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  #71  
Old 4th April 2013
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मम्मी की नौकरी - 3

मम्मी की नौकरी - 3

तभी मम्मी अपनी भारी चौडी चुतड हिलाती हुई अलमारी की और जाने लगी । मम्मी की उभरी गांड की थिरक देख मेरा लंड कडा हो गया । अलमारी के निचले भाग से जब कुछ चिजेँ निकालने के लिये झुकी तो उनकी गांड और चौडी हो गई और गांड के दरार के बिच भूरे रंग का छेद दिखाई पडा साथ में छेद के निचे बडा सा लंड अंडकोष के साथ लटकी हुई थी । मम्मी की इतनी चौडी गांड और लंड देखकर मेरा तनाव बढता गया और मैँ मुठ मारने लगा ।

मम्मी कुछ चीजें निकाल कर उठी और वापस टेबल के पास आई तो मैंने उनकी हाथ में एक सिगारेट और कंडोम का पैकेट देखा । मुझे फिर से झटका लगा ! मम्मी सिगारेट भी पीती है ? खैर ! पर कोँडम क्या करेगी ? फिर मम्मी एक सिगारेट निकाल के लगाई और कश लेने लगी । मम्मी की नंगी बदन और हरकत देखकर मेरा बदन उत्तेजना के मारे काँप रहा था, सांसें फूल रही थी । मम्मी को शायद यकिन था कि मैं 4.00 बजे के बाद ही लौटुंगा इसीलिए अकेली होने के कारण नंगी होकर मजे उठा रही थी ।

क्या नजारा था, मेरी 38 साल की मम्मी नंगी खडी एक हाथ से सिगारेट पकड कर लम्बी लम्बी कश ले रही थी और दुसरी हाथ से अपनी बडी लंड को धिरे धिरे आगे पिछे कर रही थी । तभी सिगारेट को होंठों पर दबाकर मम्मी एक कंडोम निकाली । उनकी लंड अब पूरे तनाव में आ चुका था ।फिर मम्मी अपनी लंड के सुपाडा को पुरी निकाली और कंडोम को सुपाडी पर रख कर लंड के जड़ तक रोल की । अब कंडोम उनकी लंड से चिपक गई, कंडोम परदार्सी होने के कारन मम्मी की लंड साफ दिख रही थी, जिससे मम्मी की लंड पूरे तनाव के साथ अप-डाउन होने लगा । अब पूरी तनाव में उनकी लंड लगभग 8 इंच का हो चूका था, ये देख कर मेरा बदन में आग लग गया ।

अब मम्मी सिगारेट का आखिरी कश लेकर आस-ट्रे पर फैंक दी और बिस्तर पर अपनी मांसल जांघों को फैला कर लेट गई । और ऑंखें बंद कर के एक हाथ से चुचियां दबाती हुई दुसरे हाथ से अपनी लम्बी और मोटी लंड मुठ्ठी में लेकर हस्तमैथुन करना शुरु कर दी ।

मम्मी की ये हाल देख कर मेरा हालत भी खराब हो रहा था । बहुत अद्भुत द्रुश्य था । एक औरत अपनी बड़ी सी लंड से हस्तमैथुन कर रही थी, और व औरत मेरी मम्मी थी । अब मम्मी मूँह से अजिव आवाजें निकाल कर सिसकारीयां ले रही थी । मम्मी चुचियों को मसलते हुए जोर-जोर से लंड मुठिया रही थी । उनकी होंठ दांतों तले दबी हुई थी और मम्मी अपनी भारी गांड जोरों से उछालती हुई सिसकारियां ले रही थी ।

तभी मम्मी एक उंगली चाट के गिली की और सिधे गांड के छेद में अंदर पेलने लगी । अब मम्मी ने अपनी हाथ की रफ्तार बढ़ा ली और लंड को कस के पकड कर जोर से हस्तमैथुन करने लगी । दुसरे हाथ से चुचियों को मसलती हुई मूँह से अजिव आवाजें निकाल रही थी और चुतड हवा में जोर-जोर से उछाल रही थी ।


करीब दस मिनट तक अपनी लंड को हिलाने के बाद अचानक मम्मी चिल्लाने लगी मानो रो पडेगी, मैं समझ गया अब व झडने वाली है । तभी मम्मी जोर से चिल्ला पडी और दो-तिन बार अपनी गांड जोर से उछालने के बाद निढाल हो गई । मम्मी की सांसें जोर से चल रही थी, उनका पूरा बदन कांप रहा था । शायद व झड रही थी ।

मैं बडे ही उत्सुकता से मम्मी की लंड पर नजरें गडाए रखा था । क्या सचमुच मम्मी की औरत वाली लंड से वीर्य निकली है ? करीब पाँच मिनट तक पड़े रहने के बाद से उठी खडी हुई, अपनी लम्बे बालोँ को संवारी जो हस्तमैथुन के समय बिखर गई थी । उनकी लंड एकदम मुरझा गया था फिर भी काफी मोटा और लम्बा दिख रहा था । कमरे का सामान इधर उधर पड़ी थी तो उसने सामान सजाने लगी । कंडोम अब तक मम्मी की लंड से चिपकी हुई थी, क्या लंड थी मम्मी की, सिकुड़े हुए भी छे इंच का था । चलने से मम्मी की लंड ऊपर निचे थिरक रही थी और पैरों की पैंजम आवाज़ कमरे में गूंज रही थी । मम्मी की लंड की चारों और घने बाल थे ।

फिर मम्मी टेबल के पास आयी और धिरे-धिरे कंडोम को लंड से निकाल ली और उसे देखने लगी । मैंने बड़े ध्यान से देखा कंडोम के टिप पर दो चम्मच के करीब गाढे सफ़ेद पदार्थ जमी हुई थी । मम्मी थोडी मुस्कराती हुई कंडोम को देख रही थी, लंड के साथ झड़ने में मिली आनंद से व तृप्त नज़र आ रही थी । मैं निश्चिंत हो गया कि मम्मी की लंड मर्दों की तरह वीर्य निकल के झडी थी । यही विचार मन में आते ही कि - मम्मी की लंड पूरी मर्द जैसा ही काम करती है, यानी मम्मी बुर भी चोद सकती है .... मैं भी झडने लगा ।

मैंने फिर से परदे के छेद से अंदर झांका, मम्मी की लंड वीर्य से तरा था, मम्मी एक तौलिए से अपनी लंड को पोछ रही थी, लंड के सुपाडा को पोछने के बाद उसे अन्दर सरका दी फिर भी सुपाडा आधा खुला ही रह गया । लंड साफ करने के बाद पूरे बदन के पसीना पोछने लगी ।
मैं अब तक मम्मी की लंड ही देख रहा था । मम्मी को क्या नाम दुँ, औरत या मर्द ? उनकी पूरी शरीर तो है एक औरत का जिस पर बुर नहीं थी । उनकी स्त्री शरीर पर 6 इंच का मोटा और लम्बा लंड था साथ में बडा सा अंडकोष जो आम मर्दों के लंड और अंडकोष के साईज से बडे थे । मम्मी अब एक साफ पेटीकोट निकाल कर पहनने लगी थी ।
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  #72  
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मम्मी की नौकरी - 4

मम्मी की नौकरी - 4

मम्मी अब एक साफ पेटीकोट निकाल कर पहनने लगी थी ।

ये देख कर मैं वहां से खिसक गया । सोचा घर जाउँ या नहीँ, फिर सोचा बाद में जाउंगा । यही सोचकर बाजार चला गया । पागलों की तरह इधर उधर घुमने लगा । बार बार मम्मी की चेहरा सामने आ जाता था । क्या हो गया ......! मम्मी को क्या हो गया, पहले तो व ऐसी न थी, फिर ये लंड ! क्या मम्मी विदेशोँ की नौकरी से इतनी उग्र आधुनिक हो गई कि उसे औरोतों की जिंदगी बोझ लगी ? जिससे मम्मी औरोतों की शरीर में लंड को लेकर खूश है ! क्या औरोतों की भी मर्द जैसा लंड होती है ? उनकी लंड से विर्य भी निकलती है ? ये मैंने अपने घर से जाना ।

मम्मी के साथ रहुं ? या छोड के चला जाउँ ! बार बार मन में ये खयाल आ रहा था । मैं गुस्से के साथ साथ मम्मी की लंड की खयाल आते ही उत्तेजित भी हो रहा था । कब अंधेरा हो गया पता नहीँ चला शायद मम्मी परेशान हो रही होगी । आखिर जैसी भी हो व मेरी मम्मी है । व कैसी जिन्दगी जीना चाहती हैं, व उनकी निजी जिन्दगी है, मैंने तय किया कि मैँ अब मम्मी की जिन्दगी में दखल नहीं दुंगा ।

घर पहुंच कर देखा मम्मी किचन में खाना बना रही थी । मम्मी एक लाल रंग की साडी और काले रंग की ब्लाऊज पहन रखी थी । साडी की पल्लु को मोड के कमर में लटका दी थी जिससे उनकी चौडी चुतड की उभार बडी सेक्सी लग रही थी । कितनी मासूम लग रही थी मम्मी, पर साडी के अंदर गांड के साथ उनकी 6 इंच लम्बा और मोटा लंड की कल्पना करते ही मेरा लंड फिर से खडा हो गया ।

मुझे देखते ही मम्मी सवाल करना शुरु कर दी -

"कहां था अब तक ? कितनी परेशान हो गई थी मैं ।"

