू, आज पहली बार किसी पुरुष को अग्निपरीक्षा देते हुए देख रही हू, मुझे आप का साथ देना ही होगा, चाहे कुच्छ भी हो जाए, राजेश्वरिदेवी ने मक्कम्त से अपने पति का हौसला बढ़ाया.

और दोनो पति पत्नी गहरी सांस लेके एक्दुजे मे खो गये. तभी बंसी चाय लेकर हाजिर हुवा और उसने दोनो पति पत्नी की आँखो से पता लगा लिया कि उन तीनो को अब क्या कर्तव्यपथ पर चलना है. उसकी आँखे भी भीगी हुई और दोनो हाथ जोड़कर उम्र मे छ्होटी लेकिन कर्तव्य मे उनसे भी बड़ी साबित हुई ऐसी राजेश्वरिदेवी के पाव छु लिए.

एक पुत्र अपने पिता के कर्तव्यपथ पर चलने के लिए, अपने जिगरी दोस्त को सही रास्ता दिखाने के लिए कटिबध हुवा था, एक पत्नी अपने पति के कर्तव्यपत पर काँटे पर चलने के लिए तैयार थी और एक वफ़ादार नौकर बंसी अपने बाबा को बचाने के लिए सबकुच्छ करने को, जान की बाजी लगाने को तैयार था, लेकिन किशोरीलाल, बंसी और राजेश्वरिदेवी की यही ग़लती एक ऐसा सैलाब लाने वाली थी उस सैलाब मे बहुत कुच्छ बह जाने वाला था. जाने कहा ????
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क्रमशः................


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