मैंने कोई जवाब नहीँ दिया ।

"मैं पुछ रही हुं अब तक कहाँ था तु ?" मम्मी दुबारा पुछी ।
फिर भी मैंने कोई जवाब नहीँ दिया ।

"मैं तुमसे कुछ रही हुँ । सुनाई देता है कि नहीं ?" उन्होंने डांटते हुए बोली ।

" दोस्तों के साथ बाहर गया था ।" मैंने जवाब दिया । मम्मी को कहाँ पता था की उनका बेटा आज दोपहर को उनकी ऐयाशी जिन्दगी की रहस्य जान चुका है ।

"कितनी बार तुझे मना किया है बाहर मत जा, अभी तु नया है इस शहर में ।" मम्मी बोली ।

मैंने कुछ नहीं बोला और अपने कमरे में चला गया । मम्मी हैरानी से मुझे देखती रही और मन ही मन बोल उठी "आखिर इसे हो क्या गया ।"

उन्हें क्या पता की मेरे अंदर क्या चल रहा है ।

दुसरे दिन सुबह उठते उठते 8.00 बज चुके थे । मम्मी आँफिस के लिए तैयार हो रही थी । कल की यादें तजा ही गई, कैसे मैं जल्दी वापस आने से मम्मी की गहरी राज का पता चला I मम्मी है तो एक औरत मगर उसकी बुर नहीं थी I मर्द जैसा ही एक बड़ा सा लंड थी मम्मी की .... तभी फोन रिंग हुई और मैंने उठकर रिसीव किया तो मुझे मम्मी को शेखर नाम के किसी आदमी से बातेँ करते सुनाई दी । हमारे एक ही लाँड-लाईन पर दोनों कमरे की फोन संजोग था तो मुझे दोनों की बातें सुनाई दी । मम्मी धिमी आवाज में उस आदमी से बातें करते सुन मैंने ध्यान से दोनों की बातें सुनने लगा


मम्मी- "देखो शेखर अब मेरा बेटा मेरे साथ है । अब
मैं नहीं चाहती कि पहले जैसा हम सब करें ।"

शेखर-"पर मैडम आपका बेटा तो दिन भर काँलेज में होगा न।"

मम्मी- "नहीं !, उसे शक हो जाएगा ।"

शेखर- "तो आप यहाँ आ जाईए । मैँने अपने दूर के रिश्तेदार को मना लिया है । बेचारी के पति ने उसे छोड दी है । उसकी उम्र थोडी ज्यादा है, लेकिन है बडी मस्तानी ।"

मम्मी- "क्या कहा तुमने ? वंदोबस्त हो गया ? वाह! तुमने मुझे खुश कर दिया । तुम्हारी बातें सुनते ही मेरी लंड में तनाव आना शुरु हो गया । ठिक है, मैं आज शाम को आँफिस के बाद जाउंगी ।"

मैंने मम्मी की बातें सुनकर सोच में पड गया । मम्मी शाम को कहाँ जाएगी, वहां जाकर क्या करेगी जो मेरे यहाँ रहने से नहीं कर पा रही है ।
इतने में मम्मी आवाज लगाई -
"बेटा खाना लगा दिया है खा लेना । मुझे आँफिस के लिए देर हो रही है, हाँ और शाम को मेरा मीटिंग है, मुझे लौटने में देर हो जाएगी ।"

"हाँ मम्मी ।" मैंने जवाब दिया ।

मम्मी के जाने के बाद मैंने तैयार होकर काँलेज के लिए निकल पडा । पढाई में बिल्कुल मन नहीं लगा । बार बार मम्मी की बातें याद कर रहा था । आखिर मम्मी मेरे यहाँ आने से पहले शेखर के साथ क्या करती थी जो मेरे आ जाने से नहीं करना चाहती । बाहर जाकर करना चाहती
है । फिर मैंने फैसला कर लिया कि आज मम्मी की पिछा करुंगा और सारा सच्चाई जान के रहुंगा ।



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मम्मी की नौकरी - 5

मम्मी की नौकरी - 4

फिर मैंने फैसला कर लिया कि आज मम्मी की पिछा करुंगा और सारा सच्चाई जान के रहुंगा ।
मैं 4.00 बजते ही एक दोस्त की बाईक लेकर सिधे मम्मी की ऑफिस पहुंच गया । अंदर उसकी गाडी खडी थी । मम्मी अब तक ऑफिस में ही थी । में बाहर एक गाडी के पिछे अपने आप को छुपाए रखा और इंतजार करने लगा कब मम्मी बाहर निकलेगी । करीब 6.00 बजे मम्मी की गाडी बाहर आते देख में सावधान हो गया, जैसे ही मम्मी की गाडी आगे निकल गई में उसका पिछा करना शुरु कर दिया ।

मैंने अपना चेहरा एक स्कार्फ से बांध दिया ताकि मम्मी मुझे पहचान न सके । मम्मी गाडी तेजी से चला रही थी । पांच मिल दूर जाने के बाद मम्मी एक बंगले के सामने रुकी और हर्न बजाने लगी । हर्न सुनते ही एक आदमी आकर गेट खोल दिया और मम्मी गाडी अंदर की । उस आदमी ने गेट बंद कर दिया और गाडी से उतरती मम्मी की होंठों को चुसने लगा और बोला -

"आप ने आने में बहुत टाईम लगा दी ।"

"क्या करुं शेखर , अचानक काम आ गया, पर माँ जी हैं या चली गई ?" मम्मी ने शेखर से पुछी ।

"माँ जी ! कौन शोभा देवी ? अरे व तो आज रात भर यहाँ रुकने वाली हैं । आपके बारे में सुन कर उनकी उत्सुकता बढ गई है " ।

"क्या ! " मम्मी चौंक पडी और मुस्कराते हुए शेखर की बाहें हाथ में लिए अंदर जाने लगी । अंधेरा छा गया था, आधे घंटे के बाद मैंने बाईक को एक झाडी में छिपा दी और गेट चढ़ कर अंदर दाखिल हो गया । फिर उस कमरे की और चल दिया जहाँ से उन लोगों की आवाजें आ रही थी । मेरा पूरा बदन उत्तेजना के मारे कांप रहा था, दरवाजा अंदर से बंद था । मैंने पिछे की और चला गया , खीडकी आधी खुली हुई थी । मैंने परदे को अपने पेन से थोडा सरकाया और अंदर झाँकने की कोशिश की तो मुझे अंदर का सीन साफ दिखाई दी ।

अंदर का नजारा देखते ही मेरा लंड कडा होना शुरु हो गया । मम्मी की बदन पे सिर्फ पेटीकोट थी उनकी उभरी चौडी गांड पेटीकोट में समा नहीं रहे थे और व शेखर को बाहों में भरकर चुम्मे ले रही थी । एक अधेड सी औरत को देखते ही मरा लंड एकदम खडा हो गया । उसकी उम्र लगभग 50 के आसपास होगी और बिल्कुल अब के पचपन साल की हिन्दी सिनेमा के अभीनेत्री जयाप्रदा जैसी दिखाई दे रही थी । मैं क्या ! कोई भी उसे देखेगी तो धोखा खा जाएगी । बिल्कुल जयाप्रदा जैसी भारी चौडी गांड, चेहरा और स्तन । शायद वही शोभा देवी है जो मम्मी के लिए ही रुकी हुई थी ।


व एक सोफे पर अपनी पेटीकोट समेत साडी को कमर तक सरका ली थी और अपनी मांसल जांघों को फैलाकर बैठी थी और उन दोनों को देखकर अपनी झांटों से भरी बुर के गुलाबी छेद को सहला रही थी । तभी शेखर ने मम्मी को पिछे से बाहों में भर लिया और मम्मी की गर्दन को चुमते हुए दोनों चुचियों को मसलने लगा । मम्मी आँख बंद किए आहे भर रही थी । शोभा देवी उन दोनों की रमांस देख कर और अपनी रसीली बुर में उंगली पेल रही थी । तभी शेखर ने मम्मी की पेटीकोट को एकदम कमर तक उठा ली, मम्मी पैंटी भी खोल रखी थी । अब मम्मी कमर से निचे नंगी हो गई थी, मोटी मोटी चिकनी जांघों के बिच मम्मी की झांटों से भरा मोटा सा लंड आधा तन कर था । शेखर ने एक हाथ से चुचियों को मसलने और दुसरी हाथ से मम्मी की तने लंड को मुठी में भर कर लाल सुपाडा को अंदर बाहर करने लगा और शोभा देवी की और मुस्कराते हुए बोला -

"हमारी मैडम की लंड कैसी लगी माँ जी ?"

"इतना बडा लंड ! और व भी एक औरत की, आज मैंने पहली बार देखी ।" शोभा बोली ।

"आखिर ये औरत की लंड है माँ जी ।" शेखर मम्मी की होंठ चुमते हुए बोला ।

मम्मी मस्ती में आ...उई.ईईई... करने लगी थी । ये सब देख कर मेरा लंड पैंट के अंदर टाईट हो गया । थोडी देर बाद शेखर मम्मी को छोड दी और बोला -

"आप दोनों गेम चालु रखो, मैँ रात के लिये सामान लेकर आता हुं ।" और व तैयार हो कर बाहर चला गया ।

अब कमरे में मम्मी और शोभा देवी रह गए । तभी में दोनों को बातें करते सुन अंदर झाँका । दोनों केवल पेटीकोट में थे और मम्मी एक सिगारेट लगाई थी । शोभा मम्मी को बोल रही थी -

" में शेखर की दूर के बहन की सास लगती हुं । इसीलिए व मुझे माँ जी कह कर बुलाता है । तुम भी चाहो तो उसी से बुला सकती हो ।"

"ठिक है ।" मम्मी एक कश लेती हुई बोली ।

"मुझे शेखर ने तुम्हारे बारे में सब कुछ बता दिया है ।" शोभा बोली ।

"क्या बताया शेखर ने आपको मेरे बारे में ?" मम्मी पुछने लगी ।

"यहि की कैसे तुम औरोतों के शौकीन यानि एक लेसबियन थी । तुम्हें औरोतों के बुर और भारी गांड बहुत पसंद था ।"

"हाँ मेरे पति तो फौज में थे, इसीलिए मेरी ये आदत बढती चली गई ।" मम्मी बोली ।

"और विदेश की नौकरी तुम्हें आजाद जिन्दगी जीने का मौका दे दिया ।


"हाँ ये बात सच है, विदेश में आकर ही मैंने जाना जिन्दगी के मजे । वरना हमारे देश में एक विधवा की जीवन गुजारना बहुत मुश्किल है । इसीलिए जब मुझे मालुम पडा कि इसी नौकरी में मुझे विदेश जाने का मौका मिलेगा तो मैं बहुत खुश हुई थी ।" मम्मी ने बताई ।

मैं बडे ही ध्यान से दोनों की बातें सुन रहा था ।

"पर तुम्हें इतनी जानकारी कहाँ से मिली ?" शोभा ने पुछी ।

"विदेश में जाते ही मैंने वहां के लोगों जैसा जीना शुरु कर दी थी ।" मम्मी बोली ।

"और तुम्हारे मैनेजर के साथ चक्कर चला ।" शोभा बोली ।

"यही तो इस नौकरी की शर्त था । पर मुझे कोई ऐतराज नहीं था । और एक दिन उसने मुझे एक ब्लु-फिल्म दिखा कर मुझे चोद रहा था ।"

"कैसी फिल्म ?" शोभा ने पुछी ।

" फिल्म के तीसरा भाग में मैंने एक खुबसुरत औरत को देखा जिसकी गांड बहुत भारी था और उसकी बुर के जगह एक बडा सा लंड था और फिर उसने दुसरे औरत और मर्दों को भी अपनी लंड से जम के चुदाई की, और ये बात मुझे बहुत उत्तेजित कर दिया ।" मम्मी ने
बताई ।

"क्या कह रही हो तुम !" शोभा आश्चर्य होकर बोली ।

"हाँ, और उसी दिन के बाद मेरे दिमाग में हर वक्त यही खयाल आता था कि काश ! मेरी भी उसके जैसे....। पति का तो स्वर्गवास हो चुका था । कोई बाधा नहीं था । और हर वक्त इसी चिन्ता के कारण मेरी शरीर में पुरूषों के हरमोन क्षरण शुरु हो गया था ।" मम्मी बताई ।

"और तुम डाँक्टर के पास गई तो पता चला कि तुम पुरुष बनने जा रही हो ।" शोभा बोली ।

"हाँ, ये बात मुझे बहुत परेशान में डाल दिया था । बदलाव तो में चाहती थी मगर पुरे मर्द जैसा नहीँ । में एक बेटे की माँ भी थी । तो मैंने डाँक्टर की सलाह ली ।" मम्मी कहती गई ।


"डाँक्टर ने क्या बताया ?"

मम्मी अब पेटीकोट को उपर कर मुरझे लंड को मसलना शुरु कर दी और कही - " डाँक्टर ने मुझे तीन उपाय बताए ।"

"क्या उपाय बताए ।"

"एक तो में मर्द बन जाउँ और दुसरा था- मुझे सर्जरी करके वापस औरत बनना था और तीसरा था- बिच में बन्द करना ।" मम्मी बताई ।

"बिच में रोक देना मतलब ?" शोभा पुछी ।

"मतलब शरीर को पुरी तरह बदलने से रोका जाए, मतलब जितनी बदल गई है व रहेगा आगे और नहीं बदलेगा ।" मम्मी ने बताई ।

"व कैसे ?"

"हरमोन थेरापी करना होगा जो मैंने किया । पर लंड आधा निकल चुका था इसिलीये मैंने उसे बढ़ने दिया क्योंकि मैं तो लंड चाहती थी और वाकी अंग पहले जैसा ही रहा । दवा लेने से वाकी अंग नहीं बदले और इस तरहा औरत तो बनी रही मगर लंड के साथ और मैँ अपनी लंड को लम्बा, मोटा और पूरी तरह से चोदने लायक बनाने के लिए दो साल तक testosterone लेती रही ।" मम्मी बोली ।

"ये testosterone क्या होता होता है ?"

"ये लेने से लंड ठीक से बढ़ता है और लंड मेँ ताकत के साथ साथ पुरुष जैसे वीर्य भी आता है ।" मम्मी ने अपनी बात पूरी की ।

"पर तुम्हारी लंड इतनी लम्बा और मोटा कैसे बन गया ?" शोभा देबी ने मम्मी से पूछी ।

"मम्मी ने थोड़ी मुस्कुराई और अपनी लंड को सुपाडा पर ऊँगली फिरती हुई बोली - बात दरअसल ये है की, बचपन में मुठ मरने से या गन्दी आदत की वजह से लड़कों का लंड ठीक से बढ़ नहीं पता । और मेरी तो कोई गन्दी या ख़राब आदत नहीं थी, इसीलिए मेरा लंड पूरी तरह से बढ़ कर इतना लम्बा और मोटा हुआ है । लेकिन मेरा अंडकोष थोडा ज्यादा बड़ा हो गया है ।" मम्मी ने बताई ।

"क्यूँ इतना बड़ा हो गया है ।"

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रच्चू डार्लिंग
मैं शादी शूदा हूँ और वड़ोदरा में रहता हूँ...लेकिन मेरी बीबी कई सालों से मुझसे अलग रहती है हमारे बीच डिवोर्स का केस चल रहा है........
अकेले रहते रहते कई साल हो गए हैं दिन तो कट जाता था लेकिन रात काटना थोडा मुश्किल होता था ... सो मैंने एक मेट्रीमोनियल साईट पर अपना प्रोफाइल बनाया .....और मुझे बहुत सारे प्रोफाइल आये पर एक दिन एक ऐसी लड़की का प्रोफाइल आया उसका भी डिवोर्स केस चल रहा था ...... और वो अकेले दिल्ली के पास एक हॉस्टल में रहती थी और एक कंपनी में काम करती थी..........दोस्तों उसकी फोटो देख कर तो मैं फ़िदा हो गया जितनी सिम्पल दिखती थी उतना ही मस्त फिगर था .......मैंने प्यार से उसका नाम रच्चू रखा था......बहुत दिनों तक हम एक दूसरे को मेल करते रहे ....फिर एक दिन उसने मुझे अपना मोबाइल नंबर दिया और उसके बाद हमारे बीच बातों का सिलसिला शुरु हो गया..........पहले तो 10 -15 दिन में कभी कभी बस थोड़ी बाते ही होती थी लेकिन बाद में लगभग हर रोज रात को आधा घंटा और कभी कभी घंटो तक बातो का सिलसिला चलने लगा .........
वैसे तो हमें एक दूसरे को जानते हुए 3 -4 साल हो चुके थे लेकिन हम कभी मिले नहीं थे हाँ एक दूसरे का फोटो जरुर देखा था ......और ये सब एक दिन अचानक ही हो गया ...............................बात जनवरी 2010 के दिनों की है रात को बात करते करते मैंने अचानक मिलने की जिद की तो पहले तो वो तैयार नहीं हुई लेकिन बाद में मुझसे मिलने के लिए तैयार हो गयी.......मैंने दिल्ली से वड़ोदरा की आने जाने की 3एसी की टिकट करा के उसके पास भेज दिया....और फिर मुझे फ़ोन किया की मैं ट्रेन में बैठ गयी हूँ तुम मुझे स्टेशन लेने आ जाना ............ये सुनकर मैं बहुत खुश हुआ और दोस्तों यकीन मनो मुझे उस रात नींद नहीं आई और सारी रात करवटें ले कर रात गुजारी और सुबह होते ही वड़ोदरा स्टेशन भागा उसको लेने के लिए......और जैसे ही वो ट्रेन से उतरी मुझे देख कर शर्मा गयी मैंने भी मौका देख कर चूकना अच्छा नहीं समझा और उसको तुरंत गले से लगा कर स्वागत किया ...और गले लगने के बाद उसकी शर्माहट थोड़ी कम हुई .......खैर वहां से मैं उसे अपनी मोटरसाइकल पर बैठा के घर ले आया ....मैंने रास्ते में ही उसके छोटे छोटे और एक दम कसे हुए उभारों को महसूस कर लिया था.........
घर पहुच कर मैंने उसे कहा की की तुम नहा कर फ्रेश हो जाओ क्यूंकि सफ़र से थक गयी होगी ..और मैं तुम्हारे लिए चाय बना के लाता हूँ और थोड़ी देर बाद जब वो नहा कर निकली तो क्या क़यामत लग रही थी उसके ब्लाउज में उसकी उसकी जवानी समां नहीं पा रही थी और ऐसा लग रहा था की बस उसकी दोनों चूचियां ब्लाउज के बटन तोड़ कर बाहर आ जाएँगी....और उनके बीच की घाटियाँ तो ऐसे लग रही थी की बस अभी उसमे डूब जाऊं ....वो भी भांप गयी और साडी के पल्लू से ढकते हुए मेरे बगल में आ के बैठ गयी और चाय पीने लगी.....चाय पीते पीते हम थोड़ी इधर उधर की बातें करने लगे .....................
चाय पीने के बाद वो खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर देखने लगी...मैं जाकर उसके पीछे खड़ा हो कर उसे खिड़की के बाहर के नज़ारे के बारे में बताने लगा और इसी दौरान मैं पीछे से उससे चिपक कर खड़ा हो गया और उसकी कमर में हाथ डाल कर उसकी पीठ पे किस्स किया और फिर उसकी उसके गले में किस्स किया और मैंने अपने होंठ उसके गलों के तरफ से उसके होंठों की तरफ ले जाने की कोशिश की लेकिन वो हट गयी.....तो मुझे लगा शायद मैंने जरा जल्दबाजी कर दी....और फिर मैं जा कर बेड पर बैठ गया फिर थोड़ी देर बाद वो भी अन्दर आ गयी और मेरे पैरों के पास बैठ कर अपना सर मेरी गोद में रख दिया और आँखें बंद कर ली....तो मेरी हिम्मत एक बार फिर बढ़ी और मैंने इस बार उसके गालों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसके होठों को चूम लिया....जैसे ही मैंने उसके होठों को चूमा वो तड़प उठी..........और मेरे होठों को जोर जोर से चूसने लगी जैसे बहुत प्यासी हो..............
मैंने भी उसके होठों को चूसते हुए ही उसको निचे से ऊपर उठाया और फिर बेड पे लिटा दिया और उसके होठों को चुमते हुए एक हाथ से उसकी ब्लाउज के ऊपर से ही उसकी चुचियों को दबाने लगा तो वो जोर जोर से सिसकियाँ लेने लगी....और उसके हाथ मेरी पैंट के ऊपर से ही मेरे लंड को जोर जोर से दबाने लगे .....फिर धीरे धीरे मैंने उसकी ब्लाउज के बटन खोल दिए और उसकी ब्रा भी उतार दी......उसकी छोटी छोटी एक दम कसी हुई चूचियां छोटे छोटे संतरों की तरह लग रही थी...मैंने एक चूची को मुह में लेकर दूसरे को एक हाथ से जोर जोर से दबाने लगा अब उसकी सिसकियाँ और भी तेज़ हो गयी...और उसने मेरी पैंट की जिप खोल कर मेरे लंड को बाहर निकाल लिया और उसको अपने हाथ से जोर जोर से मसलने लगी.....अब तो मुझसे भी रहा नहीं जा रहा था सो मैंने अपने सारे कपडे उतार दिए और एक दम नंगा हो गया ..फिर मैंने उसकी साडी पेटीकोट और पेंटी उतार दी और उसके दोनों पैर फैला कर उसकी चूत चाटने लगा लेकिन शादी शुदा होने के बावजूद भी उसकी चूत एकदम कसी हुई और गुलाबी रंग की थी....शायद आने से पहले ही उसने अपनी झांटें साफ़ की थी इसलिए उसकी चूत एकदम चमक रही थी......जैसे ही मैंने अपनी जीभ उसकी चूत में डाली वो जोर जोर से सिस्कारियां लेने लगी.....और जोर जोर से अपनी चूत को उछाल उछाल के मेरे मुह पे धक्के देने लगी.....कुछ देर में ही उसकी चूत से ढेर सारा पानी निकलने लगा.....
फिर वो उठी औए मेरे लंड को मुंह में लेकर आगे पीछे करने लगी और जोर जोर से चूसने लगी....दोस्तों क्या बताऊँ लंड चुसवाने में इतना मज़ा आता है मुझे पता नहीं था और मेरी बीबी ने तो आजतक कभी नहीं चूसा था....खैर जो भी हो...उस वक़्त मेरे लंड को उसके मुंह की गर्माहट मुझे परमानन्द दे रही थी.....और थोड़ी देर में ही मुझे लगा की जैसे मेरा लंड रूपी ज्वालामुखी लावा उगलने को तैयार था ...मैंने अपने लंड को उसके मुंह से निकालने की कोशिश की लेकिन उसने इतने जोर से पकड़ कर चुसना शुरू कर दिया की जैसे वो उसी का इंतज़ार कर रही हो....और थोड़ी देर में ही मेरे लंड की गर्माहट मुझे लंड के बाहर भी महसूस होने लगी.....और मेरा सारा पानी उसके मुंह में ही निकल गया और वो भी सारा पानी पी गयी.......और कहने लगी मन आज बहुत दिनों के बाद मुझे किसी के प्यार को महसूस करने का मौका मिला है.....
अब प्लीज़ तुम मेरी आग को शांत करो.....और ये कहते हुए उसने मेरे लंड को फिर से जोर जोर से दबाना शुरु कर दिया फिर मुह में लेकर दोबारा चूसने लगी और जल्दी ही मेरा लंड भी उसकी चूत की गुलाबी दीवारों से होता हुआ उसकी गहराई को नापने के लिया फडफडाने लगा था....मैंने उसे बेड की किनारे तक खिंचा और फिर उसके दोनों पैरों को अपने कंधे पे रख कर उसकी चूत को अपने लंड के सामने ला कर अपना लंड उसपे रगड़ने लगा ...और वो जोर से सिसकियाँ लेने लगी और कहने लगी मन प्लीज़ अब और बर्दास्त नहीं हो रहा मुझसे प्लीज़ मन जल्दी से अपना लंड मेरी चूत में डाल कर मुझे जोर जोर से चोद दो....और मैंने उसकी चूत के छेद पे अपना लंड का सुपाडा रख कर एक जोर का झटका दिया और आधा लंड उसकी चूत की गुलाबी दीवारों के बीच से अपना रास्ता बनता हुआ उसकी चूत की गहराइयों को नापता हुआ आधी दूरी तय कर गया था....
लेकिन वो बहुत जोर से चिल्लाई क्यूंकि 7 - 8 साल से वो अपने पति से अलग रह रही थी और इस बीच शायद उसने सेक्स नहीं किया था इसी वजह से शायद उससे मेरे मोटे लंड की चुदाई बर्दास्त नहीं हुई .....लेकिन आधा लंड घुसाने के बाद मैं रुक गया और उसके होंठों को चूसने लगा और उसकी चुचियों को दबाने लगा तो उसको थोड़ी राहत महसूस हुई और इसी वक़्त मैंने एक जोर का झटका मारा और पूरा का पूरा लंड उसकी गुलाबी चूत को फाड़ता हुआ अन्दर समां गया और उसके बाद रच्चू को भी मज़ा आने लगा और धीरे धीरे उसने हरकत करनी शुरु कर दी और अपने चूतडों को उठा उठा कर चुदाई का मज़ा लेने लगी और कहने लगी मन डार्लिंग मुझे और जोर से चोदो ....हाँ मन प्लीज़ मुझे आज इतना चोदो की मेरी इतने दिनों की प्यास बुझ जाये...इसी बीच में उसने कई बार अपना पानी छोड़ दिया ...और लगभग आधा घंटे की चुदाई के बाद मुझे लगा की मेरे लंड का लावा निकलने वाला है मैंने कहा "रच्चू मेरा निकलने वाला है " तो उसने तुरंत उठ कर मेरे लंड को मुंह में लेकर पहले मुठ मरने लगी और फिर जोर जोर से चूसने लगी और कुछ ही देर में मेरा सारा मॉल निकल गया जिसे उसने बड़े प्यार से चाट लिया .............और उसके बाद हम दोनों ऐसे ही नंगे एक दूसरे से लिपट कर लेटे रहे......और फिर पता नहीं कब हमारी आँख लग गयी और हम सो गए......
और लगभग एक घंटे के बाद मुझे मेरे लंड के पास गर्मी महसूस हुई तो नींद खुल गयी मैंने देखा की रच्चू डार्लिंग मेरे लंड को लोलीपोप की तरह चूस रही थी...मुझे कुछ मीठी मीठी खुशबू भी आ रही थी तो मैंने पूछा ये किस चीज़ की खुशबू आ रही है तो रच्चू ने बताया की किचन में थोडा शहद पड़ा था बस उसे ही तुम्हारे लंड पर लगा कर चूस रही हूँ.....अब तक मेरा लंड भी पूरी तरह तैयार हो चूका था लेकिन मैं इस बार उसकी चूत नहीं चोदना चाहता था असल में मैंने आज तक कभी किसी की गांड नहीं मरी थी सिर्फ ब्लू फिल्मों में ही गांड की चुदाई देखा था और सिर्फ अपने दोस्तों से ही सुना था की गांड मारने में बहुत मज़ा आता है लेकिन आज तक मैं इस ख़ुशी से वंचित था.....तो मैंने मौका देख कर रच्चू से बोला की " रच्चू डार्लिंग क्या तुम मुझे एक बार अपनी गांड चोदने का मौका दोगी " ये सुनकर पहले तो रच्चू के चेहरे का रंग ही उड़ गया बोली " देखो मन डार्लिंग आज करीब पांच सात सालों के बाद मेरी चूत ने किसी के लंड का दर्शन किया है और तुम्हारे इस मोटे लंड ने तो मेरी चूत की चूदाई में ही मेरी जान ही निकाल दी है ....और मैंने आजतक कभी भी गांड नहीं मरवाई है...
इसलिए मुझे डर लग रहा है और बहुत दर्द भी होगा " उसकी ये बात सुनकर मैंने बोला की रच्चू डार्लिंग तुम चिंता मत करो मैं एक दम आराम से गांड मारूंगा और अगर तुम्हे बर्दास्त नहीं होगा तो नहीं चोदुंगा " इस बात पर वो तैयार हो गयी.....और डोगी स्टाइल में मेरे आगे झुक गयी...मैंने भी अपने खड़े लंड के सुपाडे को रच्चू की गांड के छेद पर रख कर अन्दर डालने की कोशिश की लेकिन गांड का छेद बहुत टाईट था और पहला प्रयास बेकार हो गया ....उसके बाद मैंने अपने दोनों हाथों के अंगूठे को गांड के छेद के पास लगा कर छेद को थोडा फैला दिया और उसके बाद अपने लंड के सुपाडे को गांड के छेद में डाल कर चुपचाप शांत हो गया और धीरे धीरे उसको गांड के छेद में फिट करने लगा और जब लंड का सुपाडा पूरी तरह से गांड के छेद में फिट हो गया तो धीरे धीरे लंड को गांड में घुसाने को कोशिश करने लगा लेकिन छेद बहुत छोटा और टाईट था इसलिए लंड एकदम आगे नहीं जा रहा था और रच्चू डार्लिंग को दर्द हो रहा था तो वो चिल्लाने लगी....तो मैंने अपना लंड बाहर निकाल लिया .......
लेकिन तभी मेरी नज़र बगल में रखी शहद की शीशी की तरफ गयी जिसको मेरे लंड पर लगा कर उसने चूसने का मज़ा लिया था...और मेरे दिमाग में आईडिया आया और मैंने उसको दोबारा से डोगी बनने को कहा और शहद लेकर उँगलियों से उसकी गांड के छेद के अन्दर अच्छे से लगा दिया और फिर ढेर सारा शहद लेकर उसकी गांड के छेद पर गिरा दिया और फिर उँगलियों से गांड के छेद को थोडा फैला कर शहद को अन्दर तक अच्छे से लगा दिया और अब धीरे धीरे दो उँगलियाँ डाल कर गांड के छेद को थोडा सा खोल दिया उसके बाद दोबारा लंड के सुपाडे को गांड के छेद में धीरे से सरका दिया और दोनों हाथों से उसके दोनों चूतडों को दोनों तरफ खीच दिया जिससे गांड का छेद थोडा और खुल गया उसके बाद बहुत धीरे से लंड को उसकी गांड में थोडा सा अन्दर की तरफ धकेल दिया लेकिन रच्चू को दर्द हुआ तो उसने अपना हाथ पीछे करके मेरे लंड को पकड़ लिया और पीछे हटने लगी....
और मुझे लगा की अगर अब वो पीछे हट गयी तो मुझे दोबारा गांड को छूने भी नहीं देगी इसलिए मैंने उसकी कमर को अपने दोनों हाथो से जोर से पकड़ लिया और पूरी ताक़त से एक झटका मारा और मेरी हिम्मत ने भी मेरा साथ दिया लंड उसकी गांड को फाड़ता हुआ आधा अन्दर घूस गया लेकिन रच्चू इतने जोर से चिल्लाई की जैसे उसकी जान ही नक़ल गयी हो इसलिए मैंने उसके बाद कोई भी हलचल किया बिना एकदम शांति से वैसे ही खड़ा रहा लेकिन मैंने अपने लंड को भी उसके जगह पे बनाए रखा उसकी कमर को नहीं छोड़ा नहीं तो जितनी जोर से उसने मुझसे अलग होने की कोशिश की थी शायद मेरा लंड बाहर आ जाता और मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाती......लेकिन थोड़ी देर के बाद जब मैंने देखा की अब वो रिलेक्स हो गयी है तो पूरी ताक़त से मैंने दूसरा झटका दिया और इस बार मेरा सपना सच हो गया मेरा पूरा लंड उसकी मस्त गांड के अन्दर आराम फरमा रहा था........अब तो उसे भी मज़ा आने लगा था जिसके इशारा उसने अपनी गांड को आगे पीछे हिला के किया .....उसके बाद मैंने अपने लंड को थोडा सा बाहर निकला और फिर धीरे धीरे अन्दर को धकेला .....उसके बाद रच्चू ने बोला " मन डार्लिंग प्लीज़ जोर जोर से चोदो न .........आज मेरी गांड को भी चोद चोद के शांत कर दो..... ....और जोर से झटके मरो न ..........."
और मैं भी पूरे तन मन से उसकी गांड की चुदाई में लगा हुआ था लगभग आधे घंटे की चुदाई के बाद मेरे लंड से दुबारा लावा फूटने को था सो मैंने कहा की मेरा निकलने वाला है तो उसने कहा की जल्दी से अपना लंड निकाल कर मेरे मुह में डाल दो लेकिन जैसे ही मैंने उसकी गांड से अपना लंड बाहर निकाला और उसके मुह के तरफ ले जाने लगा तभी सारा माल निकल गया और उसकी चूचियों पर गिर गया .....बाद में उसने तौलिये से साफ किया और मेरे लंड की भी सफाई की .....उसके बाद हम दोनों ने बाथरूम में जा कर एक साथ नहाया और फिर रात का खाना बाहर एक होटल में खाया और फिर आकर सो गए .................रच्चू दो दिन तक वड़ोदरा में मेरे साथ रुकी मैंने उसे वड़ोदरा शहर घुमाया और इस दौरान हमने कई बार सेक्स किया और दो दिन के बाद मैंने उसको वापस वड़ोदरा स्टेशन से दिल्ली की ट्रेन में बिठा दिया....जाते वक़्त उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कराहट थी जिसमे संतुष्टि भी झलक रही थी.......

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शीशी का असर

शीशी का असर
यदि घर में एक अदद भाभी हो तो मन लगा रहता है। उसकी अदायें, उसके द्विअर्थी डॉयलोग बोलना, कभी कभी ब्लाऊज या गाऊन में से अपने सुडौल मम्मे दिखाना... दिल को घायल कर देती है। तिस पर वो हाथ तक नहीं धरने देती है। भाभी की इन्हीं अदाओं का मैं कायल था। मेरी भाभी तो बस भाभी ही थी... बला की खूबसूरत... सांवला रंग... लम्बाई आम गोवा की युवतियों से काफ़ी अधिक... होगी लगभग पांच फ़ुट और छ: इन्च... भरे हुये मांसल उरोज... भारी से चूतड़... मन करता था बस एक बार मौका मिल जाये तो उसे तबियत से चोद दूँ... पर लिहाज भी तो कोई चीज होती है। बस मन मार कर बद मुठ्ठ मार लेता था। भैया भी अधिकतर कनाडा ही रहते थे। जाने भाभी बिना लण्ड खाये इतने महीनों तक कैसे रह पाती थी।
बहुत दिनों से भाभी पापा का पुराना मकान देखना चाहती थी... पर आज तो उन्होंने जिद ही पकड़ ली थी। सालों से वो हवेली सुनसान पड़ी हुई थी। मैंने नौकरों से कह कर उसे आज साफ़ करने को कह दिया था। टूटे फ़ूटे फ़रनीचर को एक कमरे में रखने को कह दिया था। लाईटें वगैरह को ठीक करवाने को इलेक्ट्रीशियन भेज दिया था। दिन को वहाँ से फोन आ गया था कि सब कुछ ठीक कर दिया गया है। वैसे भी वहां चौकीदार था वो घर का ख्याल तो रखता ही था। उन्होंने बताया बाहर चौकीदार मिल ही जायेगा, चाबी उससे ले लेना।
फिर मैं हवेली जाने से पहले एक बार मेरे मित्र तांत्रिक के पास गया। वो मेरा पुराना राजदार भी था... मेरे कई छोटे मोटे कामों के लिये वो सलाह भी देता था। भाभी के बारे में मेरे विचार जान कर वो बात सुन कर बहुत हंसा था... पापी हो तुम जो अपनी ही भाभी के बारे में ऐसा सोचते हो...
"पर इस दिल का क्या करूँ बाबा... ये तो उसे चोदने के लिये बेताब हो रहा है।"
उसने कहा- ... साले तुम बदमाश हो... फिर भी तुम्हें मौका तो मिलेगा ही।
फिर अन्दर से एक शीशी लेकर आया, बोला- यह शीशी तुम ले जाओ... इसे किसी भी कमरे के कोने में छिपा देना और इसका ढक्कन खोल देना... ध्यान रहे कि एक घण्टे तक इसका असर रहता है... फिर इसे एक घण्टे के बाद मात्र पाँच मिनट में तुरन्त बन्द कर देना वर्ना यह शीशी तुम्हारा ही तमाशा बना देगी।
बाबा मेरा मित्र होते हुये भी उनको रिश्वत में मैंने एक हजार रुपये दिये और चला आया। हाँ उसे रिश्वत ही कहूंगा मैं... फिर आज के जमाने में मुझे विश्वास नहीं था कि बाबा का जादू काम करेगा या नहीं, पर आजमाना तो था ही... मेरे लण्ड में आग जो लगी हुई थी।
मैंने शीशी सावधानी से जेब में रख ली और बाहर गाड़ी में भाभी का इन्तजार करने लगा। उफ़्फ़्फ़ ! टाईट जीन्स और कसी हुई बनियान में वो गजब ढा रही थी। मेरा लण्ड तो एक बारगी तड़प उठा। बाल ऊपर की और घोंसलानुमा सेट किये हुये थे।
"ठीक है ना जो... कैसी लग रही हूँ?"
"भाभी... एकदम पटाखा... काश आप मेरी बीवी होती..."
"चुप शैतान कहीं का... तेरी भी अब शादी करानी पड़ेगी... अब चलो..."
यहाँ से बीस किलोमीटर दूर मेरा यह पैतृक निवास था... मेरे पापा डॉक्टर थे... बहुत नाम था उनका... यह सम्पत्ति मेरी और भैया की ही थी। पुराना गोवा का यह एरिया अब तो कुछ उन्नति की ओर बढ़ गया था। दिन को करीब ग्यारह बजे हम दोनों वहाँ पहुंच गये थे। चौकीदार वहीं बाहर खड़ा हुआ इन्तजार कर रहा था।
"बाबू जी, यह चाबी लो... सब कुछ ठीक कर दिया है... आप आ गये हो, मैं अब बाजार हो आता हूँ।"
"जल्दी आ जाना... हम यहाँ अधिक देर नहीं रुकेंगे..." मैंने चौकीदार को आगाह कर दिया।
मैंने फ़ाटक खोला और गाड़ी अन्दर ले गया। फिर भाभी को मैंने पूरी हवेली घुमा दी। मैंने सबसे पहला काम यह किया कि बाबा कहे अनुसार बैठक में कोने में वो शीशी खोल कर एक कोने में छुपा दी। सब कुछ साधारण सा था... कुछ भी नहीं हुआ। शीशी में से धुआं वगैरह कुछ भी नहीं निकला। मैं निराश सा होने लगा।
पर दस मिनट में मुझे अचानक कुछ भाभी में परिवर्तन सा लगा। हाँ... हाँ... भाभी शायद उत्तेजित सी थी... उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैरने लगी, उनकी आँखें गुलाबी होने लगी, उनके गाल तमतमाने लगे।
मुझे लगा कि जैसे भाभी की टाईट जीन्स उनके बदन पर और कस गई है, उनके बदन में लचक सी आने लगी है। क्या भाभी मेरे ऊपर मोहित होने लगी हैं... या ये उस शीशी का असर है।
यही मेरे पास एक मात्र मौका था। मैंने हिम्मत करके बैठक के कमरे में भाभी का हाथ पकड़ लिया। सोचा कि वो कुछ कहेगी तो सॉरी कह दूँगा !
पर भाभी तो बहुत रोमान्टिक हो गई थी। मेरे हाथ को अपने से लिपटा कर बोली- जो... आज मौसम कितना सुहावना लग रहा है !!
"हाँ भाभी, गोवा का मौसम तो हमेशा सुहावना ही रहता है..." मेरे तन में जैसे बिजलियाँ दौड़ पड़ी।
"यह मकान कितना रोमान्टिक लग रहा है... कैसा जादू सा लग रहा है?"
"आओ भाभी यहाँ बैठते है... और ठण्डा पीते हैं..."
मैंने कोल्ड ड्रिंक का एक केन खोल कर भाभी को दे दिया।
"पहले तू पी ले... ले पी ना..."
"नहीं पहले आप... भाभी !"
मैंने भाभी को अपनी ओर खींच लिया। उह्ह्ह्ह ! वो तो कटे वृक्ष की भांति मेरी गोदी में आ गिरी।
"जो... जरा देखना तो... यहाँ कोई दूसरा तो नहीं है ना.."
"नहीं भाभी... बस मैं और तुम... बिल्कुल अकेले..."
"हाय... तो फिर इतनी दूर क्यों हो? कितना मजा आ रहा है... सारे शरीर में जैसे चींटियां रेंग रही है... जरा शरीर को रगड़ दो... भैया !"
मेरा लण्ड तो भाभी की हरकत पर पहले से ही टुन्न हो गया था। मेरा शरीर खुशी और जोश से से कांपने लगा था। मैंने तुरन्त भाभी को अपनी बाहों में दबा लिया और उनके सेक्सी तन को मैं यहाँ वहाँ से रगड़ने लगा।
"उफ़्फ़... जो ! कितने कस रहे है ये कपड़े... क्या करूँ?"
"भाभी उतार दो प्लीज... तब थोड़ी सी हवा लग जायेगी इसे भी..."
"तो उतार दे ना... आह्ह... देख तो यह तन से चिपका जा रहा है..."
मैंने भाभी की चिपकी हुई बनियाननुमा टॉप खींच कर उतार दी... उफ़्फ़्फ़ ! उनके बड़े बड़े मम्मे उनकी ब्रा में समा भी नहीं रहे थे...
"अरे... यार... यह कितना फ़ंस रहा है... हटा दे इसे भी..."
भाभी ने ब्रा को खींच कर हटा ही दी...
हे ईश्वर ! बला के सुन्दर थे भाभी के उरोज। तभी भाभी जैसे तड़प उठी... ये जीन्स... अरे यार... उह्ह्ह... खींच कर उतार दे इसे... साली कितनी तंग है ये...।
मेरे तो होश जैसे उड़े उड़े से थे... ये सब मेरी मर्जी के मुतबिक ही तो हो रहा था। कुछ ही क्षण में भाभी बिल्कुल नंगी मेरी गोदी में थी।
"अब तेरे ये कपड़े... अरे उतार ना इन्हें यार...!"
मुझे तो बस मौका चाहिये था। मैंने भी अपने कपड़े उतार दिये पर अपना तना हुआ लण्ड भाभी से छुपाने लगा।
"कैसा नशा नशा सा है... है ना... वो आराम से उस बिस्तर पर चलें...?"
मैंने भाभी को अपनी बाहों में उठा लिया और प्यार से उन्हें बिस्तर पर लेटा दिया। मैंने एक ही नजर में देख लिया कि भाभी का तन चुदाई के लिये कैसे तड़प सा रहा था। भाभी की चूत बहुत गीली हो चुकी थी... भाभी ने लेटते ही मुझे दबोच लिया। फिर नशीली आँखों से मुझे देखते हुये मुझ पर चढ़ने लगी।
"जो भैया ! प्लीज बुरा मत मानना..."
मेरे नंगे शरीर पर वो चढ़ गई... भाभी के मुख से लार सी निकलने लगी थी। उनकी आँखें लाल सुर्ख हो गई थी... उनकी जुल्फ़ें उनके चेहरे पर नागिन की तरह बल खा रही थी। फिर एकाएक उनके गरम कांपते हुए होंठ मेर लबों से भिड़ गये। उनकी जीभ लपलपाती हुई मेरे मुख की गहराइयों में उतर गई।
"उफ़ ! यह सांप सी क्या चीज है...?" मुझे गले के अन्दर भाभी की जीभ कुछ अजीब सा अहसास दे रही थी...।
जैसे मेरी सांसें रुकने लगी थी... मुझे तेज खांसी आ गई... मेरा लण्ड उसकी गर्म चूत पर घिस रहा था। भाभी के मुख से जैसे गुर्राहट सी आने लगी थी।
तभी भाभी चीख पड़ी... साले हलकट... हरामी... लेटा हुआ क्या माँ चुदा रहा है... चोदता क्यों नहीं है...?
उफ़्फ़ ! भाभी के शरीर में इतनी आग !!... उसकी चूत अपने आप ही मेरे लण्ड पर जैसे जोर जोर पटकने लगी। तभी मेरा लण्ड उसकी चूत में रास्ता बनाता हुआ अन्दर उतरने लगा।
वो चीखी... मार डाला रे... पूरा घुसेड़ दे मादरचोद... जरा अह्ह्ह्ह्ह... मस्ती से ना... साला भड़वा... लण्ड लेकर घूमता है और भाभी को चोदता भी नहीं है।
मैंने अपनी कमर ऊँची की और लण्ड को उसकी चूत की तह पहुँचाने की कोशिश करने लगा। फिर मुझे जबरदस्त जोश आ गया... मैंने भाभी को अपने नीचे पलटी मार कर दबा लिया... और भाभी को चोदने लगा।
मेरा ध्यान इस दौरान भाभी के चेहरे तरफ़ गया ही नहीं... भाभी के मुख से गुर्राहट और चीखें अजीब सी लग रही थी।
मुझे भी होश कहाँ था... मैं तो उछल उछल कर जोर जोर से उसे चोदने में लगा था। भाभी और मैं... आँखें बन्द करके रंगीनियों का आनन्द ले रहे थे।
"चोद हरामी चोद... जोर नहीं है क्या? दे अन्दर जोर का एक धक्का... फ़ाड़ दे साली भोसड़ी को..."
उसमें अब गजब की ताकत आ गई थी। उसने मुझे उठा कर एक तरफ़ गिरा दिया और अपने चूतड़ उभार कर घोड़ी सी बन गई।
"ले भैया... अब मार दे मेरी गाण्ड... मस्त मारना साली को... चल चल जल्दी कर..."
मैं जल्दी से उठ कर अपनी पोजीशन बना कर उसके पीछे सेट हो गया। उफ़ कितना मोहक छेद था... प्यारा सा... चुदने को तैयार था। मैंने अपने लण्ड का सुपाड़ा उस पर रखा और जोर लगाया।
उसका छेद फ़ैलने लगा... सुपाड़ा अन्दर फ़ंसता चला गया। फ़ैलते फ़ैलते उसका छेद तो मेरे डण्डे के आकार का फ़ैल गया। लण्ड बिना किसी संकोच के उन्दर धंसता चला गया। मेरे लण्ड में एक तेज मीठी सी चुभन होने लगी। अन्दर बाहर करते हुए लण्ड पूरा भीतर तक चला गया।
भाभी की हुंकार तेज होने लगी थी। मेरा लण्ड भी तेज चलने लगा था... और तेज होता गया... पिस्टन की भांति मेरा लण्ड उसकी गाण्ड में चल रहा था। उसकी दोनों भारी सी चूचियाँ मेरे हाथों से मसली जा रही थी... खूब जोर जोर से दबा रहा था मैं भाभी की चूचियों को।
फिर तो बस कुछ ही देर में मेरा तन... उखड़ने सा लगा था। मैं बस झड़ने ही वाला था।
"भाभी... सम्भल कर... मेरा तो होने वाला है...!"
"भैया... मेरे मुख में झड़ना..." यह कहानी आप अन्तर्वासना.कॉंम पर पढ़ रहे हैं।
"तो आजा... भाभी... जल्दी ... उह्ह... जल्दी...!"
मैंने उसकी गाण्ड से अपना लण्ड बाहर खींच लिया... भाभी ने पलट कर अपना मुँह खोल लिया...
मैंने दबा कर लण्ड को उसके दोनों होंठों के बीच घुसा दिया... फिर प्यार मुहब्बत की वो पहली प्यारी सी धार... उफ़्फ़्फ़ निकल ही पड़ी।
पहली पिचकारी मुख के अन्दर तक गले तक... चली गई... फिर पिचकारियों के रूप में मेरा लण्ड वीर्य उगलता ही चला गया।तभी मेरे मुख से एक चीख सी निकल गई- उसकी जीभ सांप की तरह दो भागों में विभक्त थी, उसके दांतों के दोनों जबड़े बाहर निकल आए... उसके चेहरे का रंग तेजी से बदल रहा था। आँखें लाल सुर्ख अन्दर की ओर धंसी हुई मुझे घूर रही थी।
भाभी का शरीर जैसे ढीला होता जा रहा था। मैं उछल कर उससे दूर हो गया...
तभी दीवार की घड़ी ने दो बजने का संकेत दिया। मेरे होश उड़ गये... यह तो उसी शीशी का असर था।
भाभी का शरीर अचानक मुझसे अलग हो गया और छत से जा टकराया।
मुझे जैसे किसी अन्जान शक्ति ने उठा कर दूर फ़ेंक दिया।
मुझे आधा होश था और मुझे पता था कि मुझे क्या करना है... मैं लपक कर कोने पर जाकर उस शीशी को बन्द कर दिया, फिर उठ कर बाहर की ओर भागा पर सीढ़ियों से फिसल कर मैं अन्धकार की गहनता में खोता चला गया।
मुझे जब होश आया तो मेरे शरीर में जगह जगह चोटें थी... पांव की एक हड्डी टूट चुकी थी... चेहरे पर जैसे जलने के निशान थे।
"आपकी भाभी ना होती तो आपको कौन बचाता?"
"क्या हो गया था भैया आपको... खुदा की मेहरबानी है आप को कोई सीरियस चोट नहीं लगी।" भाभी ने अपनी चिन्ता जताई।
"पर ये सब अचानक कैसे हो गया?"
तभी बाबा की हंसी सुनाई दी- आप सभी प्लीज बाहर चले जायें...
"बाबा... क्या ये?"
"हाँ... मैंने कहा था ना कि यह एक घण्टे ही काम का है... फिर भी गनीमत है कि तुमने समय पर शीशी को बन्द कर दिया... वैसे मजा आया ना...?"
"बाबा... मुझे माफ़ कर देना... अब ऐसा कभी नहीं करूँगा..."
"यह तो सोचना ही पाप था... पर चिन्ता की कोई बात नहीं है... आपकी भाभी को कुछ भी याद नहीं रहेगा... आप बस अपना मन साफ़ रखो... भाभी को माता के समान समझो... अब प्रायश्चित के लिये तैयार हो जाओ... रोज सवेरे मुठ्ठ मारो, सारी मन की गन्दगी को निकालो और मन को स्वच्छ कर लो... फिर रोज किसी भूखे को भोजन कराओ और फिर तुम भोजन करना। इतना बहुत है तुम्हारे लिये।"
बाबा हंसते हुये चला गया। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि आज के युग में भी ये सब जादू टोना चलता है... जीवित है।
"नहीं... नहीं यह मेरे मन का भ्रम है..." तभी मेरी टांग में दर्द उठा...
"लेटे रहो जो... कोई बुरा सपना देखा था क्या?" मेरी प्रियतमा, मेरी जान... दिव्या मेरे पास बैठी हुई मुस्कराते हुये मेरे बाल सहला रही थी।


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  #79  
Old 5th April 2013
nishanath nishanath is offline
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Originally Posted by komaalrani View Post
ekdam alag kism ki kahanai hai aapki
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Originally Posted by hilolo123456 View Post
Short and SEXY Stories
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Originally Posted by luckyabu View Post
nice collection

shukriya
ye kahaaniya meri likhi nahi hai inhe to sirf post maine kiyaa hai, isliye saraa credit original likhane waale ko jaataa hai aur unhe mai shukriya detaa hu

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  #80  
Old 6th April 2013
nishanath nishanath is offline
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फूफी फ़रहीन

फूफी फ़रहीन -1
उस दिन में और फूफी फ़रहीन घर में अकेले थे क्योंके डैड अपने बैंक के हेड ऑफीस कराची गए हुए थे जबके हमारी नौकरानी 3 दिन की छुट्टी पर थी. दरअसल उससे छुट्टी देना भी मेरी ही कारिस्तानी थी क्योंके जो कुछ में करना चाहता था उस के लिये घर का खाली होना बहुत ज़रूरी था. मेरा कोई भाई बहन नही है जिस की वजह से में अक्सर-ओ-बैस्तर घर में तन्हा ही होता था. मेरी अम्मी तब ही इंतिक़ाल कर गई थीं जब में 3 साल का था. डैड ने दूसरी शादी नही की और हम दोनो अकेले ही रहते थे. वो एक गैर-मुल्की बैंक में एक आला ओहदे पर फॅया'इज़ थे और ज़ियादा तार अपने काम में मसरूफ़ रहते थे.

मेरी चारों फुफियों में फूफी फ़रहीन का नंबर दूसरा था यानी वो फूफी नीलोफर से तीन साल छोटी थीं और 40 बरस की थीं . वो लाहोर में रहती थीं और 2/3 महीने के बाद पिंडी हमारे घर कुछ दिन ठहरने के लिये आया करती थीं . दूसरी फुफियों के मुक़ाबले में उनका हमारे हाँ सब से ज़ियादा आना जाना था. अब की बार डैड ने खुद ही उन्हे लाहोर से पिंडी बुलवा लिया था. मेरी बाक़ी फुफियों की तरह फूफी फ़रहीन की तबीयत भी ज़रा गुस्से वाली ही थी और जब उनका दिमाग खराब होता तो मर्दों की तरह बड़ी गलीज़ गालियाँ दिया करती थीं . उनकी गालियाँ सारे खानदान में मशहूर थीं .

अम्मी के ना होने की वजह से फूफी फ़रहीन मुझ से बहुत शफक़त से पेश आया करती थीं लेकिन मेरी नियत उनके बारे में बहुत बचपन से ही खराब थी. मै उनके साथ अपनी इस क़ुरबत का फायदा उठा कर उन्हे चोदना चाहता था. वो खानदान की उन औरतों में से थीं जिन को में बालिग़ होने से भी पहले से पसंद करता था. मुझे उस वक़्त सेक्स का ईलम नही था मगर ये ज़रूर मालूम था के फूफी फ़रहीन को देख कर मेरा लंड खड़ा हो जाया करता था और में उनके मम्मों और चूतड़ों को छुप छुप कर देखा करता था. फिर जब में बालिग़ हुआ तो फूफी फ़रहीन और खानदान की दूसरी औरतों के बारे में अपने जिन्सी जज़्बात का एहसास हुआ.

आज उनको आये हुए पहला दिन था और मेरी शदीद खाहिश थी के किसी तरह फूफी फ़रहीन की फुद्दी मार लूं. उनके आने के बाद मेरा लंड बार बार बिला-वजा खड़ा हो जाता था. मोक़ा भी बेहतरीन था क्योंके अगले 3/4 दिन उन्होने मेरे साथ घर में बिल्कुल अकेले ही होना था. अगर में इस दफ़ा उन्हे चोदने में नाकाम रहता तो शायद ऐसा सुनेहरा मोक़ा मुझे फिर कभी नसीब ना होता.

फूफी फ़रहीन का शुमार खूबसूरत औरतों में किया जा सकता था. उनके 2 बच्चे थे दो दोनो कॉलेज में पढ़ते थे. लेकिन अब भी वो जिस्मानी तौर पर इंतिहा भरपूर औरत थीं . लंबी चौड़ी दूध की तरह सफ़ेद और निहायत ही सहेत्मंद. उनके मम्मे कुछ ज़रूरत से ज़ियादा ही मोटे थे जिन को वो हमेशा बड़े बड़े रंग बरंगी ब्रा में बाँध कर रखती थीं . मैंने कभी भी उनके मम्मे ब्रा के बगैर नही देखे थे यहाँ तक के वो रात को भी ब्रा पहन कर ही सोती थीं . शायद इस वजह से भी फूफी फ़रहीन के मम्मे इतने मोटे और बड़े थे.

उनकी गांड़ भी बहुत मोटी और चौड़ी थी और जब वो चलतीं तो उनके इंतिहा मज़बूत और वज़नी चूतड़ एक दूसरे के साथ रगड़ खाते रहते. वो चाहे जो मर्ज़ी कपड़े पहन लें मगर उनके चूतड़ों का हिलना नही छुपता था. अपने सेहतमंद बदन की वजह से उनकी कमर पतली तो नही थी मगर मोटे मोटे चूतड़ों और काफ़ी ज़ियादा उभरे हुए मम्मों के मुक़ाबले में छोटी नज़र आती थी. सोने पर सुहागा ये के उनका पेट बाहर निकला हुआ नही था और दो बच्चों की पैदाइश् के बाद भी साइड से नज़र नही आता था. पेट ना होने से उनकी गांड़ और मम्मे और भी नुमायाँ हो गए थे. उनके बाल बहुत लंबे और घने थे जो अब भी उनके मोटे मोटे चूतड़ों से कुछ ऊपर तक आते थे.

रात के खाने के बाद में अपने कमरे में आ गया और फूफी फ़रहीन अपने कमरे में सोने चली गईं. वो इस बात से बे-खबर थीं के मैंने खाने के वक़्त उनके कोक में नींद की गोली पीस कर मिला दी थी ताके वो गहरी नींद सो ज़ाइन. ये मेरे प्लान के लिये बहुत ज़रूरी था. उन्हे कोक कुछ कडुवा भी लगा था लेकिन बाहरहाल वो उससे पी गई थीं . रात तक़रीबन दो बजे में खामोशी से उनके कमरे में दाखिल हुआ. मुझे अंदाज़ा हो गया के वो गहरी नींद सोई हुई हैं. मेरे पास छोटी सी एक टॉर्च थी जो मैंने जला कर फूफी फ़रहीन के बेड पर डाली.

वो करवट लिये सो रही थीं और उनके लंबे बाल तकिये पर बिखरे थे. उनके खुले हुए गिरेबान से उनके मोटे मम्मे और सफ़ेद ब्रा का कुछ हिस्सा दिखाई दे रहा था. लगता था जैसे उनके सेहतमंद मम्मे ब्रा और क़मीज़ फाड़ कर बाहर निकालने ही वाले हैं. मुझ से रहा नही गया और मैंने आहिस्ता से उनके एक मम्मे को क़मीज़ के ऊपर से ही हाथ लगा कर दबाया. ब्रा की वजह से मेरा हाथ उनके मम्मों तक तो नही पुहँच पाया मगर मुझे ये ज़रूर महसूस हुआ के ब्रा के नीचे बहुत मोटे और बड़े बड़े मम्मे मोजूद हैं. मैंने उनकी क़मीज़ के गिरेबान में उंगली डाल कर उससे ज़रा नीचे किया तो देखा के ब्रा के अंदर उनका एक मम्मा दूसरे मम्मे के उपर पडा हुआ था. टॉर्च की सफ़ेद रोशनी में उनके गोरे मम्मों पर नीली नीली रगै साफ़ नज़र आ रही थीं .

फूफी फ़रहीन मेरे सामने कभी दुपट्टा नही लिया करती थीं और इस लिये मैंने कम-आज़-कम क़मीज़ के ऊपर से उनके मम्मे हज़ारों दफ़ा देखे थे. मगर आज पहली दफ़ा मुझे उनके मम्मों का कुछ हिस्सा नंगा नज़र आया था. होश उड़ा देने वाला मंज़र था. मैंने अपने मंसूबे के मुताबिक़ एल्फी की ट्यूब निकाली और बड़ी आहिस्तगी से उनके बांया मम्मे के बिल्कुल नीचे ब्रा के साथ क़मीज़ पर 6/7 कतरे टपका दिये. फिर मैंने इसी तरह उनके लेफ्ट चूतड़ से क़मीज़ का दामन हटाया और उस के ऊपर भी 9/10 कतरे एल्फी डाल दी. एल्फी चीजें जोड़ने के काम आती है और फॉरन ही सख़्त हो जाती है. मै चाहता था के एल्फी खुश्क हो कर फूफी फ़रहीन के बदन से उनकी क़मीज़ और शलवार को चिपका दे और चूँके जिसम के ऊपर से इससे हटाना आसान नही होता इस लिये उनका परेशां होना यक़ीनी था. मै उसी तरह खामोशी से अपने कमरे में वापस आ गया.

में जानता था के फूफी फ़रहीन ज़रा जल्दी घबरा जाने वाली औरत थीं और बहुत मुमकिन था के वो कपड़ों को अपने बदन से चिपका देख कर मुझ से ज़रूर बात करतीं क्योंके और तो घर में कोई था ही नही. वो खुद कभी भी एल्फी को अपने बदन से साफ़ नही कर सकती थीं . ऐसी सूरत में इंकान यही था के मुझे उनके बदन को बहुत क़रीब से देखने और उससे हाथ लगाने का मोक़ा मिल जाता. फिर अगर हालात थोड़े से भी साज़गार होते तो में उनकी फुद्दी मारने की कोशिश भी कर सकता था. यही बातें सोचते सोचते मेरी आँख लग गई.

सुबह 9 बजे के क़रीब मुझे फूफी फ़रहीन की आवाज़ सुनाई दी.
अमजद देखो ये किया हो गया है? वो मुझे उठाते हुए कह रही थीं .
पहले तो मुझे नींद की वजह से उनकी बात समझ नही आई लेकिन फिर अचानक अपनी रात वाली हरकत याद आ गई.
किया हुआ फूफी फ़रहीन? मैंने अंजान बनते हुए पूछा.
मेरी क़मीज़ और शलवार जिसम से चिपक गए हैं. मैंने हटाने की कोशिश की तो दर्द होने लगा. ज़ोर से खैंचने पर ज़ख़्मी ही ना हो जाओओं. ज़रा देखो ये किया है? उन्होने ज़रा परैशानी से कहा.

में फॉरन उतर कर उनके क़रीब आ गया और जहाँ एल्फी लगी थी वहाँ नज़रें जमा दीं. फूफी फ़रहीन के बांया मम्मे के नीचे एल्फी ने खुसक हो कर 3/4 इंच का दाग सा बना दिया था और उनकी क़मीज़ उनके बदन के साथ बड़ी सख्ती से चिपकी हुई थी. इसी वजह से उनकी क़मीज़ एक तरफ से थोड़ी सी ऊपर भी उठी हुई थी. उनके ब्रा का निचला हिस्सा भी उनके बदन के साथ चिपक गया था. मैंने एल्फी वाली जगह पर उंगली फेरी तो वो बहुत खुरड्र और सख़्त महसूस हुई. मैंने पीछे आ कर उनके चूतड़ों को देखा तो वहाँ इस से भी बड़ी जगह पर एल्फी खुसक हो चुकी थी और उनकी शलवार उनके मोटे चूतड़ के साथ चिपक कर टखने से कुछ ऊपर उठ गई थी.

फूफी फ़रहीन आप के जिसम के साथ कोई छिपकने वाली चीज़ लग गई है. बहुत सख़्त है खैंचने से खून निकल सकता है. लेकिन आप फ़िकरमंद ना हूँ सोचते हैं के किया करें. मैंने उनके मोटे और उभरे हुए मम्मों की तरफ देखते हुए कहा.
लेकिन ये है किया और अब कैसे हटे गी? उन्होने पूछा. फूफी फ़रहीन परेशां थीं और उनकी समझ में नही आ रहा था के किया करें.
आप यहाँ बैठाइं में इस पर पानी लगा कर देखता हूँ शायद उतार जाए. मैंने तजवीज़ दी.
हन ये ठीक है तुम रूको में पानी ले कर आती हूँ. उन्होने जवाब दिया.

फिर वो घूम कर पानी लेने शायद डिन्निंग रूम की तरफ चली गईं. मैंने उनके हिलते हुए चौड़े चूतड़ देखे और मेरे मुँह में पानी भर आया. उनके चूतरों में चलते वक़्त अजीब सी लरज़िश आ जाती थी. मै सोचने लगा के फूफी फ़रहीन के मोटे चूतड़ कितने सफ़ेद और मजेदार हूँ गे और अगर उनकी गांड़ मारी जाए तो किस क़िसम का पागल कर देने वाला मज़ा आये गा. मुझे ख़याल आया के उनके शौहर फ़ूपा सलीम जो बहुत दुबले पतले से आदमी थे भला इतनी हटती कटती और सेहतमंद औरत को कैसे चोदते हूँ गे. फूफी फ़रहीन तो तब ही ठंडी हो सकती थीं जब कोई मज़बूत और जवान लंड उनकी मोटी चूत का भुर्कस निकालता.

वो थोड़ी देर बाद एक जग में पानी ले आईं और टेबल पर रख दिया.
फूफी फ़रहीन हमें एहतियात करनी चाहिये अगर कुछ गलत हो गया तो आप ज़ख़्मी हो सकती हैं और फिर जिसम पर दाग भी हमेशा के लिये रह जाए गा. मैंने कहा. मुझे मालूम था के अपने आप से फूफी फ़रहीन को कितनी मुहाबत थी और अपने गोरे बदन पर दाग तो उन्हे किसी सूरत में भी क़बूल नही था. उन्हे डराना ज़रूरी था ताके में जो कुछ करना चाहता था कर सकूँ और वो मुझे ना रोकैयन

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